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बुधवार, सितंबर 24, 2014

''संतोष चौबे हमारे समय के सवालों की पड़ताल करते हैं। उनका नज़रिया समावेशी है।''

संतोष चौबे की कृतियाँ ‘कला की संगत’ और ‘अपने समय में’ का लोकार्पण

भोपाल। 

परंपरा, संस्कृति और इतिहास के ज़रूरी संदर्भों और साहित्य तथा विज्ञान की गहरी समझ के साथ संतोष चौबे हमारे समय के सवालों की पड़ताल करते हैं। उनका नज़रिया समावेशी है। वे व्यापक अध्ययन और तर्कों के साथ अपनी किताबों में विमर्श  की नई राहें खोलते हैं। हिन्दी में यह आलोचना के नए आचरण का सूचक है।इस वैचारिक आहट के बीच स्वराज भवन (भोपाल) में सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार और आलोचक संतोष चौबे की दो नव प्रकाशित पुस्तकों ‘कला की संगत’ तथा ‘अपने समय में’ का लोकार्पण हुआ। साहित्य के प्रकाण्ड चिंतक डॉ. धनंजय वर्मा तथा अग्रणी कवि राजेश जोशी ने समीक्षा, संवाद और साक्षात्कारों पर केन्द्रित चौबे की इन कृतियों को जारी करते हुए इन्हें एक बहुआयामी और मननशील लेखक का महत्वपूर्ण रचनात्मक हस्तक्षेप बताया। युवा आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने लोकार्पित पुस्तकों पर अपना आधार वक्तव्य दिया। कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने संचालन करते हुए आरंभ में चौबे की सृजनात्मक यात्रा पर प्रकाश डाला। पहले पहल प्रकाशन द्वारा संयोजित इस गरिमामय प्रसंग में राजधानी के लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

अपने पाठक-प्रशंसकों से मुखातिब होकर संतोष चौबे ने कहा कि इन पुस्तकों के जरिये मैंने साहित्य, संस्कृति और कलाओं की आपसदारी को नए सिरे से देखा-समझा। आलोचना की एक नई संवेदना ने मेरे भीतर जन्म लिया। चौबे ने इस अवसर पर लोकार्पित पुस्तकों में संग्रहित कुछ आलेखों के अंशों का पाठ भी किया। उन्होंने कहा कि हमारी आलोचना ने जो प्रतिमान अब तक गढ़े, आज उन दायरों से बहुत आगे निकलने की ज़रूरत है। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने संतोष चौबे के कृतित्व और व्यक्तित्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि संतोष चौबे लगभग चार दशकों से साहित्य और कला में सतत सक्रिय हैं और उनकी इन दोनों क्षेत्रों में बराबर की रुचियां उनके सृजन में झलकती हैं। 

युवा आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने संतोष चौबे के आलोचकीय कर्म पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चौबे की आलोचना और विचार का केनवास बहुत व्यापक तथा विविध है। वह विभिन्न साहित्य और कला के तमाम रूपों में ही नहीं बल्कि ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी सजग आवाजाही करते हैं। उनके बीच अनिवार्य अंतर्संबंध की चेतना से उनका लेखन आलोकित है। यह एक सच्चे लोकतांत्रिक नजरिये से की गई आलोचना है क्योंकि वे रचनाकारों में छोटे-बड़ा का भेद नहीं करते। प्रतिभा को वे जन्मजात गुण नहीं मानते बल्कि जीवन संघर्ष के बीचों बीच अर्जित की गई विशेषता मानते हैं। आभार व्यक्त करते हुए कवि महेन्द्र गगन ने कहा कि पहले-पहल प्रकाशन द्वारा श्रेष्ठ साहित्य के ग्रंथों की श्रृंखला जारी रहेगी।

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