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गुरुवार, सितंबर 22, 2011

अमरकांत व श्रीलाल शुक्ल ने हिन्दी गद्य को ठेठ देशज ठाठ और तेवर प्रदान किया है


लखनऊ, 21 सितम्बर।
हिन्दी के मशहूर कथाकार व उपन्यासकार अमरकांत व श्रीलाल शुक्ल को साहित्य का सर्वोच्च सम्मान 45वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने पर लखनऊ के साहित्यकारों ने खुशी जाहिर की है तथा इन दानों शीर्षस्थ रचनाकारों को बधाई दी है।जन संस्कृति मंच के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने कहा कि यह हमारे लिए अत्यन्त सुखद है। अमरकांत व श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार वास्तव में प्रेमचन्द, राहुल, रेणु, नागार्जुन की यथार्थवादी साहित्य की परम्परा का सम्मान है। वैसे तो हमारे ये शीर्षस्थ रचनाकार पुरस्कारों से बहुत ऊपर हैं। आजादी बाद के भारतीय समाज के जटिल संघर्ष के ये चितेरे अपनी रचनाशीलता के लिए हमेशा सम्मानित रहे हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार ने इस सम्मान पर बस अपनी मोहर लगाई है।

कवि भगवान स्वरूप कटियार ने अमरकांत व श्रीलाल शुक्ल जी को बधाई देते हुए कहा कि इनके लेखन ने देश के जन मानस पर गहरा असर छोड़ा है। भविष्य के सपनों का संघर्ष और जन पक्षधरता इनके लेखन की विशेषता रही है। अमरकांत का उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ तथा श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास ‘राग दरबारी’ साहित्य जगत में मील का पत्थर है।कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने अपने बधाई संदेश में कहा है कि इन दोनों के कथा साहित्य के मूल सरोकारों के केन्द्र में निम्न मध्यवर्गीय जीवन प्रसंग है। एक ओर अमरकांत नई कहानी के दौर में लीक से हटकर खास पहचान के साथ सामने आते हैं तो दूसरी तरफ श्रीलाल शुक्ल की पहचान अपने उपन्यासों से बनती है। दोनों ने हिन्दी गद्य को ठेठ देशज ठाठ और तेवर प्रदान किया है। दोनों ने ही दिलचस्प व पठनीय गद्य निर्मित किया है। इनमें छद्म या ओढ़ी हुई आधुनिकता नहीं है।


कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ

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