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गुरुवार, जुलाई 25, 2013

बाज़ार और गाँधी को एक साथ चलाना कठिन है।-नन्द चतुर्वेदी

उदयपुर,25 जुलाई।
मैकाले ने जिस तरह से बौधिक साम्राज्यवाद फ़ैलाने की चेष्ठा अपनी शिक्षा व्यवस्था को कायम करके की है वह चमत्कारिक है।भाषा वर्चस्व को बढ़ाने का प्रभावकारी माध्यम है ,अंग्रेजी भाषा व अंग्रेजी विचार को मैकॉले ने इतना बढ़ा दिया की वर्त्तमान में अंग्रेजी पर देश की निर्भरता बनी हुई है उक्त विचार "मैकाले  और भारतीय शिक्षा" विषयक परिचर्चा में प्रमुख शिक्षाविद प्रो. नन्द चतुर्वेदी ने व्यक्त किये। विद्या भवन शिक्षा केंद्र व मूल प्रश्न द्वारा आयोजित परिचर्चा में चतुर्वेदी ने आगे कहा कि वर्त्तमान संदर्भो में बाज़ार और गाँधी को एक साथ चलाना कठिन है।

सुखाडिया विश्वविद्यालय की सह आचार्य डॉ सुधा चौधरी ने मैकाले के सन्दर्भ में यह स्वीकार किया कि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से जीवन की गुणवत्ता बनाने वाले मूल्यों की स्थापना नहीं हो सकती है तथा पुराने भारत की शिक्षा व्यवस्था भी समता मूलक नहीं है।प्रसिद्ध समाजशास्त्री  प्रो. नरेश भार्गव ने कहा कि वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था जिसकी स्थापना का श्रेय मैकाले को जाता है वह मूलतः शिक्षा को एक उद्योग में तब्दील कर देगी जो वर्त्तमान में फलफूल रहा है।जरुरत इस बात की है कि वर्त्तमान व्यवस्था को मानवीय बनाया जाये।

मूलप्रश्न के संपादक डॉ वेददान  ने कहा कि मैकाले  की शिक्षा के माध्यम से महिला व दलितों की भागीदारी और जागरूकता बढ़ी है।यह प्रणाली ब्राह्मणवादी वर्चस्व को कम कर सकती है। विद्या भवन के शिक्षा सलाहकार डॉ ह्रदयकान्त दीवान ने मैकॉले की शिक्षा व्यवस्था को तत्कालीन संदर्भो में देखते हुए इसे साम्राज्यवादी विस्तार से जोड़ा और कहा कि शिक्षा का मैकॉले विमर्श को व्यापक और इतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना आवश्यक है। शिक्षा की गुणवत्ता  व्यापक मूल्यों से तय होनी चाहिए जिनमें स्वतंत्रता व समानता प्रमुख है।

परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए विद्या भवन के अध्यक्ष रियाज़ तहसीन ने  मैकाले की शिक्षानीति का ज़िक्र करते हुए कहा कि वर्त्तमान संदर्भो में शिक्षा व्यवस्था का  मूल्यांकन होना चाहिए।आयोजन में हेमराज भाटी ,डॉ अरविन्द आशिया ,डॉ मनोज राजगुरु ने भाग लिया।परिचर्चा का संयोजन प्रो. अरुण चतुर्वेदी ने किया।

 सूचना स्त्रोत :नन्द किशोर शर्मा 

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