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रविवार, अगस्त 25, 2013

सोनी सोरी, लिंगा कोडोपी, दयामनी बरला, जीतन मरांडी, अर्पणा मरांडी और अब हेम मिश्रा

''पूरा एक दशक हो गया इन हाथों को ढपली पकडे देखते..एक हाथ की अपंगता का असर कभी ढपली में न दिखा..कालेज में फीस वृद्धि हो या लाईब्रेरी से अच्छे लेखकों की किताबें न मुहेय्या कराने लड़ाई..अपने इलाके के किसानों की जमीनें लीज पे दिए जाने के खिलाफ आन्दोलन हो या अल्मोड़ा में हुवे बड़े शराब आन्दोलन, अल्मोड़ा में गाँव के जंगलों को कब्ज़ा कर अभ्यारणों व एशगाहों में बदलने के खिलाफ आन्दोलन हो या भूमंडलीकरण की तमाम दैत्याकार नीतियों के खिलाफ मुम्बई प्रतिरोध जैसे आंदोलनों तक यह ढपली इस हाथ से न छूटी है...संस्कृतिकर्मी मोहन उप्रेती से लेकर बौद्धिक लोगों की उर्बरक नगरी अल्मोड़ा की धरती के इस लाल के लिए आज हर एक हाथ आगे है..क्यूंकि यह ढपली दुनिया के उन तमाम लोगों की जुबां है जिन्हें बोलने से हाशिये पे रखा गया है...उनकी मुक्ति का प्रतीक है यह ढपली और हेम भी''-सुनीता भास्कर


नयी दिल्ली : 25 अगस्त 2013 

जन संस्कृति मंच गढ़चिरौली में जेएनयू के छात्र और संस्कृतिकर्मी हेम मिश्रा को गिरफ्तार कर पुलिस रिमांड पर लेने की निंदा करता है। जसम साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और शोषण-उत्पीड़न-भेदभाव के खिलाफ लड़ने वाले तमाम वाम-लोकतांत्रिक संगठनों से अपील करता है कि सांप्रदायिक फासीवादी संगठनों, काले धन की सुरक्षा, यौनहिंसा व हत्या समेत तमाम किस्म के अपराधों में संलिप्त पाखंडी धर्मगुरुओं तथा उनकी गुंडागर्दी को शह देने वाले तंत्र के खिलाफ पूरे देश में व्यापक स्तर प्रतिवाद संगठित करें। 

हेम मिश्रा एक वामपंथी संस्कृतिकर्मी हैं। वे उन परिवर्तनकामी नौजवानों में से हैं, जो इस देश में जारी प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं। रोहित जोशी के साथ मिलकर उन्होंने उत्तराखंड के संदर्भ में सत्ताधारी विकास मॉडल के विनाशकारी प्रभावों पर सवाल खड़े करने वाली फिल्म ‘इंद्रधनुष उदास है’ बनाई है। उत्तराखंड के भीषण त्रासदी से पहले बनाई गई यह फिल्म हेम मिश्रा के विचारों और चिंताओं की बानगी है। सूचना यह है कि वे पिछले माह नक्सल बताकर फर्जी मुठभेड़ में पुलिस द्वारा मार दी गई महिलाओं से संबंधित मामले के तथ्यों की जांच के लिए गए थे और पुलिस ने उन्हें नक्सलियों का संदेशवाहक बताकर गिरफ्तार कर लिया है। सवाल यह है कि क्या दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र का दम भरने वाले इस देश में आतंकराज ही चलेगा? क्या उनके आपराधिक कृत्य की जांच करने का अधिकार इस देश का संविधान नहीं देता? 
 
यह पहली घटना नहीं है, जब कारपोरेट लूट, दमन-शोषण और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होने वाले बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों को नक्सलियों का संदेशवाहक बताकर गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार किया गया है? डॉ.विनायक सेन और कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे इसका उदाहरण हैं। खासकर आदिवासी इलाकों में कारपोरेट और उनकी पालतू सरकारें निर्बाध लूट जारी रखने के लिए मानवाधिकार हनन का रिकार्ड बना रही हैं। सोनी सोरी, लिंगा कोडोपी, दयामनी बरला, जीतन मरांडी, अर्पणा मरांडी जैसे लोग न्याय व्यवस्था की क्रुरताओं के जीते जागते गवाह हैं। दूसरी ओर गैरआदिवासी इलाकों में भी पुलिस नागरिकों की आजादी और अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन कर रही है और अंधराष्ट्रवादी-सामंती-सांप्रदायिक गिरोहों को खुलकर तांडव मचाने की छूट दे रखी है। 

मुंबई में महिला फोटोग्राफर के साथ हुए गैंगरेप ने साबित कर दिया है कि सरकारें और उनकी पुलिस स्त्रियों को सुरक्षित माहौल देने में विफल रही हैं, जहां अमीर और ताकतवर बलात्कारी जल्दी गिरफ्तार भी न किए जाएं और महिलाओं के जर्बदस्त आंदोलन के बाद भी पुलिस अभी भी बलात्कार और यौनहिंसा के मामलों में प्राथमिकी तक दर्ज करने में आनाकानी करती हो और अभी भी लोग बलत्कृत को उपदेश देने से बाज नहीं आ रहे हों, वहां तो बलात्कारियों का मनोबल बढ़ेगा ही। मुंबई समेत देश भर में इस तरह घटनाएं बदस्तुर जारी हैं। 
जन संस्कृति मंच का मानना है कि हेम मिश्रा को तत्काल बिना शर्त छोड़ा जाना चाहिए और दोषी के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। जसम की यह भी मांग है कि महिलाएं जिन संस्थानों के लिए खतरा झेलकर काम करती हैं, उन संस्थानों को उनकी काम करने की स्वतंत्रता और सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए.

 सुधीर सुमन 
जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

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