समीक्षा और शोध की त्रैमासिक पत्रिका 'समीक्षा' - Apni Maati: News Portal

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शनिवार, जनवरी 04, 2014

समीक्षा और शोध की त्रैमासिक पत्रिका 'समीक्षा'


बड़े भाई सत्यकाम जी के साथ-साथ सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज के प्रति आभार कि मुझे हर बार की तरह समीक्षा का अक्टूबर-दिसंबर, 2013 वाला अंक समय पर मिल गया । पुस्तक समीक्षा पर केंद्रित जितनी पत्र-पत्रिकाएं निकलती हैं उनमें बहुत पुरानी त्रैमासिक पत्रिका है 'समीक्षा' । पिछले 46 वर्षों से किसी पत्रिका का निरंतर प्रकाशित होना कोई हंसी-खेल नहीं । इससे गुज़रें तो जैसे समकालीन कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना आदि विधाओं की कई जानी-पहचानी और कई अनजानी किताबों की सम्यक समीक्षाएं मिल जाती हैं । इस बार भी उसी तरह । इस अंक में युवा कथाकार उर्मिला शिऱीष का नया साक्षात्कार भी है । उन्हें जाना-परखा जा सकता है ....पर मेरा ध्यान जहाँ अधिक देर तक लगा रहा वह है कथाकार, पत्रकार और संपादक तीनों रूपों में सक्षम और समर्थ रचनाकार बलराम जी की 'माफ़ करना यार' जैसी आत्मीय-संस्मरण की किताब पर प्रमोद भार्गव की खुली और दिलेरी से की गई समीक्षा - लेखकीय गरिमा के विनम्र आत्मकथ्य । प्रमोद जी लिखते हैं - 

"बलराम को जहाँ गुजांइश दिखती है वामपंथ और छद्म धर्मनिरपेक्षता पर चोट करते हैं । भीष्म साहनी के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार में आयोजित कर्मकांड को लेकर नामवर सिंह लिखते हैं, चिता सजी थी । चिरी लकड़ियों की शैया पर भीष्म लेटे थे । पितामह साहित्य के । इधर वेद मंत्रोच्चार और उधऱ पंक्तिबद्ध बौद्ध भिक्षुओं का समवेत मंत्र पाठ । गरज कि भीष्मजी के 'वांग्चू' भी इस मौके पर मौजूद थे । सेकुलर सज्जनों के लिए यह सब 'पिक्यूलियर' था । कुछ-कुछ धर्म संकट-सा । भीष्म साहनी की अंत्येष्टि में ऐसा धार्मिक अनुष्ठान !...इस पूरी किताब में बलराम को ऐसा गिला-शिकवा किसी लेखक पत्रकार से नहीं है, कि वे प्रतिकार लेने को उद्यत हो जाएं । राजेंद्र माथुर और विष्णु खरे उनकी पदोन्नति में बाधक बनते हैं, इसके बावजूद वे उदार या निर्विकार बने रहते हैं। कर्तव्य पालन के चलते वे अपने बेटे का उचित इलाज नहीं करा पाते और वह चल बसता है । "

जानकारी -जयप्रकाश मानस 



संपादक-सत्यकाम
संपर्क- एच-2, यमुना, इग्नू, 
मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-68, 
फोन-011-29533534

मूल्य - 30 रुपए
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