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शनिवार, अगस्त 31, 2013

'गाड़ी लोहारदगा मेल' :पहला 'उदयपुर फिल्म फेस्टिवल'(14-15- सितम्बर,2013 )


'गाड़ी लोहारदगा मेल' : फिल्मोत्सव में दिखाई जाने वाली एक फिल्म के बारे में 'द ग्रुप' के संयोजक संजय जोशी का एक लेख 


गाड़ी लोहरदगा मेल दिखाने के मायने



2006 से जबसे हम लोगों ने छोटे शहरों और कस्बों में प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू किया है तबसे हर पखवाड़े नई -नई जगहों से सिनेमा दिखाने और फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने के अनुरोध मिलते रहते हैं। ऐसा ही एक अनुरोध जब उत्तर प्रदेश के शहर देवरिया के छोटे कस्बे सलेमपुर से आया तो हम सहर्ष ही वहां अपनी स्क्रीन लगाने के लिए तैयार हो गए।



सलेमपुर में हम इसलिए भी ख़ुशी - ख़ुशी सिनेमा दिखाने चाहते थे क्योंकि ऐसा करते हुए हमारा अभियान क्रमश बड़े शहरों से होता हुआ छोटे कस्बे तक पहुँचने वाला था। सलेमपुर, देवरिया से 25 किमी दूर बिहार राज्य से सटा ऐसा क़स्बा है जहां दक्षिण भारत से आये उद्यमी वाई शंकर मूर्ती के कारण पचास साल पहले ही योगी और मेनका नाम के दो सिनेमा हाल बन चुके थे। वाई शंकर मूर्ती ने इस कस्बे को रंगमंच के संस्कार भी दिए और अपने समूह की तरफ से ' मेघदूत की पूर्वांचल की सांस्कृतिक यात्रा ' नाम का एक संगीतमय प्रोडक्शन किया। यह नाटक अपने जमाने में न सिर्फ सलेमपुर में खेल गया बल्कि दूसरे बड़े शहरों में भी इसने सलेमपुर की सांस्कृतिक पहचान बनाने में मदद की।


लेकिन ये सब बीते जमाने की बातें हैं। आज की तारीख में सलेमपुर के दो सिनेमा हालों में से एक शापिंग मॉल में बदलने को तैयार है और दूसरा किसी तरह अपने दिन गिन रहा है। अलबत्ता कस्बे के लोगों के बीच हीरो बनने और फिल्मों के निर्माण पर पैसा फूंकने का शौक खूब बढ़ा है। ऐसे सलेमपुर में जिसकी कुल आबादी 17000 है हमने पिछली 22 जून को प्रतिरोध का सिनेमा का 31 वां और सलेमपुर का पहला फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया।नए सिनेमा हाल बन नहीं रहे इसलिए हमें अपना पर्दा कस्बे से बाहर देवरिया जाने वाली सड़क पर बापू इंटर कालेज के अधबने हॉल में टांगना पड़ा। अधबने हॉल में अभी पंखे नहीं टंग सके थे इसलिए टेंट हाउस से लाए गए खूब शोर करने वाले पंखों से ही काम चलाया गया।

हमारे लिए ये चुनौती थी कि सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत किस फिल्म से की जाय ? कोई राजनीतिक दस्तावेजी फिल्म, फीचर फिल्म, म्यूज़िक वीडियो या कोई लघु फिल्म ? तब हमने चुनाव किया बीजू टोप्पो निर्देशित दस्तावेजी फिल्म ' गाड़ी लोहरदगा मेल' का। 2003 में जब झारखंड में लोहरदगा और रांची के बीच बिछी मीटर गेज की रेल पटरी को ब्राड गेज में बदला जा रहा था तब उस पटरी पर चलने वाली लोहरदगा मेल को भी बंद होना था। 4 डब्बों की यह छोटी ट्रेन कोई मामूली ट्रेन न थी बल्कि इसके जरिये ही लोहरदगा के लोग पहले रांची और फिर देश के दूसरे हिस्सों में गए। झारखण्ड के आदिवासियों के विस्थापन में भी इस ट्रेन की ख़ास भूमिका रही है जिसका इस्तेमाल फिल्मकार ने विस्थापन संबंधी अपनी दूसरी फिल्म ' कोड़ा राजी ' में किया है। ऐसी ट्रेन को स्मृति में बचाए रखने के लिए रांची के सांस्कृतिक समूह अखड़ा से जुड़े शिक्षाविद डा. रामदयाल मुंडा , लोकगायक और गीतकार मधु मंसूरी हंसमुख और मुकुंद नायक और फिल्मकार मेघनाथ और बीजू टोप्पो ने एक पिकनिक के बहाने इस ट्रेन को कैमरे में उतारा। 27 की इस फिल्म में कुल 6 गाने हैं जो झारखण्ड राज्य के अस्तित्व के संघर्ष , झारखण्ड की माटी, विस्थापन की टीस और आम जीवन से सम्बद्ध हैं। इन गानों के सटीकपन की वजह से ही 27 मिनट की रांची से लोहरदगा की यह यात्रा जातीय स्मृति का अद्भुत आख्यान बनकर सामने आती है। इन 6 गानों में से एक, जिसे खुद गायक मधु मंसूरी हंसमुख ने लिखा है, का हिंदी अनुवाद नमूने के तौर पर प्रस्तुत है :


ओ चाँदो
तुम कोड़ा परदेस मत जाना
हमारा प्यार तोड़के मत जाना चाँदो
हमें बहुत दिनों तक अलग-अलग जीना पड़ेगा
चाँदो तुम मातृभूमि छोड़कर मत जाना
तुम कोड़ा परदेस मत जाना

तुम जहाँ भी जाओगी चाँदो
इतना सुन्दर हीरा नागपुर नहीं पाओगी
जहाँ हम बचपन में ईंट, पत्थर और धूल में खेलते थे
तेरे बिना कुआँ, तालाब, चुवाँ
सबकुछ सूना-सूना लगेगा
इसलिए चाँदो तुम कोड़ा परदेस कभी भी मत जाना
हमें कितने दिनों तक अलग-अलग जीना पड़ेगा
चाँदो तुम मातृभूमि छोड़कर मत जाना
तुम कोड़ा परदेस मत जाना
तुम जहाँ भी जाओगी चाँदो
इतना सुन्दर झरना नहीं पाओगी
जहाँ हम झरने के श्रोत के पास मधुर प्रेम की बाते करते हैं।
वो सारा जगह सूनापन हो जाएगा
तेरे बिना कुआँ तालाब, चुवाँ
सब कुछ सूना-सूना लगेगा
चाँदो तुम कोड़ा परदेस कभी मत जाना
हमें कितने दिनों तक अलग-अलग जीना पड़ेगा
चाँदो तुम जन्मभूमि छोड़कर मत जाना
तुम कोड़ा परदेस मत जाना
तुम जहाँ भी जाओगी चाँदो
खद्दी नवाँ चाँद (सरहुल का नया चाँद)
नही पाओगी
उस दिन बिरह साथा तुम्हारे खून में दौड़ पडे़गी
और प्रेम बिछूल में रोना पड़ेगा
तेरे बिना कुआँ, तालाब चुवाँ
सब कुछ सूना-सूना लगेगा
चाँदो तुम कोड़ा परदेस कभी मत जाना

तुम जहाँ भी जाओगी चाँदो
परदेसी बन जाओगी
यहाँ का अखड़ा में कौन नाचेगा चाँदो
सरहुल के दिन सखुआ फूल कौन
खोंसेगा चाँदो
तुमको छोड़ और मैं किससे प्यार करूँगा चाँदो
चाँदो तुम कोड़ा परदेस कभी मत जाना
हमें कितने दिनों तक अलग-अलग जीना पड़ेगा
चाँदो तुम जन्मभूमि छोड़कर मत जाना
तुम कोड़ा परदेस कभी मत जाना
कभी मत जाना

हमारे किंचित अविश्वास के बावजूद इस फिल्म को दर्शकों ने खूब सराहा क्योंकि उनके यहाँ भी लोहरदगा मेल की तरह बरहजिया ट्रेन है जो बरहज से सलेमपुर की 20 किमी की यात्रा करती है। जिसके होने की वजह से बरहज के हजारों छात्र- छात्राएं विद्यार्थी बने हुए हैं और छोटे -मोटे किरानी अपने परिवारों का पेट पाल पा रहे हैं। कई बार रेल प्रशासन ने इस ट्रेन को अलाभकारी होने के कारण बंद करने के बारे में सोचा लेकिन जनदबाव के चलते वे ऐसा न कर सके। एक बार खुद बरहज के स्टेशन मास्टर ने ट्रेन में जाकर लोगों से टिकट खरीदने की अपील की ताकि वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर मार्च के महीने में न्यूनतम आय भी न होने की स्थिति में रेल प्रशासन को ट्रेन बंद करने का बहाना न मिल जाये। गाड़ी लोहरदगा तो ब्राड गेज के चलते स्मृति में समा गयी है लेकिन बरहजिया ट्रेन अभी भी बरहज और सलेमपुर के लोगों की जीवनरेखा बनी हुई है।

फेस्टिवल में दूसरी फिल्में भी सराही गयीं लेकिन लोहरदगा और बरहज के अद्भुत साम्य के कारण बीजू टोप्पो की फिल्म के निर्माण का महत्व स्थापित हुआ और साथ ही ऐसी जगहों में फिल्में दिखाने। शायद कोई नया बीजू बरहजिया ट्रेन पर फिल्म बनाए और फिर नए सन्दर्भों का सिलसिला किसी नई जगह में फिर से सच हो।

सौजन्य:Hindi news weekly Shukrawaar, July 25, 2013

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