हमारी सोच का स्पेश सिमटता जा रहा है: नूर जहीर - Apni Maati: News Portal

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सोमवार, मार्च 25, 2013

हमारी सोच का स्पेश सिमटता जा रहा है: नूर जहीर

साम्राज्यवाद ने अपनी स्वार्थों को पूरा करने की 
जिम्मेदारी नवसाम्राज्यवाद को सौंप दिया है। 
बगैर वामपंथ का साथ लिए हम नवसाम्राज्यवाद से नहीं
 लड़ सकते। नवसाम्राज्यवाद भूमंडलीयकरण का नारा देता है लेकिन इस नारे से देश में 
क्षेत्रवाद और जातिवाद बढ़ा है इस कारण भारत की राजनीति 
पूंजीपति के हाथ में चली गई है। २३ एवं २४ को मार्च 
बेगूसराय के गोदरगांवा स्थित विप्लवी पुस्तकालय 
के वार्षिकोत्सव में ‘नवसाम्राज्यवाद के विरूद्ध 
वैश्विक जन प्रतिरोध की दिशा और भारत’ 
विषयक संगोष्ठी में आलोचक वेदप्रकाश ने कही।

 
इसके पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए भाकपा के पूर्व महासचिव एवी वर्द्धन ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति शावेज़ के निधन पर श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि शावेज़ कोई कम्युनिस्ट पार्टी से नहीं थे, वे जनता के थे। वे 58 वर्ष की आयु में चले गये साम्राज्यवादी बाट जोह रहे हैं कि वेनेजुएला कब साम्राज्यवादियों का अड्डा बन जाये। शावेज अमर हो गये हैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। एक मिनट मौन के पश्चात उक्त विषय पर प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक व पूर्व सांसद डा. रामजी सिंह ने  कहा कि विचारों को उन्मुक्त होना चाहिए। आज कांग्रेस ने समाजवाद के साथ-साथ लोकतंत्र का भी श्राद्ध कर दिया है। गांधी ने कहा था हम पृथ्वी के पति नहीं पुत्र हैं। आज हमारे सामने बाहर से नहीं बल्कि अपने लोगों से खतरा है... साम्यवाद या गांधीवाद अगर अंतिम व्यक्ति के लिए नहीं सोचता तो वह बेकार है..। भारत ही नहीं चीन भी नवसाम्राज्यवाद के कब्जे में है..। संधर्ष के अलावे दूसरा कोई रास्ता नहीं होता। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता पत्रकार व साहित्यकार ललित सुरजन ने की। श्री सुरजन कहा कि विश्व के तमाम संसाधनों पर कब्जा जमाने की साम्राज्यवादी होड़ चल रही है। उन्होंने कहा कि साम्राज्यवाद में प्रत्यक्ष रूप से लूट होती थी और पूंजीवाद में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूप से लूट जारी है। दिल्ली से पधारे प्रो. अजय तिवारी ने कहा कि गांव में जहां ज्ञान के साधन नहीं पहुंचते हैं वहां अधिक जिज्ञासा होती है, यह जिज्ञासा पीड़ा से भी जुड़ी होती है.. एक ओर अंबानी 54 हजार करोड़ में मकान बनाये हैं वही हमारी बड़ी आबादी 18 रू. रोज पर जीवन यापन करते हैं.. साम्प्रदायिकता अंग्रेजों की देन है, पहला साम्प्रदायिक दंगा 1861 में हुआ था.. तानाशाही व धर्मान्घता अमरीकी नीति का हिस्सा है.. कोई भी लोकतांत्रिक राजनीति समाज के दबे कुचले की उपेक्षा नहीं कर सकता है, गांधी और माक्र्स दोनों दुनिया को बदलना चाहते थे।

लेखिका नूर जहीर ने कहा कि हमारे सोचने के लिए स्पेश सिमटता जा रहा है..टेªड यूनियन में मजदूर नहीं पहुँच सके ऐसी व्यवस्था की जा रही है। सभ्य समाज में औरतों पर जुल्म हो रहा है, मजहब के नाम पर औरतों को नही बांटा जा सकता क्योंकि सभी की पीड़ा एक सी है...।संगोष्ठी के दूसरे दिन 24 मार्च को ‘वर्तमान संकट तथा प्रगतिशील आंदोलन की चुनौतियां’ विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन ने कहा कि आज के दौर में एक षड्यंत्र के तहत किसी समस्या को खंड-खंड कर देखा जा रहा है। भारत का एक नागरिक - एक ओर जहां वोटर है, वह कहीं उपभोक्ता भी है! भाषा के सवाल पर उन्होंने कहा कि जिस दिन हिन्दी समाप्त हो जायेगी प्रेमचंद भी खत्म हो जायेंगे। उन्होंने ‘जयपुर लिट्ररी फेस्टिवल’ पर भी कई सवाल उठाये..। एबी वर्द्धन ने कहा कि फासिज्म की कल्पपना है कि किताबों को जला दें... डेमोक्रेसी के नाम पर उन देशों की ऐतिहासिक संस्कृति पर बर्बर हमला किया जा रहा है। 

38 मुल्कों के भाड़े के सिपाही सीरिया में लड़ रहे हैं.. साम्राज्यवाद  क्या है उसकी समझ हमें आनी चाहिए तभी हम नवसाम्राज्यवाद को समझ पायेंगे। माक्र्स ने कहा था - यह जो सर्वहारा वर्ग है वही समाज को बदलेंगे। किसी ने  हिंसा को स्थान नहीं दिया..। शीतयुद्ध के दिनों अमरीका का हाथ रोकने के लिए सोवियत संघ था.. हिटलरी फासिज्म से दुनिया को अपनी कुर्बानी देकर सोवियत संघ ने बचाया था। सोवियत युनियन खत्म होने से अमरीका बादशाह बन गया उसको रोकने वाला नहीं रहा, जनता ने कहा हम हताश हैं लेकिन अमरीका से 90 किलोमीटर दूर क्यूबा चुनौती देने के लिए खड़ा है। वियतनाम ने हो ची मिन्ह के नेतृत्व में जापान, फ्रेंच और अमरीकी साम्राज्यवाद को मुकाबला किया...।

संगोष्ठी में अजय तिवारी, नूर जहीर, वेद प्रकाश, राकेश, रामवचन राय, विजेन्द्र ना. सिंह आदि ने अपने विचार रखे।  इस समारोह के संयोजक राजेन्द्र राजन ने सूचित किया कि डा. विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पत्नी की अस्वस्थता की वजह से आयोजन में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने डा. त्रिपाठी के शुभकामना संदेश को पढ़ कर सुनाया।बेगूसराय स्थित गोदरगावां के वैदेही सभागार में दो दिनों तक चले इस समारोह के प्रथम दिन का संचालन श्री कुन्दन एवं दूसरे दिन का श्री राजेन्द्र राजन एवं प्रों. रामअकबाल सिंह ने किया। 

धन्यवाद ज्ञापन अमरनाथ सिंह एवं रमेश प्रसाद सिंह ने किया। समारोह में विप्लव पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘हाँक’ अंक 4 का लोकार्पण उपस्थित साहित्यकारों ने किया। 

समारोह के मुख्य आकर्षण का केन्द्र बना ’कबीर’ की मुर्ति.. जिसका अनावरण कामरेड एबी वर्द्धन ने किया प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक डा. रामजी सिंह एवं कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव एबी वर्द्धन को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। समारोह का एक मुख्य आकर्षण बीहट इप्टा के दिलीप जी का गायन एवं लखनऊ इप्टा द्वारा ब्रेख्त के नाटक ‘नियम और अपवाद’ का वेदाराकेश द्वारा मंचन व रंगकर्मी राकेश का संचालन था।प्रो. शचीन्द्र, अरविन्द श्रीवास्तव, मनोरंजन विप्लवी, कृष्ण कुमार आदि ने उपस्थित रहकर इस महत्वपूर्ण आयोजन की सफलता को सुनिश्चित किया। 

अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा)
मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता बिहार प्रलेस
मोबाइल - 9431080862. 

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