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गुरुवार, मार्च 15, 2012

अंबेडकर और दलित साहित्य (दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी)

अंबेडकर और दलित साहित्य (दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी)
(14 मार्च 2012 10:00 बजे से 15 मार्च 2012 17:00 बजे
स्थान - अंबेडकर विवि., लोथियन रोड़ (Lothian Road), कश्मीरी गेट, दिल्ली-06)

उद्घाटन सत्र - प्रो. श्याम बी, मेनन, प्रो. विजय वर्मा, गोपाल प्रधान, सत्यकेतु सांकृत।

पहला सत्र - अंबेडकर और दलित साहित्य
(अध्यक्ष - प्रो. विमल थोराट, बीज वक्तव्य - प्रो. तुकाराम पाटिल, वक्ता - प्रो. तेजसिंह, डॉ, विधानचंद्र दास, डॉ. संजयकुमार सुमन, डॉ. रामचंद्र व सुभाष गाताडे।)

दूसरा सत्र - प्रेमचंद और दलित साहित्य : एक विचार
(अध्यक्ष - ओमप्रकाश वाल्मिकि, बीज वक्तव्य - प्रो. रवि श्रीवास्तव, वक्ता - जितेंद्र श्रीवास्तव, अजय नावरिया, डॉ. आनंदवर्धन शर्मा, डॉ. आनंद शुक्ल, राजीव झा।)

तीसरा सत्र - दलित आत्मकथा : वेदना और विद्रोह
(अध्यक्ष - प्रो. तुलसीराम, बीज वक्तव्य - शरणकुमार लिंबाले, वक्ता - डॉ, मुरलीकृष्ण, रमेशचंद्र मीणा, वी.के.अग्रवाल, डॉ. अखिलेश दुबे, डॉ. अवधेश शुक्ल, डॉ. अवधेशकुमार त्रिपाठी।)

चौथा सत्र - दलित साहित्य का अंतस्ससंघर्ष
(अध्यक्ष - डॉ. सुशीला टाकभौरे, बीज वक्तव्य - डॉ. आनंदसिंह, वक्ता - डॉ. बजरंगबिहारी तिवारी, डॉ. गंगासहाय मीणा, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, डॉ. देवेंद्र चौबे, डॉ. रामनरेशराम।)

संगोष्ठी समन्वयक - डॉ. सत्यकेतु साकृंत,
संगोष्ठी संयोजक - डॉ. गोपालजी प्रधान,
उत्तरापेक्षी - प्रो. सलिल मिश्र।
आप सभी साहित्यप्रेमी सादर आमंत्रित है।

2 टिप्‍पणियां:

PUKHRAJ JANGID पुखराज जाँगिड ने कहा…

पहले दिन के दूसरे सत्र (प्रेमचंद और दलित साहित्य : एक विचार) में ओमप्रकाश वाल्मीकि जी को सुनना रोचक रहा। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य और साहित्कारों को प्रेमचंद से आपत्ति तब होती है जब प्रेमचंद को उनके सामने एक दुश्मन की तरह, एक दीवार की तरह प्रस्तुत किया जाता है, कि आपने नया क्या लिखा है यह सब तो वर्षों पहले प्रेमचंद लिख ही चुके थे। अगर उन्हें हमारे दोस्त की तरह प्रस्तुत किया जाए तो हम सिर आँखो पर बिठाएंगा लेकिन अगर आप उन्हें हमारे लिए एक बाधक या दुश्मन की तरह प्रस्तुत करेंगे तो उनकी कमियों की आलोचनाएं तो होगी ही। आज जरूरत यह है कि प्रेमचंद को भी उनकी कमियों के साथ स्वीकार किया जाए, उन्हें भगवान न बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की 'सदगति' कहानी बहुत ही मार्मिक कहानी है लेकिन वह जिस आधार पर आगे बढती है, वह तकनीकी रूप से गलत है। दलितों में ही क्यों? हिंदु धर्म के किसी भी जाति-समुदाय में कभी भी मृतक की बॉडी को अकेला नहीं छोड़ा जाता, हो सकता है कि सवर्ण समुदायों में ऐसा होता हो, लेकिन दलितों में ऐसा बिल्कुल नहीं होता; जबकि प्रेमचंद दलितों से ऐसा करवाते है जोकि असंभव है और कहानी मार्मिक होने के बावजूद एक गलत और बनावटी आधार पर आगे बढती है। इसी तरह 'कफन' कहानी भी तकनीकी रूप से गलत है। मनुष्य समाज में कहीं भी ऐसा नहीं होता कि एक भरे-पुरे 'कुनबे' में प्रसव के दौरान स्त्री के पास कोई स्त्री गैरमौजूद हो, भले ही वह दुश्मन ही क्यों न हो (जबकि सारा गाँव जानता है कि वह स्त्री बहुत ही नेकदिल है) जबकि उसकी मृत्यु पर रोने-बिलखने के लिए स्त्रियां तैयार है, यह पूरी तरह से स्त्रीविरोधी और मनुष्यविरोधी चित्रण है।
दलित प्रेमचंद की आलोचना इसलिए भी करते है कि जिस समय समय दलित निर्णायक मोड़ (पूना पैक्ट) में थे, प्रेमचंद उनके साथ नहीं थे। पूना पैक्ट के दो दिन उन्होंने लिखा था कि 'ईश्वरीय ताकतो ने देश को बचा लिया...' और सबसे बड़ी विडंबना तो यह उस पैक्ट पर गाँधी के ही हस्ताक्षर न थे, जबकि दलित समुदाय ने उस पर हस्ताक्षर आमरण अनशन पर डटे गाँधी के लिए अपने भविष्य को होम करके किए थे...
अंत में, गैर दलित हमेशा हमें सीखाने की मुद्रा में रहते है, सीखने की नहीं! आप सीखने और दोस्त की मुद्रा में हमारे साथ आइए, आपका स्वागत है...

PUKHRAJ JANGID पुखराज जाँगिड ने कहा…

साझे के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया माणक भाई।

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