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मंगलवार, दिसंबर 17, 2013

‘एक डूबते जहाज की अन्तर्कथा’:औपन्यासिक प्रविधि में सीधे संवाद करने की कोशिश की गई है।

‘एक डूबते जहाज की अन्तर्कथा’ मध्यवर्गीय विडम्बनाओं का उपन्यास है। जैसे प्रेमचंद के कफन व गोदान कोई आशा नहीं जगाता, वैसा ही कुछ इस उपन्यास में भी है। कोशिश है कि यह समाज का आईना बने और परिवर्तन की गहरी चाह पैदा करे। इसमें मध्यवर्ग पर लिखते हुए पूरे समाज पर बातचीत की गई है। औपन्यासिक प्रविधि में सीधे संवाद करने की कोशिश की गई है। डूबता जहाज मध्यवर्ग का रूपक है जो भूमंडलीकरण के सागर में गोते लगा रहा है। यह नव उदारवाद की फौज बन गया है।

यह बात कथाकार व उपन्यासकार रवीन्द्र वर्मा ने आज अपने नये उपन्यास ‘एक डूबते जहाज की अन्तर्कथा’ पर आयोजित परिसंवाद में कही। परिसंवाद का आयोजन आज लखनऊ विश्वविद्यालय के ए पी सेन हाल में जन संस्कृ ितमंच और उत्कृष्ट केन्द्र, हिन्दी विभाग द्वारा किया गया। इसकी अध्यक्षता करती हुई वरिष्ठ कवयित्री व पत्रकार वन्दना मिश्र ने कहा कि रवीन्द्र वर्मा का यह उपन्यास सामाजिक व राजीतिक उपन्यास है। यह आज की समस्याओं को गहरी संवेदना के साथ पकडता है, छोटे छोटे डिटेल्स हैं जैसे वृद्धावस्था का अकेलापन, भूख की समस्या, किसानों की अत्महत्या, पिता का चरित्र, नरेगा, भ्रष्टाचार आदि। इसकी ताकत रवीन्द्र जी की भाषा है जो बहुत कुछ बतकही की शैली जैसी है।

रवीन्द्र वर्मा के इस उपन्यास पर बोलते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि रवीन्द्र वर्मा अपनी औपन्यासिक कृतियों में मध्यवर्ग का क्रिटिक रचते है। नवउदारवाद के साथ सांप्रदायिकता व कट्टरपंथ का जो जो गठजोड़ है उस पर उनकी निगाह रही है। पूंजीवादी व्यवस्था में रूपान्तरण हुआ है। नेहरू मॅडल से लेकर भूमंडलीकरण तक की पूंजीवाद की इस यात्रा का प्रभाव मध्यवर्ग की  भूमिका पर हुआ है। उसकी जीवन शैली में बदलाव आया है। इस बदलाव ने उसे देश व समाज के सरोकारों से विछिन्न कर दिया है। इस मध्यवर्ग से वही आशा नहीं की जा सकती है जो कल थी। ऐसा भूमंडलीकरण की वजह से हुआ है। रवीन्द्र वर्मा के उपन्यासों में यह यथार्थ पहले भी आया है, यहां तक कि कई उपन्यासों के पात्र भी मिलते जुलते हैं। हम आशा करते हैं कि रवीन्द्र वर्मा अपने आगे की रचनाओं में इस अनुभव संसार का अतिक्रमण करेंगे।

कवि और आलोचक चन्द्रेश्व का कहना था कि यह उपन्यास बड़े सूक्ष्म तरीके से कई बातें कहता है। यह डूबता जहाज मध्यवर्ग का है। यह चिरगांव से गुड़गांव की यात्रा करता है। इस यथार्थ को सामने लाता है कि मध्यवर्ग उपभोक्तावाद का गुलाम बन गया है। किसान भूख से हार गया और मध्यवर्ग माइक्रोवेव से हार गया। युवा आलोचक व लविवि में हिन्दी के प्रवक्ता प्रो रविकान्त ने कहा कि यह उपन्यास मध्यवर्ग का नहीं, उच्च मध्यवर्ग का आख्यान है। गंुड़गांव से चिरगांव की यह यात्रा वास्तव में ग्लोबल गांव की यात्रा है। देश का अमेरीकीकरण हो रहा है। मध्यवर्ग अपने सपने इसी के इर्द गिर्द देखता है। रवीन्द्र वर्मा का उपन्यास इसी की अर्न्तकथा है।

कथाकार शकील सिद्दीकी का कहना था कि इस उपन्यास की भाषा बड़ी समृद्ध है। रवीन्द्र वर्मा ने इस उपन्यास के द्वारा अपने समय का आख्यान प्रस्तुत किया है। ‘निष्कर्ष’ के संपादक गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि मध्यवर्ग के अन्दर जिस तरह संवेदनाएं शुष्क व निमर्म हुई हैं, उस पर यह प्रहार करता है। भूमंडलीकरण में मध्यवर्ग का जो रूप सामने आया है वह नकारात्मक ज्यादा है। उसके अन्दर के अन्दर लोभ व लालच की संस्कृति ने अपना जगह बनाया है। उपन्यास में इसकी अभिव्यक्ति है। प्रो रमेश दीक्षित का कहना था कि रवीन्द्र वर्मा मध्यवर्ग की कुंठाओं, स्खलन के प्रामाणिक लेखक है। यह उनके तमाम उपन्यासों में देखा जा सकता है। यह उपन्यास उस मध्यवर्ग का आख्यान है जो जमीन और अपनी जड़ों से कटा हुआ है जो अमरीका में अपना भविष्य देखता है।  

अपने संयोजकीय वक्तव्य में कवि कौशल किशोर ने कहा कि रवीन्द्र वर्मा का यह उपन्यास लघु है लेकिन इसका फलक बड़ा है। यह हमारे समय के खास दौर को सामने लाता है। यह न सिर्फ डूबते जहाज की नियति का बयान करता है बल्कि इस पर सवार यात्रियों की नीयत को सामने लाता है। यह मध्यवर्ग के द्वन्द्व और सपने का अख्यान है जो अभाव, कुठा और लालच से निर्मित हो रहा है। इस अर्थ में रवीन्द्र वर्मा का यह उपन्यास आज के दौर का अत्यन्त महत्वपूर्ण उपन्यास है। परिसंवाद को भगवान स्वरूप कटियार, प्रताप दीक्षित, राकेश, उषा राय, के के वत्स आदि ने भी संबोधित किया। इस मौके पर नाटककार राजेश कुमार, कवयित्री प्रज्ञा पाण्डेय व विमला किशोर, उपन्यासकार शीला रोहेकर, ‘रेवान्त’ की संपादक अनीता श्रीवास्तव, कवि वी एन गौड़, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, रेणु बाला, इंदु पाण्डेय आदि सहित लखनउ विश्वविद्यालय के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

कौशल किशोर

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