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मंगलवार, नवंबर 12, 2013

''बहुत कुछ है जिसे हम आदिवासी समाज के इतिहास एवं जीवन से सीख सकते हैं''- हरीराम मीणा

हरिराम मीणा
ऐतिहासिक उपन्यास धूणी तपे तीर 
से लोकप्रिय 
सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी,
विश्वविद्यालयों में 
विजिटिंग प्रोफ़ेसर 
और राजस्थान विश्वविद्यालय
में शिक्षा दीक्षा
ब्लॉग-http://harirammeena.blogspot.in
31, शिवशक्ति नगर,
किंग्स रोड़, अजमेर हाई-वे,
जयपुर-302019
दूरभाष- 94141-24101
ईमेल - hrmbms@yahoo.co.in
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अब से करीब बीस बरस पहले बाबा पथिक वर्मा जी के संपादन में उदयपुर से प्रकाशित होने वाली अरावली 'उद्घोष' पत्रिका में मानगढ़ के आदिवासी बलिदान के बारे में पढ़ा. तब से इस घटना से सम्बंधित सामग्री जुटाना शुरू किया. सबसे पहले एक लेख लिखा जो दैनिक भास्कर में आया. फिर एक यात्रा वृत्तान्त जिसे साहित्यिक पत्रिका पहल ने छापा. फिर करीब तीस पेज की एक लम्बी कविता जो भोपाल से निकलने वाली प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका वसुधा में प्रकाशित हुई. मन नहीं भरा तो यह उपन्यास. 


आदिवासी शहादत की घटना पर केन्द्रित है यह उपन्यास, इसलिए अब मैं केवल आदिवासी की बात करूँगा. आदिवासी समाज के बारे में हम बहुत कुछ नहीं जानते. बहुत सारी भ्रांतियां हैं आदिवासी समाज को लेकर. आदिवासी समाज की जो छवि गढ़ दी गयी है उसे लेकर दो तरह का नजरिया हमारे सामने आता है. एक, रोमांटिक जो केवल यह मानता है कि समृद्ध प्रकृति की गोद में आदिवासी मस्त होकर नाचते.गाते रहते हैं. जो भी उनकी मस्ती है उसे भौतिक दशा मानने की भूल कर दी जाती है. यह नहीं देखा जाता कि नाचना.गाना उनकी नैसर्गिक प्रवृत्ति है, अन्यथा भौतिक दशा तो नाच.गान वाली नहीं है. दूसरा नजरिया है वाइल्ड सेवेज का. आदिवासी लोग जंगली.बर्बर होते हैं. और इस नजरिया के सूत्रधार थे अंग्रेज़. ये दोनों ही दृष्टिकोण हमें आदिवासियों के यथार्थ तक नहीं ले जा सकते. आश्चर्य की बात है अब से पूरे सौ बरस पहले हुए मानगढ़ बलिदान को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्थान नहीं मिला.

जब हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की बात चलती है तो हम शुरू करते हैं सन 1857 से. और यह भूल जाते हैं कि वे केवल आदिवासी लोग थे जिन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए तब से लड़ना शुरू किया जब से अंग्रेजों ने इस देश की धरती पर पांव रखे. सन 1770.71 के पलामू विद्रोह से सन 1932 से 1947 की अवधि में नागारानी गाईदिल्यू के संग्राम तक लगातार. इन पूरे पौने दो सौ साल की अवधि में कोई ऐसा दशक नहीं है जिसमें आदिवासी समाज ने ब्रिटिश व सामंती ताकतों से मुठभेड़ ना की हो. कोई आदिवासी अंचल अछूता नहीं रहा चाहे नागा.खासी.मिज़ो संघर्ष, सिद्दू.कानो का संथाल परगना, झारखण्ड में बिरसा मुंडा, मध्यप्रांत का टंट्या मामाभील, गुजरात में जोरजी भगत, महाराष्ट्र में ख्याजा नायक, आंध्र में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में लड़ने वाले आदिवासी, केरल की किसान क्रांति या अंडमान में अबेर्दीन का संग्राम अथवा राजस्थान गुजरात की सीमा पर 17 नवम्बर सन 1913 के दिन दी गयी मानगढ़ की शहादत हो.

बहुत कुछ है जिसे हम आदिवासी समाज के इतिहास एवं जीवन से सीख सकते हैं खासकर, वैश्वीकरण के इस दौर में, जब जल.जंगल.जमीन पर पड़ रहा हो चौतरफा दबाव. हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि इस महान देश की प्राकृतिक सम्पदा को अगर किसी ने अबतक बचाए रखा है तो वह है केवल आदिवासी समाज और वह भी एक कस्टोडियन की हैसियत से. ओनरशिप का दावा उसने कभी नहीं किया. आदिवासी आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है. यह हमारे लिए अत्यंत चिंता का विषय होना चाहिए. सन 2013 का यह वर्ष मानगढ़ शहादत की शताब्दी का वर्ष है. इस बलिदान का व्यवस्थित इतिहास लिखना अभी बाकी है. 

मुझे दिए गए बिहारी सम्मान के लिए मैं बिड़ला फाउण्डेषन का, पुरष्कार निर्णायक समिति का, विशेषकर श्रद्धेय नन्द किशोर आचार्य जी एवं नन्द भारद्वाज जी का तथा आप सभी महानुभावों का ह्रदय से आभारी हूँ. और कृतज्ञ रहूँगा महामहिम राज्यपाल महोदया का जिनके कर-कमलों से मुझे यह सम्मान मिला. जय हिन्द !



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1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

आदिवासी विमर्श को एक नया आयाम देने व बिहारी पुरस्कार के लिए देर सारी बधाईयाँ......

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