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''विष्णु प्रभाकर रचना और कर्म दोनो में गांधी कें बहुत करीब थे।''-राधा भट्ट



 दिल्ली के साहित्य अकादेमी में विष्णु प्रभाकर जन्मशताव्दी समारोह
    
दिल्ली
विष्णु प्रभाकर जिंदा हैं अपने शव्दों से, अपने साहित्य से, कालजयी साहित्यकार कभी भी देशकाल, वातावरण की परिभाषा में नहीं बंधता है। इसी का नतीजा है कि उनकी जन्मशती के अवसर पर उनकी चर्चित कृति ‘‘आवारा मसीहा’’ की चर्चा हिन्दी पट्टी के प्रदेशों से निकलकर पश्चिम बंगाल तक पहुँच  गयी है। विष्णु प्रभाकर जन्म शताव्दी समारोह के तत्वावधान में नई दिल्ली के रविन्द्र भवन स्थित साहित्य अकादेमी के मुख्य सभागार में आयोजित विष्णु प्रभाकर जन्मशताव्दी समारोह के लिये बंग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी का संदेश इस मायने जहां महत्वपूर्ण है वहीं भारतीय भाषाओं के समन्वय के आंदोलन जिसके अगुवा थे विष्णु प्रभाकर को मजबूती प्रदान करता है। महाश्वेता देवी के संदेश को कोलकाता से लेकर आयी थी बंग्ला फिल्मों से जुड़ी सोमा विश्वास, जिसे उन्होंने समारोह में पढ़ा। 

महाश्वेता देवी का कहना है कि ‘‘ विष्णु प्रभाकर रचित  ‘आवारा मसीहा’ को पढ़ते- पढ़ते मुग्ध हो गयी, जितना सजीव विषय चयन है उतनी ही उत्कृष्ट है यह पुस्तक। शरत् साहित्य बचपन से ही पढ़ती आ रही हू। संभवतः मुझमें पढने की तीव्र चाहत जन्मजात थी, इसलिये विना चयन किये जो भी मिला, उसे पढ़ डाला। बचपन में हमलोग पाठ्यक्रम के अतिरिक्त कितावें बड़ों से छुपाकर पढ़ते थे। ‘‘आवारा मसीहा’’ की रचना विष्णु प्रभाकर ने की, किसी बंगाली ने नहीं। बहुत मेहनत और निष्ठा के साथ शरत्चंद्र के जीवन के सभी तथ्यों को एकत्र करके लिखी गयी यह पुस्तक प्रत्येक बंगाली के घर में होनी चाहिये। जो बंगाली पढ़ने में रुचि रखते हैं मैं उन्हीं की बात कर रही हूँ  क्योंकि मैंने सुना है कि सभी बंगाली बंगला की किताबें नहीं पढ़ते हैं। इस जीवनी ग्रंथ का शीर्षक जितना आर्कषक है उतना ही उत्कृष्ट लेखन भी है। शरत् स्वयं में आवारा मसीहा ही थे और विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित किताब में उनका ऐसा ही चित्रण किया गया है, सच  में यह अनमोल कृति है। दस- बीस वर्ष पहले शरत्चंद्र की रचनाएं हर बंगला पाठक की शोभा होती थी। मुझे पता नहीं आजकल कितने लोग आनंद लेकर शरत् साहित्य पढ़ते हैं। मैं एक नगण्य बंगाली लेखिका हूँ।। यह पुस्तक विस्मृत श्रद्धा से साथ पढ़ी। मेरे विचार में बंगालियों को यह पुस्तक पढनी चाहिये।’’

           शती विमर्श में अलग- अलग संदर्भों में विष्णु प्रभाकर के साहित्य और व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया गया। समारोह की मुख्य अतिथि सर्व सेवा संध वर्धा की अध्यक्षा और सुप्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक राधा भट्ट ने कहा कि विष्णु प्रभाकर रचना और कर्म दोनो में गांधी कें बहुत करीब थे। गांधी जीवन के  जिस सत्य के निकट थे जीवन के उसी सत्य के निकट विष्णु प्रभाकर जीते थे। उनकी संवेदना सूक्ष्म थी। मौजूदा समय समाज में संवेदनहीनता मजबूत होती जा रही है, उस स्थिति में उनके संवेदनशील व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की जरूरत है। उनसे जुड़े संस्मरणों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनका साहित्य भोगा हुआ यथार्य है। उनके गांधीवादी सोच चिंतन और सकारात्मकता को अपनाकर वेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

        सुप्रसिद्ध साहित्यकार बलदेव वंशी ने कहा कि विष्णु प्रभाकर की रचनाओं में संवेदना के विभिन्न पक्षों के साक्षात्कार होते हैं और उनकी सृजनशीलता माटी को स्पर्श करती है। उनमे समर्पण का भाव था और दृष्टि मानवीय थी यही मानवीय दृष्टिकोण आवारा मसीहा में परिल़िक्षत होती है। वे अथक यायावर थे। वे अकेले एक ऐसे साहित्यकार हैं जो हिन्दी पट्टी के उत्तर से दक्षिण भारत तक लोकप्रिय हैं। अपनी सिद्धि की वदौलत उन्होंने प्रसिद्धि हासिल की। वे एक स्वछंद प्रवृति क ेलेखक थे जिन्हें किसी वाद के दायरे में बांधा नहीं जा सकता है। उनकी रचनाओं में स्त्री विमर्श की प्रधानता है। अपने साहित्य उन्होंने स्त्री पात्रों  को सदैव गौरव प्रदान किया है।

         वरिष्ठ कवि और नाटककार नरेन्द्र मोहन ने उनसे जुड़े संस्मरणों का जिक्र करते हुए कहा कि वे एक ऐसे रचनाकार हैं जो चार पांच पीढियों को जोड़ते हैं। उनकी कृति ‘ धरती अब भी घूम रही है’ काफी पहले लिखी गयी थी लेकिन आज भी प्रासंगिक है। लेखकीय सच के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। आवारा मसीहा ने उन्हे सफल जीवनी लंेखक के रुप में प्रतिष्ठापित किया है। उन्होंने शरत्चंद्र की कहानियों और उपन्यासों की रचना प्रक्रिया का विश्लेषण किया है बल्कि कथा साहित्य के अंतः सूत्रों को भी तलाशा है। वहीं अजीत कुमार ने कहा कि वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका पूरा जीवन मूल्यों पर आधारित था। जमाने के वे नहीं बदले। उनका जीवन सात्विक था उनका कथा शिल्प जितना विराट था, उनकी दृष्टि उतनी ही उत्कृष्ट। आज पूरा समाज संवादहीनता से गुजर रहा है। विष्णु जी संवाद के पक्षधर थे। लोगों के लिखे खत का जबाव देकर उनसे संवाद बनाये रखते थे। उन्होंने उनसे हुए मुलाकातें और खतों के कई संस्मरणों का जिक्र किया। अवधेश कुमार श्रीवास्तव ने साहित्य और रचनाधर्मिता का जिक्र करते कहा कि वे परंपरावादी नहीं थे बल्कि परंपराओं को तोड़ते थे तथा मानवीय मूल्यों की स्थापना करते थे। उनका पूरा जीवन एक वैरागी का जीवन था। मूल्यों के साथ उन्होंने कभी भी समझौता नहीं किया। शरत्चंद्र की जीवनी को कलात्मकता के साथ प्रस्तुत कर हिन्दी साहित्य की अनमोल कृति बना डाली।

              कार्यक्रम के दौरान संकल्प जोशी ने उनकी चर्चित कहानी ‘‘धरती अब भी घूम रही है’ का नाट्य वाचन कर अपने अभिनय कौशल और उसकी विशिष्टताओं का साक्षात्कार कराया, प्रभावोत्पादका के माध्यम से लोगों पर खास छाप छोड़ी। मौजूदा भ्रष्टाचार का परिदृश्य और काफी पूर्व लिखी गयी कहानी में भ्रष्टचार का अनावरण लोगो को सोचने को वाध्य करती है। जीवन संघर्ष में लोगो आज ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध कवियित्री अलका सिन्हा ने उनकी कविता ‘ चलता चला जाउंगा’ का  पाठ किया। उन्होंने अपनी उद्धोषणा से कार्यक्रम में चार चांद लगा दिये।

             जनसत्ता के मुख्य संवाददाता प्रसून लतांत ने देश भर  में जन्मशताव्दी के दौरान हुए आयोजनो का व्योरा पेश किया और कहा कि  इन आयोजनों के माध्यम से उनके साहित्य के विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन हुआ है। यह सिलसिला अनवरत जारी रहेगा।

     समारोह समिति के  कार्यकारी अध्यक्ष और व्यंग्यकार अनिल जोशी ने कहा कि  देश भर के आयोजनों के माध्यमों से विष्णु प्रभाकर के साहित्य के विविध पक्षों पर चर्चा हुई और नई पीढ़ी को उन्हें समझने का मौका मिला। समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अतुल प्रभाकर ने कहा कि  विष्णु प्रभाकर अक्सर कहा करते थे कि- ‘ मेरा परिवार बहुत बड़ा परिवार है, मेरे तो अनेको घर हैं।’ सचमुच उनका परिवार बहुत बड़ा है, उनके चाहनेवालों का, उनके पाठको को , साहित्यकारों का जो अनेक रूपों तथा संदर्भे से उनसे जुड़ा है। कार्यक्रम में ग्लोवल गांधी फोरम के अध्यक्ष बाबूलाल शर्मा, निदान फाउंडेशन की महासचिव उर्मि धीर, हर्षवर्द्धन आर्य, सरोज शर्मा की अहम् भागीदारी रही। विष्णु प्रभाकर ने अपनी कविता ‘चलता चला जाउंगा मे कहा है-‘ आदमी मर गया कभी का, पीढ़ियां जिंदा है।’ विष्णु प्रभाकर आज भी हमारे वीच हैं अपने शव्दों से , अपने साहित्य से ।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com
मो - 09304706646
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