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गुरुवार, अक्तूबर 04, 2012

गांधी कथा:1


नई दिल्ली, 4 अक्टूबर। 

तीस जनवरी स्थित बापू के शहादत स्थल गांधी  स्मृति दर्शन समिति के सभागार में गांधी कथा का आरंभ उनके प्रिय भजन से हुआ। बापू के प्रिय सचिव महादेव भाई के 87 वर्षीय पुत्र नारायण देसाई ने गांधी कथा का शुभारंभ करते हुए कहा कि‘वैष्णव जन तेने  कहिये’ एक ऐसा भजन है, जिसमें सभी धर्मों का सार है। उन्होंने बताया कि यह भजन गांधी के दक्षिण अफ्रीका में गाए जानेवाले भजनों में एक था और इसे कभी ‘ मुस्लिम जन’ तो कभी ‘पारसी जन तो तेने कहिये’ के रूप में गाया जाता था।
     
नारायण भाई देसाई ने गांधी कथा का पहला दिन पांच  गीतों के आधार पर केन्दित रखा। इन गीतों में‘ गांधी का चरित्र सदा एक और अखंडित था’, ‘सत्य एक चिंतन,सत्य की अराधना’, ‘प्यारी मां की साक्षी में जो प्रण लिये हैं’ और जोड़ दी हमने प्रीत, जगत संग जोड़ी हमने प्रीत’ आदि थे। बापू के वचपन में उनके सत्य लगन की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए नारायण देसाई ने बापू के मन की उस यात्रा का विवरण पेश किया, जिसमें उनकी सत्य निष्ठा और संकल्पशक्ति का दुर्लभ विकास हुआ। उन संस्मरणों को भी पेश किया जो उनकी आत्मकथा में नहीं मिलता है, लेकिन शोधार्थियों ने खोज की।
                      
उन्होंने कहा कि गांधी की प्रासंगिकता पर सवाल सिर्फ भारत में उठाये जाते हैं। सवाल यह होना चाहिये कि गांधी के लिये हम कितने प्रासंगिक हैं? उन्होंने कहा कि मानवीय मूल्यों के ह्रास ने गांधी को प्रासंगिक किया। सामान्य आदमी की लाचारी के मुद्दे पर गांधी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि नोवाखाली ने उन्होंने बंगला में अपना पहला संदेश दिया कि-‘ मेरा जीवन ही मेरा पहला संदेश है।’ अक्सर होता यह है कि लोग गांधी के एक ही पहलू पर विचार करते हैं कि गांधी राजनीतिज्ञ थे या महात्मा, अर्थशास्त्री थे या नीतिकार, गांधी को समझना है तो समग्रता के साथ समझ सकते हैं। उनकी लाक्षणिकता थी कि वे नित्य विकासशील थे। उन्हें केवल सत्य की परवाह थी। सत्य वोलना, सत्य सोचना , सत्य करना यह उनके व्यक्तित्व में शामिल था। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि सत्य उनके लिये सहज था तथा अहिंसा और अपरिग्रह आयास था। सत्य की एक चोटी से दूसरे चोटी तक उन्होंने आरोहण किया। इसके लिये उन्होंने आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण और आत्मशोधन को अपनाया। छोटी से छोटी गलती को भी वे बड़ा करके प्रस्तुत करते थे ताकि इसकी पुनरावृति न हो।
         
कथा के माध्यम से गांधी के व्यक्तित्व की मीमांसा करते हुए कहा कि संकल्प को वे आत्मा की ताकत मानते थे। इसी संकल्प का प्रयोग उन्होंने विभिन्न आंदोलनों में किया। मजबूत संकल्प उन्हें उनकी प्रतिज्ञा से डिगा नहीं पाया। विलायत जाने से पहले उन्होंने जब तीन प्रतिज्ञा ली तो इसका निर्वहन आजीवन किया। बीमारी की अवस्था में जब शाकाहार छोड़ने के लिये डाक्टरों ने प्रेरित किया तो गांधी का एक ही सवाल था कि क्या मांसाहार अपनाने के बाद नहीं मरूंगा तो डाक्टर ने एक ही जवाब दिया कि जीना मरना तो ईश्वर के हाथ में है। जब जीना मरना ईश्वर के हाथ में है तो फिर मैं क्यों अपनी प्रतिज्ञा छोंड़ू। उन्होंने कहा कि गांधी कहा करते थे कि प्रतिज्ञा लेने से सत्य का मार्ग आसान हो जाता है।
      
गांधी कथा,महात्मा गांधी के दर्शन की संगीतमय प्रस्तुति है। इसे संगीतमय बनाया सुधांशु वहुगुणा, भावना रावत, भास्कर बोस, प्रतीक गौड़ तथा वदरजहां ने । तबले पर इनके साथ कुलदीप कुमार और बांसुरी पर संगत कर रहे थे विनय कुमार।आरंभ में सर्व सेवा संघ की अध्य़़क्षा राधा वहन ने दीप प्रज्जवलित किया। इस मौके पर गांधी स्मृति और दर्शन समिति की उपाघ्यक्षा और महात्मा गांधी की पौत्री तारा गांधी भट्टाचार्य ने कहा कि नारायण भाई आज के समय में गांधी परिवार के सबसे वरिष्ठ है। उनके मुख गांधीकथा का श्रवण लोगों को एक प्रेरणा देगा।
        
गांधी स्मृति और दर्शन समिति की निदेशिका मणिमाला ने नारायण भाई देसाई और उनके साथ आये कलाकरों को अंगवस्त्र से सम्मानित किया।कार्यक्रम में स्वामी अग्निवेश, शरद् यादव, रामबहादुर राय, वीरू भाई शेख, अनुपनम मिश्र, सुरेन्द्र कुमार, सुधीर वत्स, राजीव रजन गिरि, ग्लोवल गांधी फोरम के अध्यक्ष बाबूलाल शर्मा सहित राजधानी के साहित्यकारो, चिंतकों तथा विचारकों ने हिस्सा लिया ।


कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com 
मो - 09304706646

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