प्रतिरोध और जनांदोलनों की दस्तावेजी फिल्मों का महोत्सव: पहला कोलकाता पीपुल्स फिल्म फेस्टिवल - Apni Maati: News Portal

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मंगलवार, जनवरी 21, 2014

प्रतिरोध और जनांदोलनों की दस्तावेजी फिल्मों का महोत्सव: पहला कोलकाता पीपुल्स फिल्म फेस्टिवल


प्रतिरोध का सिनेमा : पहला कोलकाता पीपुल्स फिल्म फेस्टिवल

जैनुल आबेदीन की स्मृति में

20 जनवरी, 2014/ कोलकाता

जन संस्कृति मंच और पीपुल्स फिल्म कलेक्टिव, कोलकाता की ओर से 22 जनवरी तक चलने वाले फिल्मोत्सव का उद्घाटन आज जाधवपुर विश्वविद्यालय के त्रिगुण सेन प्रेक्षागृह में हुआ । जनसंघर्षों का रेखांकन करने वाले प्रतिरोधी चित्रकार जैनुल आबेदीन की स्मृति में आयोजित इस फिल्म उत्सव में प्रतिरोध और जनांदोलन केंद्र में हैं। फिल्मोत्सव में अगले दो दिनों तक दुनिया और देश के विभिन्न हिस्सों के आंदोलनों को दर्ज करती दस्तावेजी फिल्मों का प्रदर्शन होगा। कारपोरेट फासीवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रतिरोध रचती इन फिल्मों में जनता के आंदोलनों का ताप दर्ज है। समारोह में संजय काक, मोइनाक विश्वास, रानू घोष, सूर्यशंकर दास, नकुल सिंह साहनी, बिक्रमजीत गुप्ता, मौसमी भौमिक और सुकान्त मजूमदार जैसे फ़िल्मकार अपनी फिल्मों पर बातचीत करने के लिए मौजूद रहेंगे। 

फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए मशहूर फिल्म समीक्षक शमिक बंद्योपाध्याय ने कहा कि इस दौर में कला-माध्यमों पर राजसत्ता की तरफ से तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। जनता के संघर्षों को जनता तक पहुंचाने में सत्ता भरपूर रोड़े डाल रही है, लोकतान्त्रिक आवाजें खामोश कराई जा रही हैं। ऐसे में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नई तकनीक के सहारे इस का प्रतिरोध विकसित करने की दिशा में एक कड़ी है। उत्तर प्रदेश की गोरखपुर जैसी जगह, जो सांप्रदायिक ताकतों की प्रयोगस्थली है, वहाँ इस आंदोलन के शुरू होने के गहरे मायने हैं। कवि मायकोव्स्की को याद करते हुए उन्होंने आशा व्यक्त की कि मुख्यधारा के ‘बीमार सिनेमा’ के खिलाफ ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनांदोलनों की ऊष्मा के संग संघर्षों की कथा लिखेगा और लोगों तक संघर्षों के स्वर पहुंचाने में कामयाब होगा। 

कवि सब्यसांची देव ने आयोजन की सफलता की कामना करते हुए कहा कि फिल्म एक ताकतवर माध्यम है। बंगाल में इसका आयोजन एक बेहतर शुरुआत है। उन्होने कहा कि उदारीकरण के इस दौर में कलाओं की ज़िम्मेदारी बढ़ गई है। ऐसे आयोजन प्रतिरोध की दिशा में सफल प्रयास हो सकते हैं। मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश के हालिया दंगों पर बेहतरीन दस्तावेजी फिल्म बना चुके युवा फ़िल्मकार नकुल सिंह साहनी ने अपना वक्तव्य देते हुए खुद को ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ का एक साथी बताया। उन्होने कहा कि ऐसे फिल्मोत्सव दर्शकों के लिए एक नई अनदेखी दुनिया की हक़ीक़तें जानने का मौका तो मुहैया कराते ही हैं, साथ ही इनसे फ़िल्मकारों को भी काफी कुछ सीखने को मिलता है। दस्तावेजी फिल्मों की मार्फत जनता तक जाने और उससे सीखने की ललक को रेखांकित करते हुए नकुल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जैसे फिल्मोत्सव प्रयोगों को और आगे बढ़ाना होगा। 

स्वागत भाषण देते हुए ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने बताया कि आठ साल पहले उत्तर प्रदेश के छोटे से गोरखपुर जैसे कस्बे से शुरू हुआ यह आयोजन अब उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली जैसे सूबों की कई छोटी-बड़ी जगहों तक पहुंचा है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन के पीछे की असली ताकत लोग हैं। वे लोग जिन तक सत्ता प्रतिष्ठान, मीडिया घराने और फिल्मों की मुख्यधारा सच नहीं पहुँचने देती। लोगों में सच जानने की ललक है। सत्ता प्रतिष्ठानों, कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैसों के चंगुल को तोड़ते हुए जन-भागीदारी और जनता की ही पूंजी से ही हम इस आंदोलन को आगे बढ़ा पाये हैं। इस आंदोलन के आवेग और बढ़ाव का यही कारण है। इस आंदोलन को प्रतिशोध की बजाय प्रतिरोध का सिनेमा बताते हुए उन्होंने कहा कि देश में कारपोरेट फासीवाद और सांप्रदायिकता की पगध्वनियाँ सुनाई दे रही हैं, ऐसे में जरूरत है कि हम दस्तावेजी फिल्मों के माध्यम से प्रतिरोध की आवाज बुलंद करें और ऐसे आंदोलनों को दूर-दराज तक फैला दें। इन वक्ताओं के साथ मंच पर युवा फ़िल्मकार सूर्यशंकर दास, फिल्म समीक्षक विद्यार्थी चटर्जी और गण संस्कृति परिषद, पश्चिम बंगाल के सहसचिव अमितदास गुप्ता भी उपस्थित थे। 

उद्घाटन के मौके पर फिल्म समारोह की स्मारिका का भी विमोचन हुआ जिसमें दिखाई जाने वाली फिल्मों के संक्षिप्त परिचय के अलावा संजय काक, सूर्यशंकर दास, नकुल सिंह साहनी, बिक्रमजीत गुप्ता, मोइनाक बिस्वास जैसे महत्त्वपूर्ण फ़िल्मकारों और बीरेन दासगुप्ता, मानस घोष और संजय मुखोपाध्याय जैसे फिल्म अध्येताओं के महत्त्वपूर्ण लेख हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में लगातार हो रही सांप्रदायिक हिंसा की भाकपा- माले द्वारा जारी रपट ‘मुजफ्फरनगर दंगा: एक राजनीतिक-आपराधिक साजिश’ और जैनुल आबेदीन के शताब्दी-वर्ष के मौके पर चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा तैयार किए गए चार कविता पोस्टरों का भी लोकार्पण हुआ। उद्घाटन सत्र का संचालन पीपुल्स फिल्म कलेक्टिव, कोलकाता की संयोजक कस्तूरी ने किया। 

उद्घाटन सत्र के बाद दूसरे सत्र में गुरविंदर सिंह निर्देशित फिल्म ‘अन्हे घोड़े दा दान’ दिखाई गई। पंजाब के गांवों के दलित जीवन की गहरी वर्गीय सच्चाईयों को उकेरती जमीन और सम्मान के सवालों को गहराई से गूँथ देती है। शहर में दलितों के विस्थापन की त्रासदी को भी फिल्म उभारती है। फिल्म का परिचय देते हुए फिल्म समीक्षक विद्यार्थी चटर्जी से ने इसे ‘मिनिमलिस्ट स्टाइल’ का सिनेमा बताते हुए कहा कि अपनी इस शैली में फिल्म जमीनी हकीकतों को बेहतरीन तरीके से व्यक्त कर पाती है। वसुधा जोशी और रंजन पालित के निर्देशन में बनी फिल्म ‘वॉएसेज फ्राम बलियापाल’ समारोह में दिखाई जाने वाली दूसरी फिल्म थी। 1889 में सामाजिक मुद्दों पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली यह फिल्म ओड़िशा के ऐसे इलाके की कहानी है जहां मिसाइल परीक्षण इलाका बनाया जाने वाला था। लगभग 70,000 मछुवारों और किसानों के विस्थापन के दर्द को बयान करने के साथ ही यह फिल्म उनके अहिंसक आवेगमय प्रतिरोध को दर्ज करती है। 

चाय के बाद के सत्र की शुरुआत सूर्यशंकर दास द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रिप्रेशन डायरी: द केस ऑफ ओड़िशा’ दिखाई गई। यह फिल्म छोटे-छोटे वीडियो टुकड़ों की एक डायरी है, बेहतरीन कोलाज है, जो ओड़िशा में चल रही खनिज लूट, भीषण नृशंस दमन के अनसुने सच को सामने लाती है। फिल्म का दूसरा पहलू है आदिवासी व किसान समुदायों का जल-जंगल-जमीन के लिए प्रतिरोध। इस दमन, शोषण और अपमान के बहुराष्ट्रीय-देशी शासकवर्गीय दुष्चक्र के बीच भी लोगों का जुझारूपन, लड़ने की उनकी जरूरत और आकांक्षा, सबको फिल्म एक सूत्र में गूँथ कर पेश करती है। फिल्म के बाद दर्शकों के सवालों का जवाब देते हुए निर्देशक सूर्यशंकर दास ने कहा कि बड़े मीडिया घराने और अखबारात बहुराष्ट्रीय और देशी दलालों के हाथ बिके हुए हैं। ऐसे में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जैसे आयोजन ही वह मौका हैं, जहां से हम अपनी बात कह सकते हैं। संघर्षरत लोगों के खुद के बनाए हुए वीडियो फुटेजों का महत्त्व बताते हुए उन्होंने कहा कि जहां-जहां दमन होगा, संघर्ष होगा, कैमरा लिए हमें भी उस प्रतिरोध में शामिल रहना होगा। 

कश्मीर के सवालों पर बेहतरीन फिल्म ‘जश्ने आजादी’ बना चुके जाने-माने फ़िल्मकार संजय काक की ‘माटी के लाल’ फिल्म समारोह की अगली प्रस्तुति थी। पंजाब, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के विभिन्न जनांदोलनों को एक जगह एक वृत्तान्त में समेटने की कोशिश करती यह फिल्म जनता के संघर्ष के विभिन्न तौर-तरीकों और प्रयोगों को दर्ज करती है। भारतीय लोकतन्त्र की भयावहता का पर्दाफाश करती यह फिल्म बस्तर के आदिवासियों के सशस्त्र प्रतिरोध के साथ पंजाब के किसानों और ओड़िशा के आदिवासियों के संघर्ष को सामने लाती है। सरकारों द्वारा जनता के खिलाफ चलाये जा रहे युद्ध की बारीक पड़ताल करते हुई यह फिल्म लोगों की आँखों में बदलाव के सपने रेखांकित करती है। फ़िल्मकार संजय काक ने दर्शकों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि सरकारें और सत्ता वर्ग आदिवासी-मजदूर-किसान जैसे तबकों के खिलाफ युद्धरत हैं। ऐसे में लोग जैसे भी प्रतिरोध कर सकते हैं, वे कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह लोगों की जिंदगी का सवाल है, वे तो अपनी लड़ाई लड़ेंगे ही, लड़ ही रहे हैं। प्रतिबद्धता तय करना हमारे ऊपर है। 

पहले दिन की आखिरी फिल्म युवा फ़िल्मकार नकुल सिंह साहनी की ‘मुजफ्फरनगर टेस्टीमोनियल’ थी। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 07 सितंबर 2013 से शुरू हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद अभी तक सैकड़ों जाने जा चुकी, हजारों-हजार लोग गाँव छोड़ राहत शिविरों में विस्थापित हैं। लोकसभा चुनाव में राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए सरकार उन्हें खदेड़ने पर तुली है। नकुल साहनी का कैमरा हमें मुजफ्फरनगर की उन कठोर और भयावह सच्चाईयों से रूबरू कराता है जो मुख्यधारा में कहीं दर्ज नहीं हैं। इन दंगों के पीड़ितों में 95 फीसदी मुस्लिम समुदाय के लोग थे, जबकि मीडिया इसे दोतरफा दंगा बता रहा था। फिल्म संघ परिवार के ‘बहू बचाओ -बेटी बचाओ’ जैसे नारों के साथ सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की योजना का पर्दाफाश करती है और साथ ही तथाकथित समाजवादी सपा सरकार और उसकी पुलिस के काले कारनामों को भी उजागर करती है। फिल्म के बाद नकुल साहनी ने विस्तार से मुजफ्फरनगर और उत्तर प्रदेश में चल रही सांप्रदायिक प्रयोग की राजनीति के बारे में दर्शकों से बातचीत की। 

त्रिगुण सेन प्रेक्षागृह के बाहर प्रगतिशील आंदोलन के हमराह और चित्रकला में प्रतिरोध विकसित करने वाले महान चित्रकारों चित्तप्रसाद और जैनुल आबेदीन की कलाकृतियों की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई थी। किसान-मजदूरों के रोज़मर्रा की जिंदगी की हकीकत के साथ बंगाल के भयावह अकाल का यथार्थ बयान करने वाले चित्रों को दर्शकों को गहरे प्रभावित किया। साथ ही कोलकाता के युवा छायाकरों के चित्रों की प्रदर्शनी ने भी दर्शकों को आकर्षित किया। 


पहले कोलकाता पीपुल्स फिल्म फेस्टिवल के लिए 
कस्तूरी, संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा- कोलकाता द्वारा जारी 
फोन: +91- 9163736863, मेल: cor.kolkata@gmail.com



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