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कथाकार संजीव हिंदी विश्‍वविद्यालय में ‘राइटर-इन-रेजीडेंस‘

तकरीबन सवा सौ कहानियाँ, उपन्‍यास और विविध लेखन करने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकार संजीव महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में राइटर-इन-रेजीडेंस के रूप में जुड़ गए हैं।

साहित्यिक पत्रिका हंस में कार्यकारी संपादक के रूप में ख्‍यातिलब्‍ध संजीव ने समाज के झंझावातों से जूझने के लिए कलम को हथियार बनाया। किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पांव तले की दूब’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’, ‘सूत्रधार’, ‘रानी की सराय’, ‘आकाश चम्‍पा’, ‘रह गई दिशाएं इसी पार’ जैसे उपन्‍यास रचने वाले संजीव, आज साहित्‍य जगत की एक अज़ीम शख़्सियत हैं क्योंकि उनके लेखन का सरोकार संसार के सबसे कमजोर तबके के साथ जुड़ता है; साथ ही, उनके साहित्य में भारतीय समाज एवं आदिवासी संस्कृति का यथार्थ चित्र परिलक्षित होता है। 
 
उन्‍होंने तीस साल का सफरनामा’, ‘आप यहाँ हैं, भूमिका और अन्‍य कहानियाँ’, ‘प्रेतमुक्ति’, ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’, ‘ब्‍लैक होल’, ‘खोज’, ‘गति का पहला सिद्धांत’, ‘गुफा का आदमी’, ‘दस कहानियाँ’, ‘गली के मोड़ पर सूना-सा कोई दरवाजा’, ‘संजीव की कथायात्रा-पड़ाव-1,2,3’, ‘झूठी है तेतरी की दादी जैसे कथा संग्रह हिंदी जगत के पाठकों को दिए हैं। उनकी कृतियों पर जीटी वी ने काला हीरा टेली फिल्‍म तथा दूरदर्शन ने अपराध जैसी फिल्‍म का निर्माण किया है। इतना ही नहीं श्‍याम बेनेगल निर्देशित फिल्‍म वेलडन अब्‍बा भी उनकी कहानी फुलवा का पुल पर अंशत: आधारित है।
 
इन्‍दु शर्मा स्‍मृति अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मान’, भिखारी ठाकुर लोक सम्‍मान’, पहल सम्‍मान’,सुधा स्‍मृति सम्‍मान कथाक्रम सम्‍मान आदि से सम्‍मानित संजीव की रचनाधर्मिता पर टिप्‍पणी करते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार व विवि के नाट्य एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के प्रो. सुरेश शर्मा ने कहा कि संजीव नए दौर के उन कथाकारों में हैं जिन्‍होंने आज के समय को अपनी कहानियों में गहरी संवेदनात्‍मकता के साथ उजागर किया है। उनकी कहानियों के चरित्र हमें आज के यथार्थ की दुनिया के वास्‍तविक स्‍वरूप को सामने लाते हैं। उनकी भाषा में ऐन्द्रिकता और भाव प्रवणता है। इन्‍होंने हंसके संपादन में सहयोग करके साहित्यिक प‍त्रकारिता के नए मानदंड स्‍थापित किए हैं।
 
विवि के अहिंसा एवं शांति अध्‍ययन विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर व युवा कहानीकार राकेश मिश्र कहते हैं कि कथाकार संजीव के आने से निश्चित ही कैम्‍पस को नई ऊंचाईयाँ प्राप्‍त होंगी। संजीव न सिर्फ एक बेहतरीन कहानीकार हैं बल्कि उनकी उपस्थिति उनके परवर्ती रचनाकारों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रही है। नब्‍बे के दशक के अधिकांश कहानीकार जैसे- सृंजय, नरेन, गौतम सान्‍याल, जयनंदन, अवधेश प्रीत आदि कहीं न कहीं संजीव से प्रेरित कहानीकार रहे हैं। हंस के संपादन सहयोग करने से पहले भी उन्‍होंनेवागर्थ के नई पीढ़ी अंक का चयन कर इस नए रचनात्‍मकता को पहचानने में अपनी महती भूमिका निभाई थी। एक सजग प्रतिबद्ध और मेहनती कथाकार के कैंपस में रहने से यहाँ के विद्यार्थी और रचनाधर्मी लोगों को बड़ा लाभ मिल सकेगा। अपराध’, लिटरेचर’, आरोहण’,सागर सीमांत’, पूत-पूत, पूत-पूत जैसी उनकी कहानियां जन पक्षधरता की लाजवाब मिसाल है। उनकी कहानियाँ साहित्‍य और विचारधारा के अद्भुत सामंजस्‍य के साथ लिखी गई कहानियाँ हैं जिससे साहित्‍य का जनप्रतिनिधि का स्‍वरूप निर्मित होता है। राहुल सांस्‍कृत्‍यायन के बाद शोधपरक लेखन की परंपरा को संजीव ने आगे बढ़ाया है और वर्जित क्षेत्रों का अवगाहन किया है। संजीव की पहचान शोध करके लिखने वाले लेखकों की रही है। जंगल जहाँ शुरू होता है और सूत्रधार जैसे उपन्‍यास उनके दीर्घ शोध का ही नतीजा है। सद्य प्रकाशित उनका उपन्‍यास रह गई दिशाएं इसी पार’, विज्ञान की समस्‍त संभावनाओं और फंतासियों का ऐसा वास्‍तविक निरूपण करती है जो समकालीन हिंदी साहित्‍य ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा के साहित्‍य में एक अविरल उपस्थिति है।
 
कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा विश्‍वविद्यालय में राइटर-इन-रेजीडेंस पद पर नियुक्ति किए जाने पर खुशी जाहिर करते हुए संजीव ने कहा कि मैंने लेखनकार्य को ही अपना साथी समझा है,यहाँ आकर मैं दवाबों से मुक्‍त होकर समाज के लिए कुछ बेहतर दे पाऊँ तो आना सार्थक हो जाएगा। विवि की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि यह विवि अपने मिशन और विजन में नई बुलंदियों को छू रहा है। साथ ही यह अपने नाम के अनुरूप पूरी तरह से अंतरराष्‍ट्रीय बन रहा है। जिस तरह प्राचीन काल में नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला अंतरराष्‍ट्रीय विवि था, जहाँ पर विश्‍व के अनेक देशों से छात्र-अध्‍यापक अध्‍ययन-अध्‍यापन करने के लिए आते थे, उसी प्रकार यह विवि भी अपनी पहचान बना पाएगा। क्‍योंकि अब यहाँ विदेशी विद्यार्थियों, अध्‍यापकों व विशेषज्ञों को बुलाया जा रहा है। हिंदी विश्‍वविद्यालय में परंपरागत पाठ्यक्रमों से इतर मानविकी, समाजविज्ञान, प्रबंधन, आई.टी., फिल्‍म व नाटक अध्‍ययन जैसे विषयों में हिंदी माध्‍यम से उच्‍च स्‍तर पर अनुसंधान कार्य कराए जाने के संबंध में उन्‍होंने कहा कि इससे हिंदी का भूमंडलीकरण होगा। 
 
उन्‍होंने बताया कि महत्‍वपूर्ण उपन्‍यासकार के रूप में प्रसिद्ध हो चुके कुलपति विभूति नारायण राय हिंदी को आधुनिक तकनीक से जोड़ने में महारत हासिल है। यही कारण है कि वे हिंदी के संपूर्ण महत्‍वपूर्ण साहित्‍य को इंटरनेट पर उपलब्‍ध करा रहे हैं। विवि के त्‍वरित विकास की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि कुलपति ने न सिर्फ प्रशासनिक कुशलता व दूरदर्शिता से इसे एक नया मुकाम दिया है बल्कि अकादमिक गुणवत्‍ता के मामले में भी उन्‍होंने बेहतर सुविधाएं उपलब्‍ध कराई हैं। उन्‍होंने आशा जताई कियहाँ के विद्यार्थी एक बेहतर समाज के निर्माण में अपना अमूल्‍य योगदान दे सकेंगे। कथाकार संजीव की नियुक्ति पर विश्‍व‍विद्यालय के अधिकारी, अध्‍यापक, कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थियों ने बधाई दी है। 
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :- 
-अमित कुमार विश्‍वास
सहायक संपादक, म.गा.अ.हि.वि.वि., वर्धा

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