एके हंगल ने वामपंथ और माक्र्सवाद के प्रति अपनी आस्था को आजीवन बरकरार रखा। - Apni Maati: News Portal

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सोमवार, अगस्त 27, 2012

एके हंगल ने वामपंथ और माक्र्सवाद के प्रति अपनी आस्था को आजीवन बरकरार रखा।


  • एके हंगल भारत-पाकिस्तान की साझी प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे: प्रणय कृष्ण
  • रंगकर्मी-फिल्म अभिनेता एके हंगल के निधन पर जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि 

नई दिल्ली
26 अगस्त 2012
मशहूर वामपंथी रंगकर्मी, स्वाधीनता सेनानी और फिल्मों के लोकप्रिय चरित्र अभिनेता एके हंगल का 95 वर्ष की उम्र में आज लंबी बीमारी से बंबई में निधन हो गया। इंडियन पीपुल्स थियेटर-इप्टा और प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से संबद्ध एके हंगल ने वामपंथ और माक्र्सवाद के प्रति अपनी आस्था को आजीवन बरकरार रखा। 1917 में जन्में हंगल के बचपन का ज्यादातर समय पेशावर में गुजरा। उनके परिवार में कई लोग अंग्रेजी राज में अफसर थे और वे चाहते थे कि एके हंगल भी अफसर ही बनें, लेकिन उन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता संघर्ष में लगाने का फैसला कर लिया था, उन्हें अंग्रेजों की गुलामी कबूल नहीं थी। आजादी की लड़ाई में वे जेल भी गए। बलराज साहनी, कैफी आजमी सरीखे अपने साथियों के साथ वे सांस्कृतिक परिवर्तन के संघर्ष में शामिल हुए। कराची में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव रहे। सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलनों और मजदूर आंदोलनों के साथ एक प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के बतौर उनका जुड़ाव रहा। वे 
भारत-पाकिस्तान की जनता की साझी प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे। 

एके हंगल एक ऐसे संस्कृतिकर्मी थे, जिन्होंने नाटकों में काम करने के साथ-साथ आजीविका के लिए टेलरिंग का काम भी किया और इस पेशे में उन्होंने बहुतों को प्रशिक्षित भी किया। उन्होंने 18 साल की उम्र में नाटक करना शुरू कर दिया था, लेकिन फिल्मों में चालीस साल की उम्र में आए, तीसरी कसम में निभाई गई एक छोटी सी भूमिका के जरिए। उसके बाद उन्हांेने लगभग 200 फिल्मांे में काम किया और भारतीय जनता के लिए वे ऐसे आत्मीय बुजुर्ग बन गए, जिनके द्वारा निभाए गए फिल्मी चरित्रों को लोग अपने जीवन का हिस्सा समझने लगे। उन्होंने अभिनय को यथार्थ की समझदारी से जोड़ा और छोटे से छोटे दृश्यों को भी यादगार बना दिया। हिंदी फिल्मों में जब भी गरीब, लाचार उपेक्षित व्यक्तियों या समुदायों और बुजुर्ग लोगों की जिंदगी के मार्मिक दृश्यों या प्रसंगों की चर्चा होगी, तब-तब एके हंगल का बेमिसाल अभिनय याद आएगा। बावर्ची, नमकहराम, शोले, शौकीन, अभिमान, गुड्डी आदि उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्में हैं। हिंदी सिनेमा में अपराधियों और काले धन के हस्तक्षेप तथा आम जन जीवन की सच्चाइयों के गायब होने और एक भीषण आत्मकेंद्रित मध्यवर्ग की अभिरुचि के अनुरूप फिल्में बनाए जाने को लेकर वे काफी चिंतित रहते थे। 

भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। लेकिन बहुप्रशंसित और सम्मानित इस अभिनेता के जीवन के आखिरी दौर में जब कि अपने आॅटोबायोग्राफी के लिए जरूरत के तहत वे अपने पुश्तैनी घर देखने गए थे और पाकिस्तानी डे फंक्शन के आमंत्रण को स्वीकार करके वहां चले गए तो सांप्रदायिक-फासीवादी राजनीति के लिए कुख्यात शिवसेना के प्रमुख ने 1993 में देशद्रोह का आरोप लगाकर उनकी फिल्मों पर बैन लगा दिया था। उनकी फिल्मों को थियेटर्स से हटा दिया गया था। फिल्मों के पोस्टर फाड़े गए थे और एके हंगल के पुतले जलाए गए थे, फोन से धमकियां भी दी गई थीं। दो साल तक उनका बहिष्कार किया गया। उस वक्त उन्होंने कहा था कि वे स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, उन्हें किसी से कैरेक्टर सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है।

बेशक जनता का सम्मान और सर्टिफिकेट किसी भी संस्कृतिकर्मी के लिए बड़ा सम्मान और सर्टिफिकेट होता है और यह एके हंगल को मिला। वे भारत-पाकिस्तान दोनों देशों में प्रगतिशील-जनवादी मूल्यों और मनुष्य के अधिकार के लिए लड़ने वाले सारे संस्कृतिकर्मियों और आंदोलनकारियों के जीवित पुरखे थे। देश में बढ़ती पूंजीवादी अपसंस्कृति, श्रमविरोधी राजनीतिक संस्कृति, सांप्रदायिक-अंधराष्ट्रवादी विचारों के विरोध में गरीबों-बेबसों और मेहनतकशों की जिंदगी की पीड़ा और आकांक्षा को अभिव्यक्ति देना तथा उनकी एकता को मजबूत करना ही एके हंगल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जन संस्कृति मंच उनके निधन पर गहरी शोक संवेदना जाहिर करते हुए उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेता है। 

प्रणय कृष्ण 
राष्ट्रीय महासचिव
जन संस्कृति मंच
मोबाइल- 09415637908

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