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गुरुवार, अक्तूबर 31, 2013

''बदलते वक़्त के साथ कदम मिलाने की कोशिश करते हैं ''-गुलज़ार

एक संगत गुलज़ार के साथ
हिन्दू कालेज में गुलज़ार का उद्बोधन

दिल्ली।  

किस्सागोई की परंपरा को तकनीक के सहारे सिनेमा ने नया विस्तार दिया है और गीत संगीत भारतीय सिनेमा की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है बशर्ते उसका इस्तेमाल कथानक को गति देने के लिए हो। प्रख्यात सिनेमाकार और साहित्यकार गुलज़ार ने हिन्दू कालेज की हिंदी साहित्य सभा द्वारा आयोजित 'हिंदी सिनेमा के सौ बरस'  विषयक संगोष्ठी में उक्त विचार व्यक्त किये। श्रोताओं की इस शिकायत पर कि इस दौर की गीतों और धुनों में पहले वाली मिठास नहीं रही पट गुलज़ार ने कहा कि आपाधापी भरे इस दौर में जब जिन्दगी में सुकून कम हो रहा है तो इसका असर तो सिनेमा समेत तमाम कलाओं पर पड़ना लाजमी ही है। साथ ही श्रोताओं की पसंद भी बदल रही है। फिल्म ओमकारा के '' बीड़ी जलइले '' के लिए शिकायत करने वालों को उन्होंने याद दिलाया कि इसी फिल्म में  ''ओ साथी रे '' और '' नैना ठग लेंगे '' जैसे गाने भी थे जिसकी चर्चा कम होती है। बिल्लो , लंगड़ा त्यागी जैसे किरदार  'बीड़ी जलइले' सरीखे गीत ही गायेंगे ग़ज़ल नहीं। गीत लिखते वक़्त फिल्म की कहानी , गाने की सिचुवेंशन और किरदारों का ख्याल तो रखना ही पड़ता है।

' मोरा गोरा रंग लई ले '  जैसे क्लासिक गीत से अपने गीत लेखन की शुरुआत करने वाले गुलज़ार ने बताया कि वो बदलते वक़्त के साथ कदम मिलाने की कोशिश करते हैं ' गोली मार भेजे में ' या 'कजरारे' सरीखे गीत इसी का नतीजा हैं। लेकिन ऐसे गीतों की उम्र कम होती है इसके जवाब में  दूसरे पहलू की तरफ भी ध्यान दिलाते है। वो कहते हैं कि पहले आल इंडिया रेडियो पर केवल चार घंटे गीत के कार्यक्रम होते थे लोग अपने नाम के साथ फरमाइश भेजते थे लेकिन अब रेडियो पर ही पूरे चौबीस घंटे गीत बजते हैं,  इस ओवरडोज़ ने भी हमारी याददाश्त को कमजोर किया है और गीतों की उम्र घटी है। गुलज़ार ने भारत विभाजन जैसी महान त्रासदी पर कम फ़िल्में बनने पर क्षोभ व्यक्त करते हुए  ' तमस ' को इस विषय पर बनी संवेदनशील फिल्म बताया। 

गुलज़ार की  रचनात्मकता पर बात करते हुए हिंदी विभाग के आचार्य डॉ रामेश्वर राय ने लोक को उनकी गीतों का प्राण तत्त्व बताते हुए कहा कि दिल्ली और मुंबई में जिन्दगी का ज्यादातर वक़्त बिताने के बावजूद गीतों में, उनका ग्रामीण मन झांकता है। कार्यक्रम का संयोजन कर रही विभाग की अध्यापिका डॉ रचना सिंह ने कहा कि गुलज़ार की कलम का स्पर्श पाते शब्द संस्कारित हो जाते हैं इसलिए उनके भदेस समझे जाने वाले गीतों में भी एक गरिमा है। गुलज़ार का स्वागत करते हुए  कॉलेज के प्राचार्य प्रद्युम्न कुमार ने खुद को उनका फैन बताते हुए कहा कि यह कॉलेज का सौभाग्य है की आज गुलज़ार साहब हमारे बीच हैं। आयोजन में गुलज़ार ने विभाग की हस्तलिखित पत्रिका 'हस्ताक्षर' के नए अंक का लोकार्पण किया और प्रतिभागियों के अनेक सवालों के जवाब भी दिए।   हिंदी विभाग की वरिष्ठ आचार्य डॉ विजया सती  ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए इस उल्लेखनीय गीतकार ,फ़िल्मकार के प्रति आभार जताया।   

रविरंजन 
सहायक आचार्य ,हिंदी विभाग 
हिन्दू कालेज ,दिल्ली 

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