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मंगलवार, मई 07, 2013

मार्क्स का दर्शन पूंजीवादी दुनिया को बदलने का विज्ञान है।


कार्ल मार्क्स जयन्ती 
लखनऊ, 6 मई।

कार्ल मार्क्स के जन्म दिवस के अवसर पर हजरतगंज, लखनऊ के जी पी    ओ पार्क में जन संस्कृति मंच की ओर से ‘इक्कीसवीं सदी में मार्क्सवाद’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी शुरुआत करते हुए जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने कहा कि मार्क्स ने इस  सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि वानर से नर में बनने में तथा समाज के विकास में श्रम की नियामक भूमिका है। आज जिस पूंजी के साम्राज्य को सारी दुनिया पर आरोपित किया गया है तथा जिसे विकास की एकमात्र अनिवार्यता के रूप में स्थापित किया जा रहा है, वह पूंजी श्रम की देन है। पूंजी की यह व्यवस्था शोषण, दमन व गैरबराबरी पर आधारित है। मार्क्स का दर्शन पूंजीवादी दुनिया को बदलने का विज्ञान है।

सोवियत समाजवाद के पतन पर बोलते हुए कौशल किशोर ने कहा कि मार्क्सवादी विज्ञान के पेरस कम्यून से लेकर आज तक अनकानेक प्रयोग हुए हैं और किसी प्रयोग की असफलता को विज्ञान की असफलता मान लेना गलत होगा। आज उन असफलताओं का मूल्यांकन करते हुए उनसे सीखकर दुनिया में मार्क्सवाद के नये नये प्रयोग हो रहे हैं। यही वजह है कि तमाम हमले के बावजूद मार्क्सवाद की प्रासंगिकता बनी हुई है और दुनिया में पूंजीवाद के विरुद्ध जहां भी संघर्ष चल रहा है, उन्हें मार्क्सवाद प्रेरित करता है।

कवि भगवान स्वरूप कटियार ने कहा कि अमेरीका के नेतृत्व में संचालित नवसाम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था के विरुद्ध आज अमरीका के अन्दर भी इसके विरुद्ध असंतोष बढ़ा है। आक्यूपाई वाल स्ट्रीट जैसा संघर्ष इसी की देन है। लैटिन अमेरीका, यूरोप, एशिया सहित सारी दुनिया में चल रहे संघर्षों की विचारधाराओं में मार्क्सवाद सबसे प्रेरक है। मार्क्स की सारी वैचारिकी के केन्द्र में पूंजीवादी व्यवस्था की जगह श्रमिक वर्ग की सत्ता है। वर्कर्स कौंसिल के महामंत्री ओ पी सिन्हा ने कहा कि रूस, चीन व अन्य देशों की समाजवादी व्यवस्था ने जिस तरह मानव सभ्यता तथा जिन मानवीय मूल्यों का विकास किया, उसकी वजह से पूंजीवादी देशों व उनके शासकों को भी न्याय व समता जैसे मूल्यों के लिए बाध्य होना पड़ा। समाजवादी व्यवस्था के पतन का ही परिणाम है कि सम्राज्यवादी व्यवस्था आक्रामक हुई है। इसके द्वारा लोक कल्याण के  जो काम किये गये, वे खत्म हो चुके है। उसका क्रूर चेहरा हमारे सामने हैं। ऐसे में वामपंथी आंदोलनों के लिए उर्वर भूमि तैयार है।

प्रगतिशील लेखक संघ के नरेश कुमार ने कहा कि 1844 में अपनी कृति ‘भौतिकवाद अनुभवसिद्ध आलोचना’ के द्वारा मार्क्स ने अपने दर्शन को प्रतिपादित किया था। दर्शन के क्षेत्र में तीखी बहसें व विवाद रहे हैं। ग्राम्शी से लेकर कॉडवेल तक के उन विमर्शों पर फिर से विचार जरूरी है। इन विमर्शों की रोशनी में ही आज की सदी में दर्शन के क्षेत्र में मार्क्सवाद का क्या योगदान हो सकता है, को समझा जा सकता है। कवि बी एन गौड़ ने कहा कि पूंजीवाद आर्थिक व्यवस्था ही नहीं है, वह विचार सत्ता भी है। आज वह अपनी बाजारवादी व्यवस्था के अनुरूप शब्दों के अर्थ निर्धारित करता है। शब्दों व विचारों पर बाजारवादी शक्तियों का हमला तेज है। मार्क्सवादियों के लिए जरूरी है कि उन शब्दों को बचाया जाय जिन्हें श्रमिक जनता ने संघर्षों के द्वारा अर्जित किया है।

इस मौके पर लता राय, आर के सिन्हा आदि ने भी अपने विचार रखे। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रगतिशील महिला एसोसिएशन - एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि स्त्री की मुक्ति का प्रश्न श्रमिक वर्ग की शोषण से मुक्ति से जुड़ा है। मार्क्स ने जिस समाजवाद को प्रतिपादित किया, वास्तव में स्त्री के लिए बेखौफ आजादी समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। हमारे लिए जरूरी है कि जन संघर्षों को तेज किया जाय। वामपंथियों के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं फिर भी मुद्दों पर आधारित एकता बनाई जा सकती है, साझा कार्यवाही की जा सकती है। मार्क्स के जन्मदिन के अवसर पर वामपंथियों को ऐसा संकल्प लेना चाहिए।

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
मो - 09807519227

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