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शनिवार, अप्रैल 14, 2012

जातीय सत्ता के नारे के कारण स्पर्धात्मक राजनीति तेज हुई


प्रलेसं का राष्ट्रीय सम्मेलन

प्रगतिशील लेखक संघ का 15वां राष्ट्रीय सम्मेलन 12 अप्रैल गुरुवार को दिल्ली विश्वविद्यालय में शुरू हुआ। तीन दिवसीय इस सम्मेलन में देश-विदेश के करीब 300 तरक्कीपसंद लेखकों ने हिस्सेदारी की। पहले दिन उदघाटन सत्र की शुरुआत अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष नामवर सिंह के भाषण से हुई। ‘‘शांति और सहयोग के लिए लेखन’’ विषय पर केंद्रित इस सत्र का विषय प्रवेश वरिष्ठ लेखक डा.  असगर अली इंजिनियर ने किया। अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो तुलसीराम ने कहा कि पुरातन विचारधाराएं जब राजनीति पर हावी होती हैं, तो लेखन भी उससे प्रभावित होता है। जातिवाद के नए सिरे से सिर उठाने के साथ ही उसके नायक भी उभरे हैं। जातीय सत्ता के नारे के कारण स्पर्धात्मक राजनीति तेज हुई, जिसके खतरे आज सामने हैं। इजिप्ट से आए लेखक हिल्मी हदीदी, तमिलनाडु से आए वरिष्ठ लेखक पुन्नीलम, खगेंद्र ठाकुर, विश्वनाथ त्रिपाठी, पाकिस्तान के बाबर आयाज, जापान से आए लेखक आकियो हागा, ने भी सत्र को संबांधित किया। संचालन अली जावेद ने किया।

सम्मेलन के दूसरे सत्र में ‘‘शांति और सौहार्दपूर्ण विश्व में लेखक की भूमिका’’ विषय पर प्रगतिशील लेखकों ने अपने विचार व्यक्त किए। विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि कलाएं शांति और सौहार्द की संवाहक होती हैं, इसलिए लेखकों की खासतौर से विरासत ही शांति और सौहार्द की रही है। शांति और सौहार्द की विरोधी शक्तियां सबसे पहले भाषा और संस्कृति पर ही चोट करती हैं। इन्हें बचाने के लिए एकजुट होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद को तेज रफ्तार चाहिए होती है, वह सड़क से लेकर बाजार तक में तेजी चाहता है। यह तेजी नई चीजें भी पैदा करती है, लेकिन नयापन आधुनिकता का पर्याय नहीं होता। मूल्यों के साथ आने वाला नयापन आधुनिकता है। उन्होंने कहा कि विकल्प नहीं होगा, तो अतिवाद फैलेगा। अतिवाद सत्ता के हित में होता है। उन्होंने कहा कि हमें अतिवादियों के उद्देश्य से कोई विरोध नहीं है, उनके तौर तरीकों से विरोध है।

केरल से आए केपी राम नूनी ने कहा कि मलयालम साहित्य की धारा शुरूआत से ही साम्राज्यवाद विरोधी रही है। बीच में भटकाव आया लेकिन आज फिर बाजारवाद और नव साम्राज्यवाद के खिलाफ यह धारा अपना काम कर रही है। महाराष्ट्र से आए श्रीपाद जोशी ने कहा कि सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का चेहरा बदल रहा है। भूमंडलीकरण के बाद वर्चस्ववाद का चेहरा भी बदल गया है। इसके साथ ही वर्ग भी नए सिरे से बन रहे हैं, लेकिन यह सत्ता के पक्ष में हैं। ब्राहमणवाद के विरोध में जो लोग सामने आए थे, वे भी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की नीतियां बना रहे हैं।

कोलकाता से आए गीतेष शर्मा ने कहा कि साम्राज्यवाद के विरोध के एक पक्ष से बदलाव नहीं होगा, हमें अपने भीतर की खामियों को भी देखना होगा। हम सामंतवाद, भ्रष्टाचार और नौकरशाही से पीडि़त हैं। जो साम्राज्यवाद से भी ज्यादा शक्तिशाली है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में एक जैसे हालात हैं, दोनों ही देशों में सांप्रदायिकता के खिलाफ दोहरी मानसिकता से खड़ा हुआ जा रहा है। बहुसंख्यक धार्मिकता का विरोध करते हुए अल्पसंख्यक कट्टरता की ओर भी ध्यान देना चाहिए।

पंजाब के रजनीश बहादुर ने कहा कि लेखकों के सामने चुनौतियां हैं, और वे उसका मुकाबला भी कर रहे हैं। पंजाब में खालिस्तान मूवमेंट का विरोध करने वालों में वाम पक्ष सबसे आगे था, लेकिन उसके बाद लेखकों ने ही अलगाववाद का विरोध किया था। उड़ीसा से आए एसबी कार, शाहिना रिजवी, व्ही मोहनदास, बंगाल से कुसुम जैन, पंजाब के जोगिंदर अमल, तमिलनाडु के पुन्नीलम ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। दूसरे सत्र का संचालन श्री राकेश ने किया।पहले दिन के तीसरे सत्र में विभिन्न राज्यों से आए कवियों, शायरों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। काव्यपाठ एवं मुशायरे की अध्यक्षता चैथीराम यादव ने की, जबकि संचालन विनीत तिवारी ने किया।

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