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शुक्रवार, मार्च 23, 2012

हमारा वश चले तो विश्व को डार्कज़ोन में तब्दील दें.


उदयपुर 23 मार्च 2012 
नन्दकिशोर शर्मा की रपट:विश्व जल दिवस के  अवसर पर आयोजित संवाद की अध्यक्षता विद्याभवन के अध्यक्ष रियाज तहसीन ने की। मुख्य वक्तव्य झील संरक्षण समिति के सह-सचिव एवं प्राचार्य, विद्याभवन, पॉलोटेक्निक अनिल मेहता ने दिया तथा संयोजन करते हुए विश्व जल दिवस की महत्ता , इतिहास एंव जलवायु परिवर्तन के दौर मे चुनौती पर  डॉ0 मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के सचिव नन्दकिशोर शर्मा ने प्रकाश डाला।

रियाज तहसीन, अध्यक्ष, विद्याभवन- ने कहा कि विश्व जल दिवस को वर्ष में एक दिन मनाने के बजाय पूरे वर्ष को जल संरक्षण दिवस के रूप में मनाने की जरूरत है।  भू-जल का बेहताश दोहन विश्व को डार्कजॉन में तब्दील कर देगा। जल का अति दोहन एवं अपव्यय उपयोग अर्थ आधारित मनःस्थिति का परिणाम है। यदि नागरिक जल का मितव्ययी प्रयोग करे तथा जलदाय विभाग पर्याप्त पानी देने की व्यवस्था कर दे तो किसी भी हैण्डपम्प अथवा टयूबवेल की जरूरत नहीं होगी। 

अनिल मेहता, झील संरक्षरण समिति- आयड नदी में बढता प्रदूषण चिन्ताजनक है । आयड नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए  ईको तकनीक की जरूरत है। झीलों  से पानी के दोहन की भी कोई संचालन  नीति बननी चाहिये ताकि पेयजल आपूर्ति के साथ-साथ हर परिस्थिति में झीलों के ईको सिस्टमके लिये भी पानी बचा रहे। 

ओ0पी0 माथुर, पूर्व निदेशक, केन्द्रीय भू-जल बोर्ड,-भू-जल की स्थिति बहुत   चिन्ताजनक है इस पर विधायी रोक के साथ-साथ भूजल के नियत्रित उपयोग, पुर्नभरण तथा प्रदूषण मुक्ति के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर शोध आयोजित होने चाहिये.

शांतिलाल भण्डारी- सजीव सेवा समिति- पानी का मितव्ययी उपयोग करे। डिटरजेन्ट के बढते उपयोग से जहां कपडे धोने में अधिक पानी की जरूरत होती है वहीं डिटरजेन्ट से झीलों की  गुणवत्ता खराब होती है। हमें डिटरजेन्ट पर रोक लगा कर तेल आधारित साबुन उपयोग में लेने चाहिए।

बी0के0 गुप्ता, संस्थापक, अलर्ट संस्थान,- गांवों में स्वच्छ जल की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिये, अलगे दस वर्ष में सरकार ग्रामों में साफ पानी भी उपलब्ध करवावे तो जलदिवस की सार्थकता है । 

  1. भंवरसिंह राजावत, ज्वाला जन जागृति संस्थान- सिंचाई की नहरो एवं सार्वजनिक 
  2. जल वितरण में उचित जल प्रबन्धन का अभाव है । खेती में कम पानी से 
  3. अधिकतम फसल लेने के तरीकों पर किसानों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।  


सुशील दशोरा, पूर्व निदेशक, प्रौढ शिक्षा, राजस्थान विद्यापीठ- जल वितरण की कमेटियों का ग्राम एवं शहर में मौहल्ला स्तर पर निर्माण हो, जो पानी के रिसाव पर ध्यान रखे एवं जल स्त्रोतों के प्रदूषण के निराकरण में सहयोग करें।

ए0आर0खान, पूर्व जिला कृषि अधिकारी, कृषि विभाग- पेयजल एवं सिंचाई जल वितरण में उपभोगताओं सें स्लैब रेट से लागत वसूलनी चाहिए। 

नेहासिंह-शोधकर्ता, आईआईटी, बम्बई- उदयपुर में ग्राउण्डवाटर की गवर्नेस एवं   प्रबन्धन की कोई व्यवस्था नहीं है। राज्य मेैं भूजल दोहन पर नियंत्रण के विधायी प्रावधान व कानून की जरूरत है.

ज्ञानप्रकाश सोनी, पूर्व अधिशाषी अभियन्ता, सिंचाई विभाग- उदयपुर संभाग में हम उन फसलों को उगाये जिनसे खाद्य सुरक्षा व पोषक तत्व पूर्ति होते हुए कम पानी खर्च होतो हो।  हमें सिवरेज परिशोधन की नई पर्यावरण आधारित तकनीकों को अपनाना होगा। जल के मितव्ययी उपयोग एवं गन्दे पानी के पुर्नचर्कियकरण की जरूरत पर बल दिया ।  

हाजी सरदार मोहम्मद- झीलों को कचरा पात्र होने से बचाना चाहिये । झीलों में फैलते प्रदुषण के लिये आम नागरिक व्यवसायी, उद्योग एवं प्रशासन जिम्मेदार है।

लक्ष्मीलाल टेलर, युवा समन्वयक, अलर्ट संस्थान- पानी के बचाव पर अलख जगाने की जरूरत। जनता में जल बचत एवं संरक्षण पर चेतना जाग्रति की आवश्यकता है।

एस0एल0 तम्बोली, पूर्व अभियन्ता, पीडब्ल्यूडी- टाउन प्लानिंग पर पुर्नविचार के साथ व्यक्तिगत रूप से कूलर आदि का इस्तेमाल मितव्ययीता से करें ।

तेजशंकर पालीवाल- चांदपोल नागरिक समिति- पानी के व्यवसायिकीकरण ने इसे विलासिता की वस्तु बना दिया है। उद्योगों के जल उपयोग पर निगरानी की आवश्यकता है। 

शायर मुश्ताक चंचल-विद्यालय स्तर पर ही बालकों में जल के महत्व एवं संरक्षण पर शिक्षा देने के साथ ही धर्मगुरू भी समाज में जल संरक्षण पर बल दें । शायर चंचल ने स्वरूप सागर की हालत पर कविता पाठ भी किया । 

नितेशसिंह, सामाजिक युवा कार्यकर्ता-झीलों के केचमेन्ट में वृक्षारोपण एवं मृदा संरक्षण पर गंभीर प्रयासों की जरूरत है।

डॉ0 बसन्तीलाल कूकडा- जल संरक्षण के लिये पौध रोपण एवं निर्माण, मार्बल इण्डस्ट्रीज पर जल उपयोग पर निगरानी तथा सार्वजनिक नल वितरण व्यवस्था को दुरस्त करने की जरूरत है। 

महेन्द्रकुमार गढवाल- वर्षा जल विशेषज्ञ ने वर्षा जल संरक्षण की जरूरत बतलाते हुवे सरकार से आग्रह किया कि जल संरक्षण के कार्यो को वर्षा से छह माह पूर्व स्वीकृति दी जाए। 

नन्दकिशोर शर्मा, सचिव, डॉ0 मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट- जल प्रबन्धन हेतु लम्बी अवधि की टिकाउ आयोजना करने की जरूरत है। जल स्त्रोतों, झीलों, तालाबों, की खुब सूरती बढाने के बजाए जल की गुणवत्ता के सुधार की दिशा में प्रयत्नों की जरूरत है। जनभागीदारी से ही सार्थक जल प्रबन्धन संभव है।इस अवसर पर आयड नदी प्रदुषण की ग्रीनब्रिज योजना पर फिल्म का प्रदर्शन किया गया। संभागीयों ने जल परिशोधन में ईमली के बीज, पीपल, तुलसी, केली, सहजन इत्यादि के प्रयोग के प्रभावी परिणामों पर भी चर्चा की।  परियचर्चा में पॉलिटेक्निक कम्युनिटी डवलपमेन्ट संकाय के सुधीर कुमावत, संकाय सदस्य शिवप्रकाश खुर्मी, कमलेश कुमावत, निलेश सोलंकी ने भी जल संरक्षण पर विचार रखे।

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