प्रतिरोध का सिनेमा @ रामपुर उत्सव - Apni Maati: News Portal

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सोमवार, अक्तूबर 28, 2013

प्रतिरोध का सिनेमा @ रामपुर उत्सव

महराजगंज। 

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी द्वारा 27 अक्तूबर को रामपुर बुजुर्ग गांव में चन्द्रिका शर्मा फूला देवी ट्रस्ट द्वारा आयोजित रामपुर उत्सव के दूसरे दिन ग्रामीणों को दो डाक्यूमेंटरी-गांव छोड़ब नाहीं और गाड़ी लोहरदगा मेल और एक फीचर फिल्म-दाएं या बाएं दिखाई गई। यह गांव कोलकाता विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर अमरनाथ का गांव है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक एवं जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह, जन संस्कृति मंच की गोरखपुर इकाई के संयोजक अशोक चौधरी, गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के सह संयोजक आशीष कुमार ने दर्शकों को दिखाई जाने वाली फिल्मों और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के काम के बारे में जानकारी दी। इस मौके पर महराजगंज के सेंट जोसेफ कालेज के प्रबंधक सीजे थामस द्वारा प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिब्बन लाल सक्सेना पर बनाई गई डाक्यूमेंटरी मुक्तिदाता भी दिखाई गई। 

गांव छोड़ब नाही

सबसे पहले दर्शकों ने म्यूजिक फिल्म ‘गांव छोड़ब नाहीं’ देखी। सवा पांच मिनट की यह छोटी फिल्म अपने गांव, जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक सम्पदा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों का प्रतिरोध गीत है जिसे प्रख्यात फिल्मकार केपी शशि ने मेघनाथ के साथ मिलकर बनाया है। इस गीत में आदिवासी अपने गांव, जंगल नहीं छोडऩे का संकल्प व्यक्त करते हैं। दरअसल यह सिर्फ आदिवासियों का ही नहीं देश के गांवों में बसने वाले करोड़ों ग्रामीणों का प्रतिरोध गीत है जिन्हे आधुनिक विकास के नाम पर  अपने गांव, जमीन, संस्कृति से विस्थापित किए जाने के लिए विवश किया जा रहा है। 

गाड़ी लोहरदगा मेल 

इसके बाद रांची के फिल्मकार बीजू टोप्पो निर्देशित दस्तावेजी फिल्म ‘ गाड़ी लोहरदगा मेल ’ दिखाई गई। यह फिल्म 9२ वर्ष तक रांची-लोहरदगा के बीच चलने वाली चार डिब्बो वाली टे्रन की कहानी है। यह ट्रेन  2003 में उस समय बंद कर दी गई जब लोहरद्गा और रांची के बीच  बिछी मीटर गेज की रेल पटरी को ब्राड गेज में बदला जाने लगा। चार डब्बों की यह छोटी ट्रेन कोई मामूली ट्रेन न थी बल्कि इसके जरिये ही लोहरद्गा के लोग पहले रांंची और फिर देश के दूसरे हिस्सों में गए। झारखण्ड के आदिवासियों के विस्थापन में भी इस ट्रेन की खास भूमिका रही है जिसका इस्तेमाल फिल्मकार ने विस्थापन संबंधी अपनी दूसरी फिल्म कोडा राजी में किया है। एेसी ट्रेन को स्मृति में  बचाए रखने के लिए रांची के सांस्कृतिक समूह अखड़ा से जुड़े शिक्षाविद डा$ रामदयाल मुंडा , लोकगायक और गीतकार मधु मंसूरी हंसमुख, मुकुंद नायक और फिल्मकार मेघनाथ व बीजू टोप्पो ने एक इस ट्रेन से यात्रा की और फिल्मकार बीजू टोप्पो ने इसे कैमरे में उतारा। 27 मिनट की इस फिल्म में कुल छह गाने हैं जो झारखण्ड राज्य के अस्तित्व के संघर्ष , झारखण्ड की माटी, विस्थापन की टीस और आम जीवन से सम्बद्घ हैं। इन गानों के सटीकपन  की वजह से ही 27 मिनट की रांची से लोहरद्गा की यह यात्रा जातीय स्मृति का अद्भुत आख्यान बनकर सामने आती है। इन 6  गानों में से एक, जिसे खुद गायक मधु मंसूरी हंसमुख ने लिखा है, को आप भी सुनिए-

आ चाँदो
तुम कोड़ा परदेस मत जाना
हमारा प्यार तोड़ के मत जाना चाँदो
हमें बहुत दिनों तक अलग-अलग जीना पड़ेगा
चाँदो तुम मातृभूमि छोडक़र मत जाना
तुम कोड़ा परदेस मत जाना
तुम जहाँ भी जाओगी चाँदो
इतना सुन्दर हीरा नागपुर नहीं पाओगी 
जहाँ हम बचपन में ईंट, पत्थर और धूल में खेलते थे
तेरे बिना कुआँ, तालाब, चुवाँ

दाएं या बाएं 

कार्यक्रम में अंतिम फिल्म के रुप में बेला नेगा की हिन्दी फीचर फिल्म ‘दाएं या बाएं ’दिखाई गई। वर्ष 2010 की यह फिल्म उत्तराखंड के गांव कांडा की कहानी है जिसमें नायक रमेश माजिला अपने गांव में कला केन्द्र स्थापित करने के उद्देश्य से मुम्बई से लौट आता है। गांव में उसे सब उपहास करते हैं क्योंकि गांव के हर नौजवान का सपना मुम्बई जाने का है। एक नाटकीय घटनाक्रम में नायक को एक टीवी प्रोग्राम के कविता प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के रुप में बड़ी कार मिलती है। यह कार नायक के लिए मुसीबत बन जाती है कि क्योंकि उसके पास कार को चलाने के लिए ईंधन और रखरखाव के लिए पैसे नहीं होते। कार मालिक होने के कारण उसका हर कोई अपने स्वार्थ में इस्तेमाल करना चाहता है। झूठी शान में वह कर्जदार हो जाता है और रोज-रोज नई मुसीबतों में फंसता जाता है। आखिरकार वह कार को एक ऊंची पहाड़ी पर छोड़ देता है और पहाड़ी पर फंसंे अपने बछड़े को बचा कर घर लाता है।  नायक से कार के बजाय बछड़े को चुनने का निर्णय करा कर फिल्मकार ने अपने इस फिल्म से दर्शकों को उपभोक्तावादी संस्कृति से बचने का स्पष्ट संदेश दिया है। फिल्म के संवाद बहुत चुटीले हैं।  कठिन जीवन जीते हुए भी पहाड़ी ग्रामीण अपने सेंस आफॅ ह्यूमर से इसका कैसा मुकाबला करते हैं, फिल्म में ये दृश्य बहुत प्रभावी बन पड़े हैं। 

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी 
गोरखपुर फिल्म सोसाइटी का गठन वर्ष 2005 में गोरखपुर में हुआ था। इसका उद्देश्य लोगों को सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फिल्में दिखाना है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने जन संस्कृति मंच के साथ मिलकर वर्ष 2006 में गोरखपुर में प्रतिरोध का सिनेमा नाम से फिल्म फेस्टिवल की शुरूआत की। इस थीम पर देश में आयोजित होने वाला यह अपने तरह का अलग फिल्म फेस्टिवल है जिसमें जनता के संघर्षो, सुख-दुख, जद्दोजेहद को सामने लाने वाली डाक्यूमेंटरी, फीचर फिल्म, लघु फिल्में दिखाई जाती हैं और दर्शकों से फिल्मकारों का सीधा संवाद होता है। गोरखपुर से शुरू हुई प्रतिरोध के सिनेमा की यात्रा आज पटना, लखनऊ, बलिया, आजमगढ़, वाराणसी, बरेली, भिलाई, इलाहाबाद, नैनीताल, इंदौर से होते हुए इस वर्ष देवरिया जिले के सलेमपुर और राजस्थान में उदयपुर तक पहुंची है। इसके अलावा गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर आदि जिलों में गांवों, कस्बों में दर्जनों फिल्म शो के आयोजन किए हैं। 

 
मनोज कुमार सिंह 
दो दशक से पत्रकारिता में, गोरखपुर में  हिंदुस्तान दैनिक में सीनियर कॉपी एडिटर हैं और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव, प्रदेश सचिव उत्तर प्रदेश समन्वयक, गोरखपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े हुए हैंसमकालीन  जनमत  के सम्पादक मंडल से भी सम्बद्ध हैं। संपर्क -9415282206 ई-मेल: manoj.singh2171@gmail.com

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