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बुधवार, जून 13, 2012

शिक्षा का मूल मकसद महोबत, खुशी और ईल्म का बिस्तार होना चाहिये।


उदयपुर, 12 जून । 

शिक्षा का मूल मकसद महोबत, खुशी और ईल्म का बिस्तार होना चाहिये। बालको के लिये शिक्षा भय और प्रतिस्पर्धा रहित होनी चाहिये। उक्त विचार नोबेल पुरूष्कार के लिये नामित ईन्स्टीट्यूट ऑफ डवलपमेन्ट स्टडीज, पाकिस्तान की संस्थापक डॉ. कूरतलेन व बक्तियारी ने डॉ. मोहन सिंह मेहता मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित व्याख्यान में व्यक्त किये।  ब्रिटीश राज्य द्वारा प्रदत्त आधुनिक शिक्षा प्रणाली समाज में विद्वेष फैलाती है। 

भारत पाक विकास की चुनौतिया विषय पर व्याख्यान देते हुये डॉ.बक्तियारी ने कहा कि सामुदायिक चेतना तथा शिक्षण के अभाव में बालिका शिक्षा के प्रति समाज में जागरूकता का अभाव है डॉ. बक्तियारी ने आगे कहा कि बलूचिस्तान में आई.डी.एस.पी. द्वारा दो हजार दो सौ बालिका विद्यालयों के मार्फत विगत सात वर्षो में ग्यारह हजार विद्यार्थी स्नातक हुये है जबकि बलूचिस्तान को अति पिछडा प्रदेश माना जाता है विद्यालयी शिक्षा को मात्र भाषा में दिये जाने की वकालत करते हुये डॉ. कूरतलेन ने कहा कि विद्यालय ज्ञान के केन्द्र होने चाहिये भाषा परिवर्तन के नही।

प्रश्नोतर करते हुये डॉ. बक्तियारी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान में बहूत अन्तर नही है, उन्होने कहा कि व्यक्तिगत रूप से मैरा मानना है कि दोनो देशों में जो भी सकारात्मक हो रहा है उसे बढ़ाने की जरूरत है। व्याख्यान में मनिष जैन, ईस्माईल अली, दुर्गा अब्दुल अजीज, शान्तीलाल भण्डारी, रवि भण्डारी, फातमा बानू, ज्योसना झाला, चन्द्रा भण्डारी वास्तुकार बी.एल.मंत्री ने भी विचार व्यक्त किया । व्याख्यान के प्रारम्भ में ट्रस्ट सचिव नन्दकिशोर शर्मा ने स्वागत किया। अध्यक्षता विजय एस मेहता ने की तथा धन्यवाद विद्याभवन के अध्यक्ष रियाज तहसीन ने ज्ञापित किया। व्याख्यान के अन्त में शायर मुश्ताक चंचल ने आओ मिल जाये हम नज्म प्रस्तुत की। 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-नितेश सिंह कच्छावा
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