अनिमेष की दसवीं पुण्य तिथि आयोजन रिपोर्ट - Apni Maati: News Portal

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रविवार, दिसंबर 01, 2013

अनिमेष की दसवीं पुण्य तिथि आयोजन रिपोर्ट

कौशल किशोर

जीवन का सबसे बड़ा दुख है तीन पीढ़ियों के रहते सबसे किशोर पीढ़ी का साथ छोड़ देना। प्रतिभा व सृजनात्मक संभावनाओं से लबरेज ‘अप्पू’ ने जब इस दुनिया से विदा ली उस वक्त उसकी उम्र मात्र इक्कीस साल थी। नाम तो अनिमेष श्रीवास्तव पर घर, परिवार और दोस्तों के लिए वह ‘अप्पू’ था।  उसके अन्दर जीवन को जानने, बनी बनाई लकीरों को तोड़ने की बड़ी तडप थी। उसमें उड़ने और आसमान को लांघ जाने, उसके पार जाने की चाहत थी। अपनी इसी चाहत के तहत 6 नवम्बर 2003 को उसने ऐसी उड़ान भरी कि फिर वह लौट नहीं पाया। यह पिता, माता, दादी, दादा सहित सारे परिवार, दोस्तो और हम सब के लिए बज्रपात था। दस साल बीत गये लेकिन लगता है जैसे सब कल की बाते हैं। अनिमेष के पिता कवि अशोक चन्द्र, मां करूणा श्रीवास्तव, दादा डॉ श्याम चन्द्र श्रीवास्तव व दादी विजय मोहिनी, चाचा कथाकार दीपक श्रीवास्तव व सबने सामूहिक रूप से इस दुख को जिया। 

शोक को शक्ति में बदलने की कोशिश के द्वारा ही आगे बढ़ा जा सकता है। इसी कोशिश के तहत  अनिमेष फाउण्डेशन का गठन हुआ। 25 अगस्त 2004 को अनिमेष के जन्म दिन के अवसर पर अशोक चन्द्र के कविता संग्रह ‘धरती ने दिये हैं बीज’ की तरह एक नया अनिमेष सामने आया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में हुए इस पहले आयोजन के साझीदार बने श्रीलाल शुक्ल, कामतानाथ, अनिल सिन्हा, पंकज चतुर्वेदी, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव,  कृष्ण मोहन, वीरेन्द्र यादव, शिवमूर्ति, अजय सिंह, राकेश, शोभासिंह, रमेश दीक्षित, हरिचरन प्रकाश, दयाशंकर राय, योगीन्द्र द्विवेदी, कौशल किशोर आदि लेखक व रचनाकार। उसके बाद से हर साल अनिमेष फाउण्डेशन विविध कार्यक्रमों के माध्यम से अनिमेष की स्मृति को जीवित करता है तथा उसके होने को हमारे आस पास जीवन्त बनाता है। इसी क्रम में इस साल बीते 6 नवम्बर 2013 को अनिमेष श्रीवास्तव की दसवीं पुण्य तिथि पर  लखनऊ के रायउमानाथ बली प्रेक्षागृह में विविध कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। 

कार्यक्रम तीन सत्रों में बंटा था। पहले सत्र में इस मौके पर प्रकाशित पुस्तक ‘उड़ने को आकाश’ का लोकार्पण हुआ। यह पुस्तक अत्यन्त कलात्मक सज धज के साथ अनिमेष के संपूर्ण व्यक्तित्व को उभारती है। अनिमेष की कविता ‘स्कूल के बोझ तले दबे एक छात्र की इच्छा’ से यह शुरू होती है। इसमें सुभद्रा कुमारी चौहान का ‘पुत्र वियोग’ जैसी कारुणिक कविता के साथ अनिमेष की टिप्पणियां, डायरी, पत्र, उसके दोस्तों की कविताएं, उनके संस्मरण, अशोक चन्द्र की डायरी, अनिमेष फाउण्डेशन की गतिविधियों की रिपोर्ट आदि हैं जो अनिमेष के व्यक्त्ति तथा फाउण्डेशन के उद्देश्य व क्रियाकलाप से हमारा परिचय कराती है। यह पुस्तक ऐसे चित्रों से भरी है जो अनिमेष के जन्म से लेकर उसकी आगे की विकास यात्रा को सामने लाती है। इसका संपादन लेखक बंधु कुशावर्ती और कथाकार दीपक श्रीवास्तव ने किया है, वहीं इसकी परिकल्पना कवि अशोक चन्द्र की है। 

इस पुस्तक के लोकार्पण के सत्र में अनिमेष के मित्र अखिलेश ने उसकी स्मृति में लिखी कविता का पाठ किया। इस सत्र को कवि व जसम लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर, लेखक बंधु कुशावर्ती व अनिमेष के साथी फलाईंग आफिसर मयंक नौटियाल ने संबोधित किया। संचालन किया अनिमेष के पिता कवि अशोक चन्द्र ने। उन्होंने कहा कि हमने अनिमेष को खो भले दिया है पर फाउण्डेशन के माध्यम से अनिमेष ने हमें प्रतिभाशील नौजवानों और समाज से जोड़ दिया है। समाज से जुड़ने से ही शोक व दुख बंटता है और वह सामाजिक बनता है।  

कार्यक्रम का दूसरा सत्र विमर्श का था जिसमें अनिमेष स्मृति व्याख्यान का विषय था ‘स्त्री और आज का समय’। विषय प्रवर्तन करते हुए युवा कवयित्री व आलोचक प्रीति चौधरी ने कहा कि आज का समय ऐसा है जब स्त्रियों ने सदियों की चुप्पी को तोड़ा है। स्त्री प्रतिरोध का स्वर उभरा है। इसका दूसरा पहलू है कि मनुष्य विरोधी शक्तियां या कहिए अंधेरे की शक्तियां उजाले को निगलने को तैयार है। महिला सशक्तीकरण की बात हो रही है लेकिन यह सब बहुत ऊपरी तौर पर है। स्त्रियों को अपने एक एक अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ा है। यहां तक कि पश्चिम में भी स्त्रियों को संघर्ष से ही मत देने का अधिकार मिला है। स्त्रियों का संघर्ष कई रूपों में सामने आता है। लोककथाओं, लोकगीतों के माध्यम से उन्होंने अपनी व्यथा को अभिव्यक्त किया है। स्त्रियों ने साहित्य के माध्यम से अपनी आपबीती लिखी है।

प्रीति चौधरी ने आगे कहा कि आज नारीवाद स्त्री विमर्श के रूप में सामने आया है। इस नारीवाद के केन्द्र में सेक्स और जेंडर का सावल है। यहां स्त्री स्वतंत्रता देह से शुरू होकर देह तक खत्म हो जाती है। यह नारीवाद भूमंडलीकरण की देन है। यह वास्तव में छलावा है। हम देखते हैं कि पढ़ने लिखने, नौकरी करने व अर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद भी स्त्रियों की पारंपरिक भूमिका और मानसिक गुलामी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में रेडिकल नारीवाद की जरूरत है जहां भौतिक मुक्ति ही नहीं, मानसिक मुक्ति ज्यादा जरूरी है। स्त्रियों का संघर्ष बराबरी के ऐसे समाज के लिए है जहां स्त्री होना उसके लिए बाधा न बने और जहां उसे स्वतंत्रता और बराबरी का माहौल मिले।

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन ;एपवाद की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि यह ऐसा स्त्री विरोधी समय है जहां राज्य, समाज, धर्म सभी स्त्रियों के विरुद्ध हैं। सांप्रदायिक दंगों में स्त्रियां सबसे ज्यादा इसकी शिकार बनाई जाती हैं। मुजफ्फरपुर के दंगे इसका ताजा उदाहरण है। धर्म की नजर में वे स्त्रियां खराब है जो अपने अधिकारों व स्वतंत्रता की बात करें। इनकी नजर में दबी कुचली रहने वाली, इनके द्वारा सदियों से बनाये  को बाजार की वस्तु में बदल दिया है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ओर आक्रामक हुई है। भ्रूण हत्याएं, दहेज हत्याएं, बलात्कार, महिला हिंसा पितृसत्तात्मक मानसिकता की देन है। कहने के लिए लोकतंत्र व कानून का शासन है लेकिन महिलाएं कही सुरक्षित नहीं है।

ताहिरा हसन का कहना था कि स्वागतयोग्य बात है कि आज के दौर में महिलाएं संगठित हो रही हैं और आंदोलन में उतर रही हैं। ग्रामीण महिलाएं भी संगठन में आ रही हैं। महिला आंदोलन का मध्यवर्गीय दायरा टूट रहा है। 16 दिसम्बर की घटना ने इस आंदोलन को नया आवेग दिया है। इसने सरकार को बाध्य किया है कि वह बलात्कार के विरुद्ध कानून बनाये। हमारा आंदोलन पुरुषों के विरुद्ध नहीं है बल्कि वह पुरुषवादी सत्ता - राज्य व समाज व्यवस्था के विरुद्ध है। यह संघर्ष समानता और बेखौफ आजादी के लिए है।

व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता लेखिका व सामाजिक कार्यकर्ता शालिनी माथुर ने किया। उनका कहना था कि स्त्री का जीवन पीड़ा व शोषण से भरा है। उसकी दिनचर्या ऐसी है कि वह घर में सबसे पहले उठती है और सबसे बाद में सोती है। इस औरत के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की गई, कहानियां व कविताएं लिखी गईं लेकिन यथार्थ में इसके प्रति उपेक्षा का भाव रहा है। हिन्दी साहित्य में स्त्री को ‘सेक्सुअल कोमोडिटी’ के रूप में देखा गया हैं। शालिनी माथुर ने इस बात के लिए प्रगतिशीलों की आलोचना भी की कि इनके जीवन में बड़ा फांक व विरोधाभास है। साहित्य में प्रगतिशील और जीवन में पुरातन। स्त्रियों को इनके छद्म जनवाद से भी संघर्ष करना पड़ेगा। शालिनी ने भूमंडलीकरण और पूंजीवादी तकनीक की इस बात के लिए प्रशंसा की कि उसकी वजह से महिलाओं में आधुनिकता व स्वतंत्रता आई है। यह आंदोलनों से नहीं हुआ है। 

व्याख्यान का यह सत्र काफी जीवन्त और विचारोत्तेजक था। सत्र के अंत में सवाल जवाब भी हुआ। कइयों ने सत्र की अध्यक्षता कर रही शालिनी मथुरा के विचारों से अपना गहरा मतभेद भी जाहिर किया। इसमें प्रो0 रमेश दीक्षित और इप्टा के राकेश प्रमुख थे। इस सत्र का संचालन कथाकार दीपक श्रीवास्तव ने किया।   

कार्यक्रम के अन्तिम सत्र में नाटक ‘सात पालों वाली नाव’ का मंचन हुआ। यह नाटक दीपक श्रीवास्तव की कहानी ‘सत्ताइस साल की सांवली लड़की’ और आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ पर आधारित था। इसका मंचन सूत्रधार, आजमगढ ने किया। इस नाटक की कहानी सत्ताइस साल की अत्यन्त प्रतिभाशील सांवली लड़की के इर्द गिर्द धूमती है। सांवला होना उसके लिए अभिशाप है। वह समाज में जड़ जमा चुके बाजार द्वारा स्थापित सौंदर्य प्रतिमानों के बीच उलझ कर रह जाती है। वह 17 बार शादी के लिए दिखाई जाती है लेकिन ओढ़ा गया आडम्बरी सौंदर्य हर बार उसकी प्रतिभा और उसके सांवलेपन को ठेंगा दिखा देता है। पहले तो उसे बड़ा कष्ट होता है। वह असमंजस्य में रहती है। उसे ऐसा महसूस होता है मानो अन्दर ही अन्दर उसका कुछ मर रहा है। बार बार के अस्वीकार से वह कमजोर पड जाती है। कुरूप होने का दंश उसे अन्दर ही अन्दर सालता है। मन यह सवाल उठता है कि क्या शरीर का सुन्दर होना ही सब कुछ है। अपने इस जद्दोजहद से वह बाहर निकलती है। इस नाटक में आलोक धन्वा की कविता का बहुत सुन्दर इस्तेमाल हुआ है। इस नाटक का निर्देशन भारतेन्दु कश्यप का है, वहीं ममता पंडित अपने एकल अभिनय से सांवली लड़की के चरित्र को बखूबी मंच पर उतारा। 

इस नाटक का परिचय नाटककार राजेश कुमार ने दिया। नाटक के कलाकारों को स्मृति चिन्ह देकर अनिमेष की मां करूणा श्रीवास्तव ने उनका सम्मान किया।

एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017 Print Friendly and PDF

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