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बुधवार, अप्रैल 09, 2014

हिन्दुस्तान की सांगीतिक विरासत बहुत गहरी है-नेन्सी कुलकर्णी

प्रेस विज्ञप्ति 
हिन्दुस्तान की सांगीतिक विरासत बहुत गहरी है-नेन्सी कुलकर्णी


चित्तौड़गढ़ 9 अप्रैल,2014

एक दौर था जब मैं अमेरिका में वेस्टर्न म्यूजिक के ओर्केस्ट्रा में बजाती थी मगर चालीस साल पहले जब पहली बार हिन्दुस्तान आयी तभी से यहाँ के शास्त्रीय संगीत को सुनने-समझने के बाद सीखा है।यहाँ की सांगीतिक विरासत अपने आप में बहुत गंभीर और शास्त्रीय किस्म की है। मैंने खुद को इसके प्रभाव में पाकर यहाँ ध्रुपद सिखा। अपने गुरुओं के साथ आश्रम परम्परा में आज भी सीख रही हूँ।चेलो जैसे वेस्टर्न वाध्य यन्त्र को मैंने मौके के अनुसार भारतीय संगीत प्रणाली और राग-रंग के मुताबिक़ बदला है।मुझे भारतीय संस्कृति ने बहुत गहरे तक छुआ है। मैं अब हिन्दी और यहाँ के रहन-सहन में ढल चुकी हूँ और मुझे ध्रुपद जैसी विधा में रियाज, प्रस्तुतियां और प्रशिक्षण देने में बड़े आनंद की अनुभूति होती है

यह बात मूलत अमेरिका की और अब पुणे में बस गयी चेलो वादक नेन्सी कुलकर्णी ने सैनिक स्कूल में अपनी प्रस्तुति के दौरान व्यक्त किए। स्पिक मैके द्वारा शंकर मेनन सभागार में आयोजित इस फेस्ट-2014 के आगाज़ कार्यक्रम में नेन्सी कुलकर्णी के साथ पखावज वादक पंडित माणिक मुंडे ने संगत की।दीप प्रज्ज्वलन कार्यवाहक प्राचार्य लेफ्टिनेंट कर्नल अजय ढील,स्पिक मैके राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जे.पी.भटनागर और मेवाड़ विश्वविद्यालय के प्रबंधन डीन एस. दुर्गाप्रसाद ने किया। ध्रुपद जैसी गंभीर शैली में अपना कौशल दिखाने वाली कुलकर्णी ने पहले अपने वाद्य यन्त्र के इतिहास और उसमें किए परिवर्तन के बारे में बताया। शुरुआत राग भीमपलासी में आलाप जोड़-झाला के बाद चौताल में मध्य लय के साथ बंदिश कुंजन में रचो रास की प्रस्तुति दी। इस वादन के माध्यम से उन्होंने कृष्ण की रासलीला का चित्रांकन किया। पूरे कार्यक्रम में विशुद्ध हिन्दी का उपयोग करके नेन्सी ने श्रोताओं को अचरज में डाल दिया। बाद के हिस्से में उन्होंने राग गोरख कल्याण बजाया

प्रस्तुति के दौरान ही नेन्सी कुलकर्णी ने कहा कि ध्रुपद विधा में बीन, चेलो, पखावज ही बजता है। इसमें वाध्य की आवाज़ अक्सर मंद्र सप्तक में बजती है जो हमारी लम्बी साँस की तरह अनुभव होती है।असल में यह वाध्य हमें मेडिटेशन की मुद्रा में ले जाता है। मैंने अपने गुरुओं के सानिध्य में रहते हुए मैंने डागर बंधू, गुंदेचा बंधू और ऋत्विक सान्याल जैसे बड़े उस्तादों से बहुत कुछ पाया है और इस यात्रा में हमारा अनुशासन सबसे बड़ा आधार रहा है।हमने नियमों के तहत ही इस विरासत को आगे बढ़ाया है।चेलो अब भारत में भी बहुत प्रचलित हो गया है। कई युवा आज सीख रहे हैं।यह सबकुछ सुखद अनुभव है

कार्यक्रम में मंच संचालन स्पिक मैके के राष्ट्रीय सलाहकार माणिक ने किया वहीं कलाकारों के बारे में केडेट आशीष कुमार ने परिचय पढ़ा। आयोजन के सूत्रधार स्कूली विज्ञान प्राध्यापक वी.बी.व्यास, युवा चित्राकार मुकेश शर्मा, संगीत प्रशिक्षक मदन गंधर्व थे कार्यक्रम में कई गणमान्य श्रोता मौजूद थे जिनमें आकाशवाणी कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास, योगेश कानवा, अभियंता जे.के. पुर्बिया, शिक्षाविद मुन्ना लाल डाकोत,अपनी माटी सचिव डालर सोनी, कवि नन्द किशोर निर्झर, गज़लकार कौटिल्य भट्ट, कॉलेज प्राध्यापक डॉ.के.एस.कंग, वी बी चतुर्वेदी, अभिषेक शर्मा,भावना शर्मा, सरिता भट्ट आदि शामिल थे

                                                  
सचिव,स्पिक मैके

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