''जन्म और शिक्षा की भाषा अलग होने से सीखने की निरंतरता पर आघात पहुँचता है। ''-गिरीश उपाध्याय - Apni Maati: News Portal

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बुधवार, मई 16, 2012

''जन्म और शिक्षा की भाषा अलग होने से सीखने की निरंतरता पर आघात पहुँचता है। ''-गिरीश उपाध्याय


भोपाल, ११ मई।
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा ‘मातृभाषा में शिक्षा और संचार’ विषय पर त्रिदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर के शुभारंभ सत्र में अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए मा.प.सं.वि. के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि कोई भी जागृत समाज अपने लिए श्रेष्ठ विकल्पों का ही चयन करता है। उसे यह तय करना चाहिए कि उसकी शिक्षा और संवाद की भाषा क्या हो। उन्होंने कहा कि १९० साल की अंग्रेजों की गुलामी ने हमारी सोच, प्रक्रिया, भाषा, जीवनशैली सब पर असर डाला पर आजादी के इन सालों में भी हम उस मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके। जबकि हमारे पास संस्कृत सहित न जाने कितनी भारतीय भाषाओं और बोलियों का जीवंत संसार है तो हमने क्यों विदेशी भाषा की बेडियाँ डाल रखी हैं? आज गूगल भारतीय भाषाओं में काम करने लगा है, वह उसमें अवसर और संभावनाएँ ढूँढ़ रहा है किंतु अफसोस कि हमारे लोग इसे नहीं समझते। उनका कहना था कि शिक्षा व संवाद भारतीय भाषाओं में होना चाहिए इसके लिए निर्णायक लड़ाई लड़ने और कार्ययोजना बनाने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने कहा कि बच्चे के जन्म के समय जो भाषा उसके साथ होती है, वही उसकी शिक्षा के लिए सबसे उपयोगी है। जन्म और शिक्षा की भाषा अलग होने से सीखने की निरंतरता पर आघात पहुँचता है। कई बच्चे इसे सह नहीं पाते और वे सिर्फ एक भाषा के नाते जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। संचार की भाषा में स्थानीय संस्कार ही उसे प्रवाहमान और समृद्ध बनाते हैं। हिंदी में अँग्रेजी की अतिवादी घुसपैठ ठीक नहीं है, किंतु सहजता से कुछ आ रहा है तो उसे स्वीकारना चाहिए। हिंदी और भारतीय भाषाओं में इतनी शक्ति है कि वे सबको साथ लेकर चल सकती हैं।

आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने कहा कि देश में न्यास द्वारा आयोजित यह पहली कार्यशाला है जिसमें १० राज्यों से आए लगभग ७० प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इसमें लिए गए संकल्पों को लागू किया जाएगा। उनका कहना था कि योजनापूर्वक यह भ्रम फैलाया गया है कि अँग्रेजी के बिना किसी व्यक्ति और राष्ट्र की प्रगति नहीं हो सकती। उन्होंने सवाल किया कि जापान, चीन, जर्मनी, इजरायल ने प्रगति क्या अँग्रेजी के बल पर की है। उन्होंने कहा कि हमें भ्रम के बादल हटाने और हवा का रुख मोड़ने के लिए काम करना होगा। यह काम भारतीय भाषाओं की एकता से ही हो सकता है। कार्यक्रम के अन्य सत्रों में म.प्र. साहित्य अकादमी के निदेशक डा. त्रिभुवननाथ शुक्ल, साहित्यकार प्रभु जोशी, गोविंद प्रसाद शर्मा, महेशचंद्र गुप्त, शिक्षाविद् दीनानाथ बत्रा ने अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर पत्रकार रामभुवन सिंह कुशवाह, सुरेश शर्मा, जीके छिब्बर, सामाजिक कार्यकर्ता रामदत्त चक्रधर, अनिल सौमित्र, पत्रकारिता विश्वविद्यालय के रेक्टर सीपी अग्रवाल, दीपक शर्मा, रजिस्ट्रार चंदर सोनाने सहित नगर के अनेक साहित्यकार, पत्रकार एवं प्राध्यापक मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन राघवेंद्र सिंह ने और आभार प्रदर्शन ए. विनोद (केरल) ने किया।

कार्यशाला के दूसरे सत्र में पधारे मध्यप्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि हमें यह देखना होगा कि देश में आज कितने प्रतिशत लोग अँग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं और कितने भारतीय भाषाओं के माध्यम से। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने हमारी सभ्यता और संस्कृति पर चोट पहुँचाई। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों की तरफ लौटें और जो कुछ छूट रहा है उसे बचाने की कोशिश करें। देश की युवा शक्ति का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि नया कुछ करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि हमें अपनी विरासतों को सहेजने और संभालने की आवश्यकता है। गृहमंत्री ने कहा कि हमें जापान से सीखना होगा जिसने अपनी भाषा, ईमानदारी और अनुशासन से पूरी दुनिया को एक पाठ पढ़ाया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने का काम घर से शुरू करें और इसे एक जनांदोलन का स्वरूप प्रदान करें।

कार्यशाला के दूसरे दिन १२ मई को पहला सत्र में 'राष्ट्रीय एकता व अखंडता में हिंदी व भारतीय भाषाओं का योगदान' विषय पर आधारित था। इस अवसर पर अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकुमार अष्ठाना ने कहा कि मातृभाषाओं को सम्मान दिए बिना राष्ट्रीय अस्मिता बचाई नहीं जा सकती। हमें सरकारी कामकाज से लेकर समाज जीवन के हर क्षेत्र में मातृभाषाओं को स्थापित करना होगा। वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि अंग्रेजों ने हर क्षेत्र में भारतीयों की पद्धति को नष्ट किया है और जनता की सामूहिक शक्ति को बाँट दिया। भारतीय भाषाएँ इस देश को जोड़ने का काम कर रही हैं जबकि अँग्रेजी युवाओं को कुंठित कर रही है और विभाजन के बीज बो रही है। म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सचिव कैलाशचंद्र पंत ने कहा कि भारत एक राजनीतिक राज्य नहीं है बल्कि यह सांस्कृतिक तौर पर एक राष्ट्र है। भारत में हर समय एकता विद्यमान रही है। भारतीय भाषाएँ और उनका साहित्य हमें जोडने का सूत्र उपलब्ध कराते हैं। श्री महेश चंद्र गुप्त ने कहा कि हमें जो धरोहर के रूप में मिला वही हमारी संस्कृति है। शब्द स्वतंत्र होता है और उसमें जब क्रिया का संस्कार होता है तो वाक्य बनता है। यही संस्कार है जो हमारी भाषा में है। डा. जवाहर कर्नावट का कहना था कि भाषायी लोकपाल का गठन हो तथा बैंकिग व आर्थिक गतिविधियों में भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़ाया जाए। सरकारी कामों में प्रयोग होने वाली हिंदी लोगों को कठिन लगती है इसे सरल बनाने की आवश्यकता है। श्री जगदीश नारायण राय ने कहा कि हिंदी और भारतीय भाषाओं का प्रयोग हर क्षेत्र में बढ़ाने की आवश्यकता है। इस दिन दूसरे सत्र का विषय- 'सरकारी कामकाज में हिंदी और भारतीय भाषाएँ', तीसरे सत्र का विषय 'प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम हिंदी एवं भारतीय भाषाएँ', चौथे सत्र का विषय 'उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा कामाध्यम भारतीय भाषाएँ', तथा पाँचवें सत्र का विषय था- पत्रकारिता एवं भारतीय भाषाएँ। इन सत्रों में इंडिया टुडे के पूर्व कार्यकारी संपादक जगदीश उपासने, प्रो. पीयूष त्रिवेदी, डा. विजय अग्रवाल, डा. जगदीश कर्नावट, नाहर सिंह वर्मा, जगदीश नारायण, डा. मनोहर भंडारी एवं रमेश शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किये।

कार्यशाला के तीसरे दिन- ‘सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-प्रशासन में भारतीय भाषाएँ’, ‘न्यायपालिका और भारतीय भाषाएँ’ विषय पर चर्चा हुई। जिसमें प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद के निदेशक डा. राजीव संगल, सरमन नियाल, अशोक चतुर्वेदी, डी. भरत कुमार, पुरूषेंद्र कौरव अपने विचार व्यक्त किये इसके अतिरिक्त मातृभाषाओं के विकास और सभी क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति के लिए एक कार्ययोजना भी बनाई गई। इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि मातृभाषाओं की एकता और अंतर्संवाद के लिए प्रयास तेज करने की आवश्यकता है ताकि भारतीय भाषाएँ मिलकर अँग्रेजी के साम्राज्यवाद का मुकाबला कर सकें। उनका कहना था कि सिर्फ भावना और भावुकता के स्तर पर नहीं वरन हमें अपनी भाषाओं को कर्म के स्तर पर समर्थ बनना होगा। समाज में आत्मविश्वास भरना होगा ताकि हम अपनी भारतीय भाषाओं पर गर्व कर सकें। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की वैज्ञानिकता और तार्किकता प्रमाणित है, अब इसे दिलोदिमाग में स्थापित करने की आवश्यकता है। संचार, संवाद, मीडिया और शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ बनें यह प्रयास हर तरफ से तेज करने की आवश्यकता है। समाज जागृत होगा तो परिवर्तन आएगा।

उन्होंने बताया पत्रकारिता विश्वविद्यालय हिंदी के लिए समर्थ शब्द संशोधक मार्गदर्शिका (स्पेल चेक) पर काम कर रहा है ताकि मीडिया और शिक्षा क्षेत्र की एक बड़ी आवश्यकता पूरी हो सके। इसके साथ ही हिंदी में पाठ्यपुस्तकों की आवश्यकता पूरी करने के लिए मीडिया शिक्षा के विविध क्षेत्रों में १७ पुस्तकों के प्रकाशन की योजना पर विश्वविद्यालय काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों व पत्रकारों का एक राष्ट्रीय विमर्श पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित किया जाएगा। इसी तरह भोपाल में रह रहे भारतीय भाषाओं के लेखकों व पत्रकारों का सम्मेलन भी स्थानीय स्तर पर आयोजित किया जाएगा। ताकि भारतीय भाषाओं के लेखक व पत्रकार एक दूसरे के साथ विचारों का आदान- प्रदान कर अपने अनुभवों को समृद्ध कर सकें। समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात शिक्षाविद् दीनानाथ बत्रा ने कहा कि हमें ‘इंडिया दैट इज भारत’ नामक वाक्य ने बहुत नुकसान पहुँचाया है। इस अकेले वाक्य ने हमारी सोच, समझ, चिंतन और आत्मविश्वास को चोट पहुँचाई है। हमारी संस्कृति के पास अपने मूल्यों के आधार पर दुनिया के मार्गदर्शन की क्षमता थी किंतु हमारी आत्मविश्वासहीनता ने सारा कुछ बिगाड़ कर रख दिया। आज भी दुनिया को अगर रास्ता दिखा सकती है तो वह भारत की संस्कृति है जो पूरी पृथ्वी व मानवता का विचार करती है। वसुधैव कुटुंबकम का मंत्र देती है। उनका कहना था कि भाषा के आधार पर ही हम अपना नया भारत बना सकते हैं। जो हमें आत्मविश्वास से भरकर वर्तमान चुनौतियों से जूझने की शक्ति देगा।

इसके पूर्व प्रातः के सत्र में “सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-प्रशासन में भारतीय भाषाएँ” विषय पर चर्चा हुयी। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए मप्र विधानसभा के पूर्व सचिव अशोक चतुर्वेदी ने कहा कि ई-शासन दरअसल सुशासन का ही विस्तार है।आज हम एक अलग तरह का विश्व समाज और नागरिक समाज बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से भूगोल की सीमाएँ टूट रही हैं। एक नई विश्वव्यवस्था बन रही है। संसदीय लोकतंत्र इस नई प्रौद्योगिकी को अनूकूल दिख रहा है। जिससे एक जवाबदेह, पारदर्शी शासन खड़ा जरूर होगा और नागरिक चेतना का विस्तार भी होगा। उन्होंने कहा आवश्यकता इस बात की है कि हम तेजी के साथ नई तकनीक का विस्तार, उपयोग और प्रचार करें। ई-गर्वनेंस हमारी तमाम समस्याओं का समाधान कर देगा और बड़े प्रतिशत में भ्रष्टाचार को भी नियंत्रित कर सकता है। इस सत्र में ब्लागर रवि रतलामी, एमपी पोस्ट डाटकाम के संपादक सरमन नगेले ने अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन डा. पी.शशिकला ने और आभार प्रदर्शन लालबहादुर ओझा ने किया। इसके अतिरिक्त “न्यायपालिका और भारतीय भाषाएँ” पर केंद्रित सत्र में डी. भरत कुमार, पुरूषेंद्र कौरव और जीके छिब्बर ने अपने विचार व्यक्त किए। तीन दिवसीय कार्यशाला के समापन पर न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने आगामी कार्ययोजना प्रस्तुत की जिसके तहत इस अभियान को देश के विभिन्न प्रांतों तक पहुँचाने के लिए अनेक कार्यक्रम तय किए गए।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-(संजय द्विवेदी)
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