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बुधवार, अगस्त 28, 2013

अशोक कुमार पाण्डेय का फेस बुक स्टेटस: आखिर हम क्यों इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं


युवा विचारक और सक्रीय टिप्पणीकार 

ब्लॉग
दख़ल प्रकाशन के कर्ताधर्ता 

इस बार साहित्य अकादमी का जो युवा पुरस्कार हिंदी के लिए घोषित हुआ है उसे लेकर जितना शोर है, वह पहले कभी नहीं दिखा. मेरे लिए तो पहले दिन यह औपचारिक बधाई के सतह ख़त्म हो गया था लेकिन देखता हूँ कि इस पर लगातार बात होती चली जा रही है. सबसे ज्यादा कहीं खुल के तो कहीं दबे स्वर में पुरस्कृत कवयित्री की अयोग्यता को लेकर चर्चा है और उन वजूहात की तलाश जिनसे यह उनकी झोली में गया. दो दिनों से सारा कुछ देखते और कुछ कुछ कहने के बाद आज दोपहर में Giriraj Kiradoo से बात करने के बाद यह विस्तृत स्टेट्स लिख रहा हूँ.

पहली बात तो यह कि इस पूरी बहस में किन्हीं बने बनाए और 'स्थापित' मानकों के आधार पर अर्चना की कविताओं को 'साधारण' कहा जा रहा है. मेरी खुद की स्वीकारोक्ति है कि जितना उन्हें पढ़ा है, वह मेरी प्रिय कवियों में नहीं हैं. लेकिन क्या इस प्रक्रिया में हम इस तथ्य को नज़रंदाज़ नहीं कर रहे कि साहित्य कोई वस्तुगत अवधारणा नहीं जिसमें अच्छे-बुरे-श्रेष्ठ-साधारण का कोई सार्वभौमिक और सर्व स्वीकृत मानक हो. यह मनोगत रूप से ग्रहण की जाने वाली चीज़ है जहाँ एक ही रचना किसी के लिए श्रेष्ठ हो सकती है और दूसरे के लिए साधारण. आखिर रामदरश मिश्र जैसे व्यक्ति जिनको साहित्य में कोई लाबीस्ट या पतित व्यक्ति तो नहीं ही माना जाता है अगर सहजता के आधार पर अर्चना की कविताओं को पुरस्कार योग्य मानते हैं तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी तो है. सदा षड्यंत्र थियरीज की खोज में लगे लोग किसी लाबीइंग की तलाश की जगह इसे उनके अपने जेनुइन फैसले की तरह क्यों नहीं ले सकते? या हम मान चुके हैं कि हमारे मानक ही इकलौते मानक हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं, स्वयंसिद्ध हैं और इसके विपरीत विचार रखने वाला कोई व्यक्ति कमतर है.

दूसरी बात यह कि हमारे कुछ स्टार कहानीकारों/ कवियों को शायद यह भी हजम नहीं हो पा रहा कि इतना बड़ा पुरस्कार कैसे इतनी साधारण कवयित्री को मिल गया? यहाँ जब मैं साधारण कह रहा हूँ तो वह अर्चना जी की प्रोफाइल के बारे में. आज के समय में जब किताब छपने और फाइनल होने के पहले कवर कई सौ बधाईयाँ ले चुके होते हैं तो अब तक उनकी किताब का कवर पब्लिक डोमेन में नहीं है, वह ऍफ़ बी पर नहीं हैं, उनका मेल आई डी / मोबाइल नंबर शायद ही कुछ लोगों के पास हो और सबसे आश्चर्यजनक यह कि उनकी शायद एक या दो ही तस्वीरें इंटरनेट पर हैं. ज़ाहिर है खुद को उन्होंने लाईमलाईट से दूर रखा है और वह उतनी 'स्टार' भी नहीं, जितने हिंदी के अत्यंत साधारण कवितायेँ लिखने वाले मुझ जैसे तमाम लोग हैं. तो एक तरह का श्रेष्ठताबोध इस फैसले से घायल होता दिख रहा है, जो मान कर चलता है कि जो कुछ बड़ा है सब उसके लिए है. बकौल गोरख पांडे 'बड़कन के बड़का और छोटकन के छोटका' बखरा लगाने वाला उनका समाजवाद कहीं आहत हुआ है. 

यहाँ एक बात और कि खुद को लगातार इस्तेब्लिश्मेंट के खिलाफ कहने वाले, व्यवस्था विरोधी कविता/कहानी लिखने का दावा करने वाले हमारे रचनाकारों में साहित्य के इस सबसे बड़े इस्टेब्लिश्मेंट के पुरस्कार को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है? आखिर हम क्यों इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं कि अकादमी का सम्मान दिल्ली और दुसरे सत्ता केन्द्रों से दूर एक गैर सवर्ण महिला को (और वह भी ब्राह्मण बहुमत वाली जूरी द्वारा) मिलने को सेलीब्रेट नहीं कर पा रहे? अपनी बिरादरी में एक नए सदस्य का स्वागत नहीं कर पा रहे. 

आखिरी बात यह कि क्या आप सच में ऐसा समझते हैं कि इतने लो प्रोफाइल की हरदा में रहने वाली एक ऐसी महिला जिसकी किताब की एक समीक्षा भी अब तक नहीं देखी गयी ऐसी लाबिस्ट हो सकती है कि इतने उच्च कनेक्शंस वाले हमारे ऐसे स्टार महानगरीय लेखकों से इस कला में पार पा जाए जिन्होंने इसमें बार-बार महारत सिद्ध की है? मैं तो हर हाल में यह विश्वास करना चाहूंगा कि इस बार अर्चना जी को यह पुरस्कार इसलिए मिला कि जूरी का बहुमत अच्छे साहित्य के जो मानक मानता था उस पर वह खरी उतरीं, उनका स्वागत करूँगा, बधाई दूंगा और अपने साहित्य समाज के इस अब तक अजाने रहे सदस्य की ओर दोस्ती का हाथ बढाते हुए उनसे उम्मीद करूँगा कि लगातार अच्छी कवितायें लिखें.

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