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शनिवार, मई 19, 2012

नवउदारवादी व्यवस्था ने भूमि सुधार की अवधारणा को ही नष्ट कर दिया


भूमि समस्या का समाधान अर्थिक तथा सामाजिक नजरिये से होः सेक्सना
                                                

नई दिल्ली,16 मई,2012 
बिहार सरकार के पूर्व मुख्य सचिव के बी सक्सेना ने कहा है कि भूमि समस्या का समाधान आर्थिक तथा सामाजिक नजरिये दोनो से किया जाना चाहिये, तभी समग्र भूमि सुधार का उद्देश्य सार्थक सिद्ध हो पायेगा। उन्होंने यह बात स्थानीय गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार  में निदान फाउंडेशन की ओर से आयोजित ‘ हमारी  जमीन की समस्याः सरकार समाज और सत्याग्रह’ विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।

        भूमि से जुड़े सवाल को विभिन्न संदर्भों में रेखांकित करते हुए सेक्सना ने कहा कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था से जहां समाज का विभाजन हुआ, वहीं दलित समाज भूमि के अधिकार से वंचित कर दिये गये। पहले जमीन को लोग उपयोग का साधन मानते थे, अब उपभोग का साधन हो गया। अंग्रेजों के आगमन के बाद स्थितियों में वदलाव आया। जीविका के साधन के वजाय यह व्यपारिक साधन हो गयी। खेती की व्यवस्था बदल दी गयी। जमीन की बंदोवस्ती की गयी, जमींदारी कानून लागू किये गये। आजादी के बाद नीति निर्धारकों ने इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं किये गये। नवउदारवादी व्यवस्था ने भूमि सुधार की अवधारणा को ही नष्ट कर दिया गया तथा कारपोरेट से तो इसे उलट कर ही रख दिया।

                    बिहार से आये जेपी आंदोलन के योद्धा रामशरण ने कहा कि 1982 मेंु भागलपुर में गंगा मुक्ति आंदोलन जलकर जमींदारी को लेकर आरंभ किया गया। उससे पहले वोधगया में भूमि मुक्ति आंदोलन हुआ। आज दोनो जगहों की स्थितियां भिन्न है। जलकर जमींदारी खत्म हो गयी, लेकिन मछुआरों की स्थिति और भी खराब हो गयी, उनका पलायन हो रहा है। जलकर जमींदारी तो खत्म हो गयी, लेकिन डाल्फिन अभ्यारण बना दिया गया। बिहार में ढाई लाख एकड़ जमीन अभी भी वितरण के लिये शेष है।

                  डॉ वर्तिका नंदा ने कहा कि मीडिया जमीन समस्या जैसे गंभीर मुद्दे पर ध्यान नहीं देता । मीडिया गरीबों का मुद्दा भी तब उठाता है जब उसे मुनाफा दिखता है।लखनउ से आयी नाहिदा ने जमीन पर अल्पसंख्यकों के अधिकार पर कहा कि इस मामले में कहीं कोई आवाज भी नहीं उठती। उन्होंने वक्फ बोर्ड की जमीन के दुरूपयोग पर रोक लगाने की मांग की।

        पिछले सात महीनों से देश भर में समग्र भूमि सुधार की मांग को लेकर जनसंवाद यात्रा पर निकले एकता परिषद के राष्ट्र्ीय अध्यक्ष पी व्ही राजगोपाल के प्रयासों की चर्चा रमेश शर्मा ने कहा कि जमीन आंदोलन की कामयावी से न सिर्फ भूमिहीनो और आदिवासियों को लाभ होगा, बल्कि देश में अमन चैन की वयार भी बहेगी। श्री शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री हमारी मांगों पर ध्यान नहीं देंगे तो इस साल गांधी जयंती के दिन एक लाख सत्याग्रही ग्वालियर से पैदल चलकर दिल्ली आकर दवाब डालने के लिये मजबूर होंगे।

           दो स़त्रों में चले इस संगोष्ठी की अध्यक्षता क्रमशः पीएम त्रिपाठी और बाबूलाल शर्मा ने की। कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कहा कि जमीन की लड़ाई में गरीबों के मध्य वर्ग को भी शामिल होना होगा। इन दोनो सत्रों में उर्मिधीर, लीना मलहोत्रा राव, एसपी वर्मा, संजय ब्रह्मचारी, हसन जावेद, कुमार कृष्णन, अलका भारती, ललित बाबर, रौशनलाल अग्रवाल, अरविंद सिकरवार ने भी अपने विचार रखे। निदान फाउडेशन की संस्थापक सचिव सफी आरा को समर्पित इस ंसंगोष्ठी में उनको दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गयी।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

कुमार कृष्णन
मीडिया इन्चार्ज@जन संवाद यात्रा, 
एकता परिषद
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, 
सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन ,
 मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com 
मो - 09304706646

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