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शुक्रवार, अक्तूबर 14, 2011

आतिशबाजी:मतलब बरबादी


भीलवाड़ा
क्रूरता और संवेदनहीनता जो मानव को शैतान और राक्षसी विचारो ओत-प्रोत करता है। वह है आतिशबाजी जिसको करके दूसरे जीवो को कष्ट देकर भी आनंद की अनभूति करता है उसके दिल से दया करुणा वात्सल्यभाव का बहता झरना सूख जाता है। उक्त विचार राष्ट्रीय जैन संत कमल मुनि ’कमलेश’ ने अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच (रजि.) नई दिल्ली द्वारा पैसा बचाओ पर्यावरण बचाओ सप्ताह के अंतर्गत जैन दिवाकर धाम के कार्यक्रर्ताओ को संबोधित करते कहा कि किसी को दुख देकर खुशी मनाने वाले का विश्व के किसी भी धर्म मे प्रवेष नही है। उन्होने स्पष्ट कहा कि आतिशबाजी हिंसा के तांडव नृत्य खुला प्रदर्शन है जलते पठाके को धरती पर डालने वर जीव जन्तु अकाल मौत के मूंह  मे चले जाते इतना ही नही इंसान तक मौत का शिकार हो जाता है पक्षियों  का गर्भपात हो जाता है।

जैन संत कहा कि नादान लोग कुत्ते की पुंछ से पठाके बाध कर चलाते जो कि पशुक्रूरता कानुन का सरासर उलंघन है, यह सब प्रकाशन की नाक नीचे होता है जो .शर्मनाक है। मुनि कमलेश ने कहा कि दयावान करुणामय आत्मा धार्मिकता से ओत-प्रोत होती वह तो निर्दोष प्राणियो को मन से कष्ट पहुँचाने तक की कल्पना नही कर सकती। राष्ट्र संत ने आव्हान किया कि सभी धार्मिक सामाजिक राजनैतिक संगठन संगठित होकर शाशन प्रशासन  के साथ मिलकर आतिशबाजी के कलंक को दूर करने का कठोर संकल्प ले। दिवाकर मंच के सदस्य  राजेन्द्र कमार रांका ने आभार व्यक्त किया। 

पवन पटवारी,चित्तौड़गढ़ 

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