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सोमवार, जनवरी 27, 2014

'लमही' का औपन्यासिक विशेषांक


लगभग चालीस तेजस्वी आलोचकों की शिरकत और 

तीन दर्जन उपन्यासों पर विमर्श के बहाने कथालोचन को नया मोड़ देने की कोशिश। 



भूमंडलीकरण ने न केवल समय और समाज को प्रभावित किया है बल्कि औपन्यासिक लेखन को भी। लमही ने ‘’औपन्यासिक’’ में उपन्यास के गुणसूत्रों की बारीक पड़ताल के बहाने हाशिये के समाज, अस्मिंताओं के संघर्ष, दलित और स्त्री की उपस्थिति, विस्थापन, सांप्रदायिकता और उदारीकरण की फलश्रुतियों व व्यांधियों को केंद्र में रखा है जिसकी संजीदा विषयवस्तु स्वयमेव गवाही देती है:--

वैश्वीकरण, उपन्यास और विचारधारा। 
भूमंडलीकरण से भिड़ती कुछ कथाऍं।
आज के उपन्यास को समझने के लिए उपकरणों की तलाश।
समकालीन उपन्यास की दशा, दिशा।
दलित उपन्या‍स की अवधारणा और हिंदी के दलित उपन्यास।
उपन्यास के आईने में मातृत्व: आनंद या अमर्ष।
समलैंगिकता: कुछ अपने मन की।
औपन्यासिकता, नावेला और लंबी कथाऍं।
उपन्यास के विशेषण।

लगभग चालीस तेजस्वी आलोचकों की शिरकत और 
तीन दर्जन उपन्यासों पर विमर्श के बहाने कथालोचन को नया मोड़ देने की कोशिश। 

‘लमही’ ने आलोचना की गतानुगतिकता से सदैव परे रहकर एक तटस्थ मूल्यांकन प्रस्तुत करने का यत्न किया है। अपने समय की औपन्यासिकता के प्रति प्रतिश्रुत किन्तु हमारे समय की आलोचना का मर्यादित मानक उपस्थित करता 'लमही' का यह अंक निश्चय ही बहसतलब है। दो सौ पृष्ठों के इस विशेष अंक की कीमत मात्र 50 रुपये रखी गयी है। अंक की उपलब्धता के लिए श्री विजय राय, प्रधान संपादक,'लमही' से संपर्क किया जा सकता है। 

।। लमही ।।
प्रधान संपादक।। श्री विजय राय
इस अंक के संपादक।। ओम निश्चल । अमिताभ राय ।
वेब संपादक: श्री पंकज सुबीर
पृष्ठं : 200 , मूल्यअ 50/-
संपर्क: 3/343, विवेक खंड, गोमती नगर,लखनऊ
मेल: vijairai.lamahi@gmail.com
फोन: 09454501011

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