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गुरुवार, मार्च 06, 2014

याद रहेंगे जगत मेहता साहेब


“श्री जगत मेहता“ भारत की विदेश नीति के कुशल संचालक एवं व्याख्याकार प्रोफेसर अरूण चतुर्वेदी जगत साहब की पहली याद 1965-66 की राजस्थान विश्व विद्यालय की है तब भाई साहब (डांॅ. मोहन सिंह मेहता) राजस्थान विश्व विद्यालय के कुलपति थे और वे भारत के विदेश मंत्रालय में उच्च अधिकारी थे और राजनीति विज्ञान विभाग में उनका भाषण था। भारत पाकिस्तान सम्बन्धों के संदर्भ में वैसे भाई साहब भी भारत के पाकिस्तान में उच्चायुक्त रहे थे। जगत साहब तब लम्बा और आकर्षक बोले थे। फिर अपने शोध के सिलसिले में 1980 के दशक में उनसे मुलाकात हुई थी, और तब तक वे भारत-चीन सम्बन्धों के व्याख्याकार और अपनी प्रभावी भूमिका के लिये देश में जाने जाते थे। उनकी दृष्टि भारत-चीन सम्बन्धों में पारस्परिकता और बराबरी की थी। यों चीन के राजनयिको और नेतृत्व की छवि कम बोलने वालो की और मुस्कान रहित वार्ताकारो की थी, किन्तु जब 1968 में प्रसंग में जब उन पर दिल्ली में दबाव पडा तब चीनी अधिकारी बोले भी और वाचाल भी हुए।

 1994 में सुखाड़िया विश्व विद्यालय में आने के बाद उनसे सम्पर्क निरन्तर रहा और वे विश्व विद्यालय के राजनीति विज्ञान पर निरन्तर मेहरबान रहे उन्हें जब भी बुलाया वे आये, विभाग मे खुल कर बोलते थे। अमेरिका अध्ययन के भारतीय संगठन की बैठक में जगत साहब का भाषण था और उन्हें लगा कि भारत अमेरिकी सम्बन्धों पर सार्थक बात हुई है। तब उनका प्रस्ताव था कि इस सम्मेलन में जो निष्कर्ष है उन्हें उदयपुर घोषणा कह कर सम्बोधित किया जाय। विभाग ने 1995-96 में भारतीय विदेशनीति पर भी एक संबोष्ठी आयोजित की जगत मेहता मुख्य वक्ता थे, उन्होंने आग्रह किया कि भारतीय बुद्धिजीवी विदेश नीति की गंभीरताओं को समझने की आवश्यकता के साथ ही साथ गम्भीर विकल्प देना भी जरूरी है। उनके लिये चिन्तन के अभाव में भारत की विदेशनीति पर चर्चा का कोई उपयोग नहीं था। 

जगत साहब उदयपुर के हैं इसका लाभ हमे जब हुआ जब विश्व विद्यालय में भारत पाकिस्तान सम्बन्धों पर नीमराना समूह की बैठक का आयोजन हुआ। पाकिस्तान अधिकारी और राजनायिक जगत साहब से परिचित थे और उनके उदघाटन भाषण ने संवाद की सही दिशा निर्धारित की थी। जगत साहब के लेखन से परिचय मूलतः “मूल प्रश्न“ से हुआ। मूल प्रश्न के सम्पादक वेददान सुधीर ने उनकी पुस्तक नेगोशियेरिटग फोर इंडिया और ट्रिस्ट विथ डेस्टीनी पर लिखने को कहा। अपने लेखन में जगत साहब स्पष्ट, बेबाक और आत्मीयता से भारत की विदेशनीति पर चर्चा करते है। नेहरू कालीन राजनय से लेकर इंदिरा गांॅधी के दूसरे प्रधानमंत्री काल तक जगत साहब की विदेश नीति पर व्याख्याए थी और प्रश्न थे। वे दक्षिण एशियाई देशों के साथ भारत के प्रमुख वार्ताकार रहे थे, दक्षिण एशिया के देशों के साथ अच्छे सम्बन्धों की उनकी कामना थी अब जब भारत चीन सम्बन्धों में तनाव है तब जगत साहब की चीन के साथ बराबरी के आधार पर बात अपरिहार्य लगती है। यो वे अपने राजनय की विशेषताओं की बात बहुत जोरदार तरीके से करते थे, जिसमें अणुशक्ति के उपयोग पर और उसके विस्तार पर उनके प्रश्न चिन्ह थे।  

प्रो अरुण चतुर्वेदी 
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विदेश नीति के क्षैत्र में सम्पूर्ण विश्व में विशिष्ठ पहचान रखने वाले तथा प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को विदेश नीति के मसलों पर सारगर्भित सलाह देने वाले, पूर्व विदेश सचिव पद्मभूषण जगत मेहता का गुरूवार प्रातः पौने आठ बजे निधन हो गया। 17 जुलाई 1922 को प्रख्यात शिक्षाविद् डा. मोहन सिंह मेहता तथा मां विद्या देवी के एक मात्र सुपुत्र जगत मेहता की प्रारंभिक शिक्षा विद्या भवन स्कूल में हुई। मेहता की उच्च शिक्षा इलाहबाद विश्वविद्यालय तथा कैम्ब्रिज में हुई। मेहता 1947 में विदेश सेवा में आये तथा विदेश नीति आयोजना विभाग के पहले प्रमुख बने। इससे पूर्व मेहता इलाहबाद युनिवरसिटी में प्राध्यापक तथा भारतीय नौसेना में भी रहे।

मेहता की 1960 में भारत चीन सीमा विवाद सुलझाने 1975 में युगाण्डा से निकाले गये भारतीयों के मुद्दा का निराकरण करने, 1976 में पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंधो की बहाली, भारत पाकिस्तान के मध्य 1976 में सलाल बांध एवं 1977 में फरक्का बांध विवाद निपटाने तथा नेपाल के साथ 1978 में व्यापारिक रिश्तों संबंधी समझौतों में ऐतिहासिक भूमिका रही।

मेहता ने अपने विदेश सेवा काल में 50 से अधिक देशों के साथ भारत के बहुपक्षीय संबंधों पर नेतृत्व किया। कोमन वेल्थ प्रधानमंत्रीयों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न सम्मेलनों व बैठको में मेहता की उपस्थिति व योगदान इतिहास का एक महŸवपूर्ण हिस्सा है। मेहता 1976 से 1979 के मध्य देश के विदेश सचिव रहे। वे टेक्सास विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर रहे।मेहता पूरी उम्र सेवा मन्दिर से जुड़े रहे तथा लगभग 400 गांवों के समेकित विकास में प्रमुख भुमिका निभाई।

1985 से 94 तक वे सेवा मन्दिर के अध्यक्ष रहे तथा 1993 से 2000 तक विद्या भवन के अध्यक्ष रहे। 1985 से अब तक डांॅ. मोहन सिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के प्रन्यासी भी रहे।  मेहता झील संरक्षण समिति के अध्यक्ष थे तथा अंतिम सांस तक झीलों के लिये चिंता करते रहें। उनके परिवार में तीन पुत्र विक्रम मेहता, अजय मेहता तथा उदय मेहता एवं पुत्री विजया है। मेहता के निधन से विद्या भवन, सेवामन्दिर, डा. मोहन सिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट, झील संरक्षण समिति में शोक व्याप्त है। मेहता का अंतिम संस्कार आठ मार्च को होगा।

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