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रविवार, अक्तूबर 20, 2013

''स्त्री विमर्श के दौरान सबसे ज्यादा जरूरत है तो परम्परा से चले आ रहे पुरुष निर्मित संजाल को समझने की है। ''-प्रो. रोहिणी अग्रवाल

चूरू, 19 अक्टूबर। 

शहर के लोहिया कालेज मेंराष्ट्रीय सेमीनार ‘स्त्री विमर्शः कल, आज और कल’ के दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए रोहतक विश्वविद्यालय की हिंदी विभागध्यक्ष एवं प्रख्यात आलोचक प्रो. रोहिणी अग्रवाल ने कहा कि आज अग्रवाल ने कहा कि आज स्त्री विमर्श कहीं पुरुष के विरोध में नहीं खड़ा है, अपितु वह पुरुष को समझते हुए स्त्री के हक की ओर बढ रहा है। पुरुष एवं स्त्री दोनों एक दूसरे के सहभागी हैं, न कि प्रतियोगी। स्त्री-पुरुष की कोई जाति नहीं, दोनों ही मनुष्य हैं। 

सेमीनार में नई दिल्ली से पधारी साहित्यकार सुमन केसरी ने कहा कि आज पुरुष भी स्त्री के मर्म को समझने लगा है और कहीं-कहीं वह स्वयं को बदलने भी लगा है। उन्होंने दिल्ली के निर्भया प्रकरण में सम्वेत स्वर में उठी आवाज का हवाला देते हुए बात को पुख्ता किया। कार्यक्रम में प्रख्यात लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, अल्पना मिश्र ने भी सहभागिता निभाते हुए विषय को आगे बढाया। सत्र का संचालन करते हुए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डाॅ गंगासहाय मीणा ने कहा कि स्त्री न केवल शोषित है बल्कि दमित भी है। उन्होंने आदिवासी स्त्री प्रसंग को उठाते हुए स्त्री के दबंग रवैये की सराहना की तथा अर्थार्जन में बराबर भागीदारी की समझ को विकसित करने की जरूरत बताई।  इस सत्र में वनस्थली विद्यापीठ, टोंक से आई शशिबाला, जेएनयू दिल्ली की शोधार्थी मिथिलेश कुमारी, स्नेह सुधा, आकृति चंद्रा, वीरेंद्र मीणा, सुमित द्विवेदी, भावना वेदी, उदयपुर की नीतू परिहार, गंगानगर की अनीता शर्मा, रवींद्र कुमार शर्मा सहित देश के विभिन्न कोनों से आए शोधार्थियों ने अपने पत्र पढे और शिरकत की। 
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चूरू, 20 अक्टूबर। शहर में माॅडर्न थिएटर की पहली प्रस्तुति के रूप में प्रदेश के वरिष्ठ रंगकर्मी दिनेश प्रधान द्वारा निर्देशित हास्य नाटक ‘नाराज निकम्मा’ ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद विसंगतियों पर कड़े प्रहार करते हुए दर्शकोें को खूब गुदगुदाया और झकझोरा भी। 

लोहिया काॅलेज में चल रहे राष्ट्रीय सेमीनार के पहले दिन शनिवार शाम को जयपुर की रंगशीर्ष आर्ट एंड कल्चर सोसायटी की ओर से हुए इस मंचन में कलाकारों ने एक से बढकर एक अभिनय कर देशभर से आए शोधार्थियों और शहरवासियों की दाद पाई। नाटक ने घरेलू जीवन के कथानक और रोचक घटनाक्रम के बहाने देश की राजनीतिक और सामाजिक विदू्रूपताओं पर धारदार व्यंग्य किया और सत्ता व व्यवस्था की पंगुता को दर्शाया। महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाले, नेताओं का दोगला चरित्र, राजनीतिक सौदेबाजी, नौकरशाही आदि किस तरह देश के आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करती है, इसे नाटक में बखूबी दिखाया गया है। साथ ही समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता नाटक अपना संदेश देने में सफल दिखाई दिया। वरिष्ठ रंगकर्मी दिनेश प्रधान के कुशल निर्देशन की छाप इस मंचन में साथ दिखी। कलाकारों की बेहतरीन संवाद अदायगी और सधे हुए अभिनय ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। धीरज भटनागर, अनीता प्रधान, मान्या रावत के बेहतर अभिनय ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया। विनोद जोशी, चंचल शर्मा, दीपक शर्मा, जितेंद्र परमार, शिवसिंह पालावत, अंशुल शर्मा भी असरदार रहे। बेहतरीन ध्वनि एवं प्रकाश संयोजन ने भी प्रस्तुति को प्रभावी बनाया। निर्देशक दिनेश प्रधान ने बताया कि हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना पुराना खिलाड़ी का नाट्य रूपांतरण धीरज भटनागर ने किया और नाटक अब तक इलाहाबाद, आगरा, जोधपुर, उदयपुर और जयपुर में विभिन्न समारोहों में मंचित किया जा चुका है। 

इस मौके पर कालेज व्याख्याता रणजीत सिंह बुडानिया ने सभी कलाकारों को सम्मानित किया और कहा कि नाटक के मंचन ने शहर में एक नई शुरुआत की है। प्राचार्य डा एमडी गोरा ने आभार जताया। इस मौके पर हिंदी विभागाध्यक्ष डा मंजु शर्मा, उम्मेद गोठवाल, आलोक सैनी, गीता सामौर, संतोष बलाई, साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित दुलाराम सहारण व कुमार अजय, डा रविंद्र कुमार बुडानिया सहित बड़ी संख्या साहित्यकार, शोधार्थी एवं नागरिक मौजूद थे। 

स्त्री विमर्श को लेकर दो दिन से लोहिया काॅलेज में चल रहा सेमीनार ‘स्त्री विमर्श: कल, आज और कल’ दोयम दर्जे पर झूलती स्त्री के उत्थान और स्त्री-पुरुष समानता के आह्वान के साथ रविवार को संपन्न हुआ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और लोहिया काॅलेज की ओर से आयोजित सेमीनार के चतुर्थ सत्र की अध्यक्षता करते हुए जेएनयू दिल्ली के भारतीय भाषा केंद्र के प्रोफेसर एवं साहित्यकार रामबक्ष ने अपनी चिरपरिचित शैली में चुटकियां लेते हुए कहा कि रोजमर्रा की जिंदगी में पुरुष स्त्रियों के साथ बहुत क्रूरता से पेश आते हैं और स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण नजरिया रहता है। इस नजरिए में बदलाव की जरूरत है लेकिन हम बदलाव नहीं चाहते, आगे कदम बढाने से डरते हैं। उन्होंने कहा कि अल्पमत में ही सही, एक तबका है जो जाति व धर्म से ऊपर उठकर सोचता है लेकिन परिवर्तन का नारा प्रतिगामी हाथों में चला गया है। उन्होंने कहा कि वे समानता पर आधारित संबंधों के पक्षधर है और समाज में स्त्री या पुरुष किसी के भी दोयम दर्जे को मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि हमारे देश में विपुल मात्रा में लोक साहित्य है, जो आने वाले पचास साल बाद लुप्त हो जाएगा। अगर आप अपने देश व संस्कृति से प्यार करते हैं तो इस साहित्य को बचाने का काम करें।

सत्र के मुख्य अतिथि हिंदी व राजस्थानी के जाने-माने लेखक डाॅ नंद भारद्वाज ने कहा कि हम सारे विरोधी स्वरों के बीच संतुलित समझ को विकसित करना है ताकि जिसमें हम सब मनुष्य समझे जाएं और एक दूजे के विकास में अपना योगदान दें। उन्होंने कहा कि कहीं न कहीं किसी न किसी पक्ष से चूक, अवहेलना और संवेदनाओं की अनदेखी जरूर हुई है कि आज यह समाज में विभिन्न वर्गों के बीच भयावह स्थितियां पैदा हो गई हैं। उन्होंने कहा कि विवाह नाम की संस्था ने भी बहुत नाइंसाफियां की हैं और उससे बहुत सारी दुष्प्रवृत्तियां पैदा हुई हैं। उन्होंने कहा कि स्त्री को अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए लड़ना होगा। अपने तल्ख व्यक्तव्य पर हुई टिप्पणियों पर चर्चा करते हुए युवा पत्रकार मनीषा पांडेय ने कहा कि हिंसा यह नहीं कि मैंने कह दिया, हिंसा यह है कि आप सुन नहीं सकते। उन्होंने लड़कियों से परम्परावादी सोच को छोड़कर अपना भविष्य खुद तय करने का आह्वान किया। सत्र का संचालन करते हुए जेएनयू दिल्ली के प्रोफेसर गंगासहाय मीणा ने कहा कि पिछड़े, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के लिए आरक्षण जरूरी है क्योंकि आरक्षण से ही उनका समुचित प्रतिनिधित्व तय हो सकता है।

उन्होंने कहा कि सदियों से पिछड़े वर्गों की विकास में समुचित भागीदारी हो, यह जरूरी है और इसके लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। अंग्रेजी के युवा साहित्यकार देवेंद्र जोशी, बैंगलोर से आई राजेश्वरी, लखनऊ के जयप्रकाश तिवारी, डा एम डी गोरा, डा मंजु शर्मा, राजकुमार ने भी विचार व्यक्त किए। कालेज प्राचार्य डा एम डी गोरा की अध्यक्षता में हुए समापन सत्र में डा मंजु शर्मा ने दो दिवसीय सेमीनार की सार्थकता पर चर्चा की और निष्कर्ष प्रस्तुत किए। हिंदी विभाग की संतोष बलाई ने आभार जताया। संचालन वरिष्ठ प्राध्यापक कमल कोठारी व गीता सामौर ने किया। इस दौरान डा एल एन आर्य, कुमार अजय, डा कृष्णा जाखड़, विभा श्रीवास्तव, शालिनी हेमकार, दुलाराम सहारण, जगजीत कविया, संजय कस्वा, रवींद्र बुडानिया, रणजीत सिंह बुडानिया, हेमंत मंगल, मुकुल भाटी, बाबूलाल दर्जी, सुधाकर सैनी, सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी, साहित्यकार एवं नागरिक मौजूद थे।  

रविवार को हुए पत्र वाचन

सेमीनार के दूसरे दिन रविवार को स्त्री विमर्श से जुड़े विभिन्न विषयों पर जयप्रकाश तिवारी, अरूंधति, राजश्री, समापिका, रोहिणी, शशि गोयल, शुभमश्री, सुमित द्विवेदी, डा श्यामा सिंह, डा सुनीता गुप्ता, वंदना चैबे, सुरजीत सिंह बरवाल, रवींद्र कुमार शर्मा, अंशिता शुक्ला, स्नेह सुधा, विजय प्रधान, नूतन कुमारी, विनीता पांडेय, सत्येंद्र, संतोष मिश्र, विभा यादव, डा अल्पणा, डा संगीता विजय, सुरेश पवार, हरिसिंह, डा प्रतिभा राणा, डाॅप्रतिभा राणा, निर्मला सिंह, चार्वी सिंह, वीरेंद्र मीणा, चंद्रशेखर यादव, हेमंत कुकरेती, आकृति चंद्रा, मनीषा शर्मा, मुक्ता शर्मा, डा संदीप आदि के पत्र पढे गए। 

लोहिया कालेज में दो दिवसीय हिंदी सेमीनार ‘स्त्री विमर्श: कल, आज और कल’ के अंतिम दिन रविवार को साहित्यकार मनीषा पांडेय और मृदुला गर्ग की तल्ख टिप्पणियों ने परम्परावादी सोच में पले-पढे युवाओं को झिंझोड़ते हुए सोचने पर मजबूर कर दिया। 

तीसरे सत्र की मुख्य अतिथि बहुचर्चित कथाकार मृदुला गर्ग ने कहा कि हमारी परम्परा मंे नारी के मातृत्व रूप की जो प्रतिष्ठा है, वह दरअसल उसके मां बनने में नहीं, अपितु किसी पुरुष को विधिवत पिता बनाने में है, नहीं तो विवाह पूर्व मातृत्व पर आपत्ति क्यों होती। उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श के बाद भी अभी तक समाज की मानसिकता नहीं बदली है। यदि बदली होती तो समाज में बलात्कार नहीं बढते। पुरुष के भीतर एक हीन भावना होती है और वह जानता है कि स्त्री उससे बेहतर काम करेगी, लेकिन वह उसे स्वीकार नहीं कर पाता। समाज की स्थिति ऐसी भयावह है कि निर्भया जैसे प्रकरण की चर्चा में भी लोग सेक्सुअल सुख की तलाश करते हैं।   

सेमीनार के तीसरे सत्र में बात शुरू करते हुए महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. रोहिणी अग्रवाल ने चूरू में इतने बड़े आयोजन की पहल को सराहते हुए कहा कि फेसबुक ने इस सेमीनार को उत्सुकता, प्रतीक्षा और ईष्र्या का प्रतीक बना दिया था। उन्होंने कहा कि गार्गी व याज्ञवलक्य शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श अब तक जबरन पराजित कर कैद में बांधी गई गार्गियों का संयुक्त प्रयास है। उन्होंने कहा कि विमर्श का अर्थ समग्र चिंतन है, जहां निष्कर्षों को थोपे बिना चिंतन को अनवरत बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि यदि प्राचीन समाज में दैहिक रूप में स्त्री की प्रतिष्ठा नहीं थी तो फिर देवदासी, गणिकाएं और वेश्याएं कहां से आई और दैहिक शुचिता की परिभाषा नगरवधू और कुलवधू के लिए अलग-अलग क्यों हैं। उन्होंने कहा कि जब तक दिन के ऊजाले और रात के अंधेरे में स्त्री अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करती है, तब तक नारी अस्मिता की मुक्ति नहीं मान सकते। जब तक यह सुरक्षित माहौल नहीं मिलेगा, तब तक विमर्श जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि नारी को अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करनी होगी और यह तय करना होगा कि पुरुष की तरह नारी भी मनुष्य ही है। उन्होंने कहा कि हम लड़कियों को घर से बाहर नहीं जाने देकर किससे बचाना चाहते हैं, क्या उन पुरुषों से जो हमारे घरों में भी बैठै हैं।

पुरुषों के प्रति अपनी कड़ी टिप्पणियों के लिए चर्चित युवा पत्रकार मनीषा पांडेय ने अपने चिरपरिचित बोल्डनेस भरे अंदाज में कहा कि लड़कियों को अपना वजूद साबित करने के लिए अपना घर, अपनी नौकरी, अपना पैसा और अपनी स्वतंत्रता की तरफ बढना होगा और उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करना होगा। उन्होंने लड़कियों से कहा कि घर से बाहर निकलो, पब्लिक पैलेस पर कब्जा करो, पैसा कमाओ और जिंदगी को जीयो। अपना फैसला खुद करो, अपना सेक्सुअल पार्टनर खुद चुनो और अमीर पति ढूंढ़ने का ख्वाब छोड़ दो।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली में हिंदी के प्रोफेसर महेंद्र पाल शर्मा ने भारतीय समाज की दुविधा का जिक्र करते हुए कहा कि मेरी बेटी कहती है कि मुझे खुली जीप चाहिए तो मेरे भीतर का पिता कहता है कि गलत है लेकिन फिर सोचता हूं, ख्वाहिश पूरी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नारी समानता की शुरुआत घर से होनी चाहिए और घरेलू श्रम का समान विभाजन होना चाहिए। आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना स्त्री की स्वतंत्रता संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे देश में स्त्री की जो स्थिति है, वैसी ही स्थिति विदेशों में भी है पर वहां समस्याएं अलग हैं। उन्होंने सेमीनार में श्रोताओं की उपस्थिति पर प्रसन्नता जाहिर की।  

इस मौके पर दिग्गज साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा, अजय नावरिया, अल्पना मिश्र, डा गंगासहाय मीणा, प्रो. रामबक्ष, कालेज प्राचार्य डा एम डी गोरा, युवा साहित्यकार दुलाराम सहारण, हिंदी की विभागाध्यक्ष डा मंजु शर्मा, उम्मेद गोठवाल, डा गीता सामौर, संतोष बलाई, जगजीत कविया, डा रविंद्र बुडानिया, एल एन आर्य, डा रणजीत बुडानिया, संजय कस्वां, कुमार अजय, हेमंत मंगल, डा कृष्णा जाखड़,  कमल कोठारी, अंग्रेजी के युवा साहित्यकार देवेंद्र जोशी सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी, साहित्यकार एवं नागरिक मौजूद थे।   

अडिग के रेखाचित्रों ने किया आकर्षित

सेमीनार के दौरान प्रख्यात चित्रकार रामकिशन अडिग की ओर से सेमीनार हाल में लगाए गए चित्रों ने संभागियों व अतिथियों का भरपूर ध्यान आकर्षित किया। अडिग के इन चित्रों में नारी के संघर्ष, मुक्ति की चाह और उसकी उड़ान को प्रभावी ढंग से उकेरा गया है। अडिग के चित्रों में छुपे नारी के दुख, पीड़ा, आक्रोश और चाह के अभिव्यक्त भावों से दर्शक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।

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