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शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2012

''अफसोस ये है कि लड़की को जन्म से ही कमजोर समझा जाता रहा है।''-प्रतिभा देवी सिंह पाटिल


  • महिलाओं के प्रति सामाजिक नजरिये में बदलाव लायें- प्रतिभा देवी पाटिल
  • तीन दिवसीय दक्षिण एशियाई महिला सम्मेलन शुरू 

नई दिल्ली,



19 अक्टूबर। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने लोगों का आह्वान किया है कि वे महिलाओं के प्रति सामाजिक नजरिये में बदलाव लायें। सिर्फ कानून बनने से परिवर्तन नहीं हो सकता है। सिर्फ कानून बनाने से ही समाज नहीं बनता है। यह बात उन्होंने गांधी दर्शन परिसर में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और साउथ एशिया फ्रेटरनिटी के संयुक्त तत्ववधान मे आयेजित तीन दिवसीय दक्षिण एशियाई महिला सम्मेलन का उदघाटन करते हुए कही। उन्होंने दीप प्रज्ज्वजित इस सम्मेलन का उद्धाटन किया।
      
उन्होंने कहा कि महिलाओं की असमानता की स्थिति का एक बहुत बड़ा कारण असामनता है। लड़की को जन्म से ही कमजोर समझा जाता रहा है। उसे घर पर ही निर्भर रहना पड़ता है। कभी पिता पर तो कभी पति पर तो कभी पुत्र पर। महिलाएं आर्थिक रूप से आत्म निर्भर हो जाएं और शारीरिक रूप से हर हर स्थिति का मुकावला करें तो यह स्थिति नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि अपने यहां बहुत सारे अलिखित कानून तथा परंपराएं थी। सती प्रथा, पति की मौत के बाद बाल काटने, पर्दा के अंदर रखने आदि प्रथाएं लागू थी। समाज सुधारकें के निरंतर प्रयास से स्थितियं बदली है। राजा राममोहन राय ,ज्योतिवा फूले ने लगातार इस दिशा में आंदोलन किये, जिसके फलस्वरूप स्थितियां बदली है। महात्मा गांधी ने महिलाओं की अंदर की ताकत को पहचाना था और आजादी की लड़ाई में उन्हें शामिल किया। उनका मानना था कि दूसरों पर वार करने में महिला भले ही अवला हो, लेकिन दुख सहने में सवला है। इसका परिचय भी महिलाओं ने आजादी की लड़ाई के दौरान दिया।
         
उन्होंने कहा महिलाओं में प्रेम, त्याग,सद्भाव के सहज गुण है। यह परिवार में देखा जा सकता है। यदि वे घर की चहारदिबारी से बाहर निकलें तो समाज सुंदर बनेगा। उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि अनेक जगहों लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा जाता है। इसके लिये लड़कियां अपने घर में अपनी बात प्रेम, निष्ठा और विनम्रतापूर्वक कहें तथा सत्य के लिये आग्रह करें। महिलाओं की स्थिति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में ही कहा गया है कि लिंग आधारित कोई भेदभाव नहीं होगा। देश में महिलाओं के सशक्तिकरण के अनेक कानून बने है। दहेज अधिनियम, घरेलू हिंसा अधिनियम जैसे अनेक कानून है। पंचायती राज में तो महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिये गये हैं। कई राज्यों ने 50 फीसदी कर दिया है। राजनीतिक भागीदारी के लिये राज्य सभा से महिला आरक्षण विल पारित कर दिया गया है। लोक सभा से यह पारित नहीं हो सका है। उन्होंने कहा कि उनके प्रयास महिलाओं के नेशनल कमीशन राष्ट्रीय स्तर बना है। देश के 20 राज्यों में इसके गठन की प्रकिया आरंभ कर दी गयी है।
   
सम्मेलन को संबोधित करती हुईं पकिस्तान से आयीं शाईस्ता बेगम ने कहा कि परिवर्तन की शुरूआत अपने घर से ही करनी चाहिये। पाकिस्तान की स्थिति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की एक छवि बना दी गयी है। वह है आतंक और दहशत की। चंद लोग ही दहशतगर्दी में यकीन करते हैं, और अधिकांश लोग अमनपसंद हैं। यह बात दीगर है कि दो भाईयों ने अलग- अलग रहने का फैसला किया है। अलग- अलग रहने का कदापि मतलव नहीं है कि लड़ते रहें। अलग रहकर  प्रेम भाईचारे के साथ रहा जा सकता है। जो संसाधन विघ्वंसक कार्यो के लिये खर्व हो रहे हैं उसका इसका इस्तेमाल गरीबी उन्मूलन और नवनिर्माण में होना चाहिये।
      
बांग्ला देश से आयी संचिता हक ने कहा कि शांति प्रयासों में महिलाओं की भूमिका अहम् हैं। वहां की स्थिति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वहां महिला सशक्तिकरण के लिये नेशनल डवलपमेंट पॉलिसी 1996 में ही बनायी गयी है। शिक्षा के क्षेत्र का निवेश क दर उच्चतम है। बारहवीं कक्षा शिक्षा की मु्फ्त व्यवस्था की गयी है। इसे स्नातक स्तर तक लागू किये जाने की मांग की जा रही है। जहां तक राजनीतिक भागीदारी का सवाल है तो यहां निकाय तथा पंचायत के क्षेत्र में 12,828 सीटें रिर्जव है। इसी तरह संसद में 62 सीटें आरक्षित है। 3.60 लाख महिलाएं रेडीमेड बस्त्र बनाने में लगी हुई हैं।। फतवा को को हाईकोर्ट द्वारा नाजायज करार दिया गया है। महिलाएं स्वतंत्र हैं।

सेंसर बोर्ड की सदस्या अरूणा मुकिम ने कहा कि स्थितियां बदल रही है ,अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा काम करने की आवश्कता है, वहां अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अत्याचार सिर्फ गरीब परिवारो में ही नहीं, संम्पन्न परिवार में भी अत्याचार होता है। सम्पन्न परिवार की चीख भी बाहर नहीं निकल पाती है। समाज के अपने मानसिकता मे परिवर्तन लाना चाहिये।
       
साउथ एशिया फ्रेटरनिटी के महासचिव सत्यपाल ने बताया कि 1989 से इस सम्मेलन की शुरूआत की गयी। इस बार के सम्मेलन में नौ विषय रखे गये हैं।  गैरबरावरी और राजनीतिक भागीदारी का सवाल महत्वूर्ण है।  आरंभ में गांधी स्मृति एंव दर्शन समिति  की निदेशक  डॉ मणिमाला ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि दक्षिण एशियाई महिला सम्मेलन अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। महिला आंदोलन का इतिहास संघर्षों का रहा है। समाज गैरबरावरी का व्यवहार और राजनीतिक भागीदारी सवाल महत्वपूर्ण है। 
       
कार्यक्रम का शुभारंभ बापू के प्रिय भजन- ‘ वैष्णव जन को तेनि कहिये’ से आरंभ हुआ। कार्यक्रम का संचालन शाश्वती ने किया। कार्यक्रम पदाधिकारी वेदव्यास कुंडू ने धन्यवाद ज्ञापन किया। तीन दिनों के इस सम्मेलन में पाकिस्तान, बांग्लादेश के साथ- साथ देश के विभिन्न हिस्सों से आयी महिला प्रतिनिधि भाग ले  रही हैं।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com 
मो - 09304706646

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