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मंगलवार, सितंबर 24, 2013

कविता आज के वक्त पर टिप्पणी करती है

हिन्दी सप्ताह के समापन पर संगोष्ठी व कविता पाठ

‘रुकली लड़ेगी .....जरूर लड़ेगी/उनके लिए/जिनकी दाँव पर लगी हैं जिन्दगियाँ/उनके वजूद के लिए /जो अजन्में हैं अभी/अन्तिम साँस तक लड़ेगी’ ये काव्य पंक्तियां हैं विमला किशोर की जिसके द्वारा उन्होंने बलात्कार की शिकार स्त्री की पीड़ा तथा इस अन्याय के विरुद्ध उसके संघर्ष को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया है।

विमला किशोर अपनी कविताओं का पाठ हिन्दी सप्ताह के समापन के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी व कविता पाठ कार्यक्रम में कर रही थीं। कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक जनसंदेश टाइम्स क्लब द्वारा बाबूराम दीक्षित पार्क, एफ ब्लॉक, राजाजीपुरम, लखनऊ में किया गया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ उपन्यासकार व कवि प्रो नेत्रपाल सिंह ने की। ज्ञात हो कि राजाजीपुरम के नागरिकों की पहल पर पिछले दिनों जनसंदेश टाइम्स क्लब का गठन किया गया था। 

इस मौके पर विमला किशोर ने ‘रिक्शावाला’ कविता भी सनाई जिसमें रिक्शेवाले के जीवन के दर्द का बयान है। युवा कवयित्री गायत्री सिंह ने ‘बदलाव’ व ‘जिन्दगी सिसकती रही’ कविता का पाठ किया। गायत्री सिंह के लिए बदलाव क्रान्ति हैं। अपनी कविता में वे कहती हैं:‘बदलाव जरूरी है......बदलाव मांगता है क्रान्ति/ क्रान्ति के लिए जरूरी है/ एक चिन्गारी...’।

जन संस्कृति मंच के संयोजक व जाने माने कवि कौशल किशोर ने ‘फटा जूता’ कविता का पाठ किया। आज आम आदमी की जिन्दगी बिल्कुल उस फटे जूते की तरह हो गई है जिसे न पहना जा सकता है न फेका जा सकता है। जहां कविता में आम आदमी के अन्दर का आक्रोश सामने आता है कि ‘फेंकना ही है तो क्यों न फेंका जाय किसी जार्ज बुश पर’ वहीं कविता आम आदमी  की असमर्थता का भी बयान करती हैं। कविता आज के वक्त पर टिप्पणी करती है ‘यह ऐसा वक्त था/जब जूता ही नहीं फटा था/फट गई थी जेब/और मैं था मजबूर/सब बोल और कह सकते थे/मैं कुछ कर नहीं सकता था‘।’ इस मौके पर उमेश नगवंशी ने ‘विडम्बना’ कविता सुनाई जिसे श्रोताओं ने काफी पसन्द किया। कविता के द्वारा उमेश नगवंशी ने आज की समाजिक व राजनीतिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया है। बी एन गौड़, पूर्व सभासद अतुल दीक्षित, रामदत्त मिश्र, हृदयानन्द वर्मा आदि ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया।

कविता पाठ के पहले ‘हिन्दी की दशा व दिशा’ पर चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो नेत्रपाल सिंह ने कहा कि आज हिन्दी के प्रति पहले की तरह का विरोध का माहौल नहीं है। हिन्दी को गैरहिन्दी प्रान्तों में पहुंचाने में सिनेमा की बड़ी भूमिका है। क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति विशेष आग्रह ने  भाषाई संकीर्णता को पैदा किया है। इससे हिन्दी की कठिनाइयां बढ़ी हैं। 

वरिष्ठ कवि बी एन गौड़ का कहना था कि हिन्दी को जानने के लिए हिन्दी क्षेत्र को समझना होगा क्योंकि हिन्दी का विस्तार उन करोड़ों लोगों पर निर्भर करता है जो अशिक्षित हैं और इस कारण किताब या अखबार पढ़ नहीं सकते। सरकार पुरस्कारों पर धन खर्च कर रही है। इनसे व्यक्ति का विकास संभव है, हिन्दी का नहीं। पुरस्कारों पर धन खर्च करने की जगह सस्ती किताबें छापी जाय ताकि वह जनसुलभ हो। पूर्व सभासद अतुल दीक्षित का कहना था कि हिन्दी समर्थ भाषा है लेकिन उसे असमर्थ बना दिया गया है। यह हमारी संस्कृति व संस्कारों से जुड़ी है। आज संस्कार बदले जा रहे हैं। इससे संस्कृति भी बदल रही है। एसे में भाषा के प्रति अनुराग भी खत्म हो रहा है। 

इस मौके पर बोलते हुए जन संस्कृति मंच के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने कहा कि हिन्दी देश के गांवों व कस्बों की वजह से फल फूल रही है। इस बड़ी आबादी तक अपनी पहुंच बनाने के लिए बाजार द्वारा हिन्दी का उपयोग हो रहा है। जरूरत इस बात की है कि हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बनाया जाय और यह ज्ञान, विज्ञान व तकनीकी शिक्षा का माध्यम बने। हिन्दी के भविष्य व इसके विकास के लिए नई गुलामी की मानसिकता से लड़ना भी जरूरी है जिसके द्वारा अंग्रेजी को श्रेष्ठ व पढ़े लिखे की भाषा और हिन्दी को अनपढ़ों की भाषा समझा जाता है। रामदत्त मिश्र, विमला किशोर, उमेश नागवंशी आदि ने भी अपने विचार प्रकट किये।

इस अवसर पर लक्ष्मीनारायण एडवोकेट, श्रीराम निगम, पत्रकार विवेक उपाध्याय, जयराम वर्मा, आशुतोष, नीरज, मनमीत यादव, प्रीति गुप्ता, शान्ति तिवारी, आर आर मौर्य, सरोज आदि भी उपस्थित थे और कविताओं का आस्वादन किया। हिन्दी सप्ताह के अन्तर्गत जनसंदेश टाइम्स की ओर से ली गई इस पहल का राजाजीपुरम के लोगों ने काफी स्वागत किया और यह आशा जताई की कि आगे भी जनसंदेश टाइम्स की ओर से ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।

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