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गुरुवार, मार्च 05, 2015

''What I feel about SPIC MACAY''-Manik


मुफलिसी के दिनों में जाने कब स्पिक मैके में मेरा दाख़िला हो गया और मैं इस यात्रा में बहुत हद तक चला आया कि ये बारह साल कैसे गुज़रे कहना बहुत लम्बी चर्चा का आगाज़ हो जाएगा। कितने ही  विविधताभरे कलाकार और उनकी सेवा के बहाने खुद के भीतर झाँकने के कई मौके। प्राईवेट स्कूल में अध्यापकी और कॉलेज में अपने पढ़ाई के दिनों में मुझे स्पिक मैके ने जो एक बार अपनी तरफ खींचा कि बस मैं गहरे उतरते चला गया। असल में यह आन्दोलन बहुत बारीक ढ़ंग से काम करता रहा है। एक घंटे के आयोजन में कौन महारथी होगा जो आपको शहनाई और बांसुरी फूँकना सिखा दे। तबला-पखावज-सारंगी-संतूर बजाने का हुनर भर दे? कौन कुशल नृत्यांगना होगी जो आपको त्रिभंगी, चौका, तत्कार, तिल्लाना, आमद, गत और चक्कर सिखा दे? एक घंटे की प्रस्तुति महज एक क्लिक है जो हमें जगाता है। स्पिक मैके से जुड़ी इस शुरुआती गफलत में हम भी थे मगर आहिस्ते-आहिस्ते हम भी उस घटाटोप से बाहर आये और जाना कि यह यात्रा आदमी से बात करने, मेहमान से बतियाने, बाज़ार को समझने, अपने काम में ध्यान केन्द्रण करने, आयोजनों की डिटेल्स जानने की यात्रा है। उठने-बैठने-सुनने-देखने का सलीका पैदा करना इस यात्रा का पहला मकसद है हमारी राष्ट्रीय विरासत का दर्शन करना उसे अनुभव करना तो खैर मोटे शब्द हो जायेंगे मगर फिर भी हम स्पिक मैके में नहीं होते तो देश को जानने का एक ज़रूरी चश्मा नहीं पहन पाते और चीजों का ज्ञान अधूरा ही रह जाता। भला हो हरीश खत्री का जो मुझे पहली दफा वीकली मीटिंग के झांसे में ले गया। हरीश कॉलेज में पढ़ते हुए इस आन्दोलन का तब का सचिव सरीखा ही कुछ पद लिए हुए था। फिर तो मैं अपने-आप ही कविताएँ सुनाने के चस्के के चलते इसमें आता-जाता रहा। चित्तौड़ में हुआ मेरा ये जुडाव असल में इसलिए भी लम्बा चला कि मैं शहर में अकेला रहता था, माँ-पिताजी गाँव में थे। मर्जी का मालिक और निर्णय सारे अपने मन के। स्वयंसेवा के ये बारह साल बहुत सारी यादों के साथ आज भी मेरे जेहन में मौजूद हैं।बड़े-बुजुर्गों ने बहुत सराहा, दिशा दी और आगे बढ़ाया।मंच मिला जिस पर हमने अपने मन का किया।

एक बार की बात है कि प्रेरणा श्रीमाली जी सैनिक स्कूल,चित्तौड़ में कथक प्रस्तुति देने आयी हुयी थीं।बैनर यही स्पिक मैके का थासेवा-चाकरी में हम ही मुस्तैद थेजनवरी की ठण्ड थीठण्ड वो भी चित्तौड़ी-ठण्डबिजली के कट आउट का दौर थाशायद सुबह के कोई दस बजे प्रोग्राम होना तय थाभागादौड़ी में हम भूल ही चुके थे कि प्रेरणा जी से रात में विदा होते वक़्त ही कहना था कि आप थोड़ा जल्दी उठकर गीज़र का उपयोग करेंगी तो बेहतर होगा, बाद में बिजली कट आउट के अपने संकट हैंसरकारी फरमान हैं कि दो घंटे बिजले कट आउट ज़रूर होहम तनिक डरे भी कि इतनी बड़ी कलाविद को जल्दी उठने की कहे तो कैसे?उस दौर में होटल में कलाकार को रुकवाने की हमारी हैसियत तो थी नहींहमारी आशंका सही निकली,उन्होंने सवेरे के साढ़े आठ पर कॉल कर ही दियामैं, रमेश प्रजापत और एकाध कोई और स्वयंसेवक था शायदसैनिक स्कूल गेस्ट हाउस पहुंचते ही हमने एक जुगाड़ लगायापता लगाया, मेस पहुंचे, दो बाल्टी पानी कड़ायले में गरम करवाया, एक मोपेड पर पीछे बैठे रमेश ने दोनों हाथों में एक-एक के हिसाब से गरम पानी की बाल्टियां पकड़कर प्रेरणा जी के कुसलखाने तक पहूँचाईमुझे मोपेड चलाना नहीं आता था क्योंकि तब तक मेरी हैसियत और हकीक़त एक साईकल के आसपास ठहरती थीखैर कहना यह चाहता हूँ कि वक़्त के साथ सेवा-चाकरी उर्फ़ 'स्वयंसेवा' जैसे शब्द अपने अर्थ खोते जा रहे हैं। यह सचमुच की हकीक़त हैस्पिक मैके आन्दोलन जिसने हमारे में 'निस्वार्थ स्वयं सेवा' का कॉन्सेप्ट रोपा, अफ़सोस वह आन्दोलन भी कई मायनों में अब अपने क्षरण के साथ ही आगे बढ़ रहा है। इस बात की पुष्टि में डॉ. किरण सेठ खुद कहते हैं कि हम एक हारी हुयी लड़ाई लड़ रहे हैं। कई बार लगता है आगे बढ़ना कोई प्रगति का सूचक नहीं है जब तक कि उसमें एक विचार न हो, दिशा न हो और गुणात्मक किस्म का भाव न हो हमारे दोस्त और हिन्दी प्राध्याक डॉ.राजेश चौधरी कहते हैं कि माणिक क्षरण तो जीवन के प्रत्येक हल्के में हो रहा है इससे जो जितना बच सके उतना अच्छा

इस यात्रा में बहुत काम किए। शहर में रोडवेज बस स्टेंड, नगर पालिका अनाउन्समेंट सिस्टम और रेलवे स्टेशनों के प्रबंधकों से मिलकर हमने वहाँ के साउंड सिस्टम में क्लासिकल म्यूजिक के कैसेट्स बजवाए। चित्तौड़ जैसे मझले दर्जे के शहर में हमारा ये आन्दोलन कम बजट के आन्दोलन के रूप में ही देखा और पाया। पहली दफा पोस्टर छपवाए तो पैसे बचाने की जुगत में खुद ही आटे की लेई बनाकर रात में शहरभर की दीवारों पर पोस्टर चिपकाए। प्रेस नोट्स बाँटने के हित बहुत साइकल चलाई। मीटिंगों के हित एक रुपये का सिक्का डालो-फोन करो वाली मशीन से कई बड़े-बड़े लोगों को फोन लगाए। फोन नम्बर्स तक ठीक से याद हो गए।नींद में उठाओ दो और पूछ डालो तो भी एक-एक नंबर सही-सही उगल देसर्दियों-बरसातों में हम कोटा से आते कलाकारों की टेक्सी की बाट में कई रातों ठिठुरे। कई मंचों पर कीलें ठोकी, बेनर गाड़े, परदे सझाए, दीयों में बातियाँ बनायी, जूते-चप्पल को सलीके से जमाया। मंचों पर पौछे लगाए। कई पंगे मोल लिए, कई दोस्तियाँ की, कई कार्ड छपवाए और रात-रातभर प्रूफ रीडिंग करने और आमंत्रण पत्रों को लिफाफों में ठूँस कर उन पर पते लिखने में बिताईसेवा में खड़े-के-खड़े रहे। कई बड़े शहरों-राजधानियों-महानगरों के अधिवेशन अटेंड किए। चित्तौड़ के झंडे गाड़े। परचम फहराया। सालों तक इसी आबोहवा में  बोराए रहे। उम्र का एक बड़ा हिसा इसमें उड़ा दियाअरसे तक यही लगता रहा कि शहर में हमारे अलावा शास्त्रीय संस्कृति को बचाने का ठेका हमारे अलावा किसी के पास नहीं है। कई कार्यशालाएं लगाईं और हमारे क्षेत्र के बच्चे-बच्चियों को चित्रकारी-टेरेकोटा-रंगमंच-कथक के हुनर सिखाए। एक तरह के फकीरी ही थी वो जो कमोबेश अब भी हममें मौजूद है इधर बोलते-बतियाते मंच संचालन का हुनर आ गया। कुछ तालें मगज में बैठने लगी। आलाप से उपजती बोरियत धीरे-धीरे बोरियत नहीं रही। सारंगी और हारमोनियम के लहरे और तानपुरे की सेटिंग समझ आने लगी। तबलचियों से हुयी लम्बी चर्चाओं में संगतकारों के दुखड़े समझ आये। कुछ गुस्सेल कलाकारों के ताने भी सहे। कभी हुआ कि बस आज लास्ट और कल स्पिक मैके छोड़ेंगे, मगर फिर जाने क्या हुआ कि ये रिश्ता गहराता रहा टूटा नहीं

सेवा की इसी अवधारणा में हमने आईआईटी के प्रोफ़ेसर डॉ. किरण सेठ से सीखा कि कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता। हम आज भी किरण सेठ से प्रेरणा पाते हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही इस एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित कर दियाबहुत बाद में जाकर हमारे मगज में ये बात बैठी कि हम किसी आयोजन में सभागार के बाहर जाने-अनजाने लोगों की पगरखियाँ क्यों एक सीध में रखकर उन्हें इधर-उधर सरकाएंबाद में ही जाना कि एक वोलंटियर कैसे किसी शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति के ऐनवक्त के आपातकाल में अपने ही पहने हुए बनियान को पौछे के माफिक व्यवहार करता हुआ मंच साफ़ कर देता है जुनून ही एक युवा को सक्रीय एक्टिविस्ट में बदल सकता हैसीखने के अनुभव कई बार कड़वे हो जाने की प्रक्रिया से भी गुज़रते हैंअभी मैं भूला नहीं हूँ वैसे भूल भी नहीं सकता कि ओडिसी के नामी हस्ताक्षर ने मुझे उदयपुर हवाई अड्डे पर किस कदर डाटा खैर ग़लती तो मेरी थी ही। असल में स्पिक मैके एक तरीके की स्कूलिंग है। अनौपचारिक स्कूलिंग।जहां खुद ही सिखते-संभलते आगे बढ़ना होता है।खुद को करेक्ट ही करना होता है और ये करेक्ट करने की हिम्मत और हुनर भी यहीं सीखा जाता है।

खैर इस तरह के तमाम अनुभव मुझे 'माणिक' बनाने में अपनी तरफ से कुछ न कुछ जोड़ते ही रहे इस बात का अहसास मुझे बहुत बाद के सालों में लग पाया कि यह लम्बे समय में पैदावार देती फसल है इस सफ़र में यह भी समझ आ पैदा हुई कि समाज और अच्छी संगत में खर्च किया हुआ वक़्त हमारे जीवन में कुछ न कुछ सार्थक जोड़ता ही हैअपनी पसंद के मंचों पर अपने मनमाफिक शीर्षक वाले नाटक खेलने के एक भी अवसर मैंने नहीं गँवाए जितना हो सका सुना, देखा, सीखा, साधा और बिना किसी बड़े लाभ के चक्कर में आये वे सभी काम किए जो सीधे तौर पर लाभदायक तो कम से कम नहीं ही समझे जाते हैंहम बरसों तक ऐसे घनचक्कर बनने में ही सुखद अनुभव करते रहे जो हमें 'माणिक' बनाने में सहयोग कर सकते थे।` 'सार्थक' बनने की यह यात्रा अनवरत जारी है शहर के सजग और चिन्तनशील मित्रों के साथ अब तो हिन्दुस्तान में भी इतना बड़ा समूह बन गया है कि मित्रों की संख्या अपार हो गयी है जिनसे मुझे अपनी दिशा तय करने में सहायता मिलती है। आज लगता है कि यह सारी अनर्गल कही जाने वाली रुचियाँ ही मुझमें 'लय' लाती रहीआज सच कहलवाएं तो इसी 'लय' के बूते मैं अपने कदमों को इस उबड़-खाबड़ ज़मीन पर ठीक से रख पाता हूँ

कई दिग्गजों और तपस्वियों के साथ रहने का मौक़ा मुझे इसी आन्दोलन में मिला यही कोई जनवरी दो  हज़ार छ: में बीनकार उस्ताद असद अली खान साहेब के साथ रहने का मौक़ा मिलाराजस्थान के ही थे मगर सालों से दिल्ली में रहे। खैर अब वे नहीं रहे हैं तो हमें ज्यादा याद आते हैं। ये देखा और महसूसा किया कि अमूमन कलाकारों को अपनी व्यावसायिकता की मज़बूरी के चलते अपनी मिट्टी और जन्मभूमि को छोड़ बड़े नगरों में जा रहना पड़ता हैस्पिक मैके जैसे कलावादी आन्दोलन में प्रमुख दायित्व निर्वहन के साथ ही एक स्वयंसेवक की भूमिका में मैं खान साहेब के साथ पश्चिमी राजस्थान के दौरे पर रहा रेतीले प्रदेश में संगीत की अलग जगाने की वो कोशिशें जहां लोक संगीत तो सर चढ़ कर बोलता रहा ही मगर ये सफ़र हमारे दल के लिए शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार का होने से कम जोखिमभरा नहीं रहा। वो भी बीन जैसा नितांत लुप्त प्राय वाध्य। हम उत्साहित थे। 

अपनी अर्द्ध सरकारी नौकरी के चलते स्कूल की परवाह किए बगैर उस्तादजी के एक कहे पर उनकी क्वालिस में जा बैठा। यात्रा शुरू। दो जोड़ी कपड़े इस यात्रा की और भी मजेदार बात ये है कि मुझे राजस्थान के ही एक और बड़े संगतकार पखावजी पंडित डालचंद शर्मा से बातों के ठठ्ठे लगाने का मौक़ा भी मिला। डालचंद जी बड़े दिलचस्प इंसान हैं। पखावज में बड़ा नाम मगर उनके हुनर को पूरा सम्मान नहीं मिलातालीम नाथद्वारा में मिली मगर वे भी दिल्ली वासी थेरोज लगभग तीन सौ किलो मीटर की असहज यात्राआलिशान होटलों में रात्रि विश्रामअगले रोज़ सुबह प्रोग्राम और लंच के बाद फिर यात्रा और इस बीच ढ़ेरों बातें यहीं क्रम था उस्ताद जी के साथ दिन काटने का खान साहेब वीणा बजातेपंडित जी पखावजइस बीच मैं खुद को कुशल मंचसंचालक समझने की गलतफहमी में कार्यक्रमों के संचालन करता हुआ बड़ा हो रहा था।सबकुछ फिल्म की तरह आज भी रिलनुमा है बड़ा आनंद था उस यात्रा में। मुझे बहुत बाद में पता चला कि मैं कितनी बड़ी सांगीतिक विरासत का सीधा अनुभव ले रहा था। असल में वक़्त पर चीज़ों को समझने का हुनर ही स्पिक मैके पैदा करता है। जीवन में सलीका भरता हुआ स्पिक मैके बार-बार कहता है कि ये साहित्य-संगीत-नाटक तो सिर्फ बहाने हैं।असल मकसद तो कुछ और ही है

इस यात्रा में मेरे देखते-देखते कई नामी हस्ताक्षर चल बसे। जिन्हें कुछ बरस पहले सुना और देखा वे आज हमारे बीच नहीं है। हमने बहुत कुछ खो दिया जैसे वाक्यों की सही अनुभूति मुझमें है क्योंकि मैं इस स्कूलिंग के मायने समय रहते समझ पाया। उस्ताद सुल्तान खान साहेब चल बसे, बिस्मिल्लाह खान साहेब चले गए, केलुचरण महापात्र नहीं रहे।  ध्रुपद के दो महान कलाविद उस्ताद फरीदुद्दीन डागर और उस्ताद फहीम साहेब चल बसे। पंडित किशन महाराज सहित और भी कई नाम है। इन सभी से वक़्त रहते हमारी मुलाक़ात का सारा श्रेय इसी आन्दोलन को जाता है। जो तमीज़ और तहज़ीब हमने पायी वही आज हमारी बेटी को देने-कहने और समझाने में काम आ रही है। समाज और जीवन के इस गणित को समझने में हमारा ये बारह साल का अनौपचारिक तजुर्बा भी बड़ा काम का सिद्ध हो रहा है। कुलमिलाकर यह आन्दोलन बड़े काम की चीज़ है। हमने वैश्वीकरण के इस दौर में कलाओं और कलाविदों के रवैये में आये बदलाव पर हम अपनी एक समझ विकसित कर की हैं। इधर अपनी इतर जिम्मेदारियां बढ़ी है तो हमने स्पिक मैके थोड़ा कम कर दिया, मगर छोड़ा नहीं।लगातार लोगों को जोड़ते रहेइस यात्रा का कठीन समय भी हमने देखा है और सही नियमों का रोपण हममें हो सका इसलिए अब सिद्धांतों से समझौते हमसे नहीं होते। एक विचार है जो हम सभी को बांधे हुए है और हम चले जा रहे हैं

स्पिक मैके ने हमें अपने भीतर देखने का हुनर सिखा दिया तो आज हम इस भागते-दौड़ते वक़्त में भी खुद का आंकलन करते हुए आगे बढ़ना सीखे हैं। अपनी सतरंगी विरासत को आदर देना भी इसी सीख का हिस्सा है। मेहमानों से इज्ज़त के साथ पेश आना भी इसी ने सिखाया है। जाजम बिछाना, बेनर टांगना, चाय-नास्ते की प्लेटें सजाना, भोजन खिलाना और चित्तौड़ का किला घुमाना इसी स्पिक मैके की देन है। बोलने-चलने और पेश आने का लहजा इसी में आते-जाते सीख गए और आभास तक नहीं हुआ। एक बड़े परिवार के बीच एक विचार को फलते हुए देखना और उसी उद्देश्य में सभी को तल्लीन देखना बड़ी खुशी देता है। मुफलिसी और बेहद कम संसाधनों के बीच की ये यात्रा अब तो घोर इंटरनेटीकरण के युग में आ पहूंची है। अब तमाम सुविधाएं हैं। तामझाम हैं। फोनफान है। मोबाइल आ गया है। पहले कुछ नहीं था। दिल था, प्रतिबद्धता थी, मेहनत थी। अब भी वो सबकुछ है मगर कुछ तो क्षरण हुआ है।खैर इस यात्रा के बेहतरीन हासिल की कामना के साथ हम सभी एकजुट हैं।हमारा अतीत आज अगर हमें सुनहरा दिखाई देता है तो इसका श्रेय स्पिक मैके को ही जाता है।


माणिक
सदस्य,स्पिक मैके चित्तौड़गढ़,राजस्थान 


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