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शनिवार, सितंबर 29, 2012

लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए संघर्ष का संकल्प Waya दरभंगा


  • लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए संघर्ष का संकल्प
  • बिहार में सांस्कृतिक आंदोलन की नई संभावनाओं के साथ संपन्न हुआ जसम, बिहार का सम्मेलन
  • जसम का तीसरा बिहार राज्य सम्मेलन दरभंगा में हुआ संपन्न
  • जनवादी आलोचक रामनिहाल गुंजन जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष बनाए गए


दरभंगा 
जन संस्कृति मंच, बिहार का तीसरा राज्य सम्मेलन 28 सितंबर को दरभंगा में संपन्न हुआ। सामंती-सांप्रदायिक वर्चस्व के खिलाफ लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए आयोजित इस सम्मेलन में समकालीन चुनौती के संपादक प्रो. सुरेंद्र प्रसाद सुमन को जसम, बिहार का नया राज्य सचिव और वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गंुजन को राज्य अध्यक्ष बनाया गया। इस मौके पर जन संस्कृति मंच के दरभंगा जिले का स्थापना सम्मेलन भी संपन्न हुआ। 

जसम राज्य सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए समकालीन जनमत के प्रधान संपादक और जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय ने कहा कि यह समय घमंड में चूर मुट्ठी भर लुटेरों की सत्ता के जनता से लगातार दूर होते जाने और उनके खिलाफ जनता के संघर्ष के तीखे होने का समय है। सत्ताएं जनता को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर रही हैं और फासीवादी, नस्लवादी और सांप्रदायिक माहौल बना रही हैं। 

रामजी राय ने कहा कि जनता का मतलब गरीब-मेहनतकश जनता है, जो अपने खून-पसीने से राष्ट्र का निर्माण करती है। जो चोरी और शोषण करके बड़ा बनते हैं, वे वास्तव में बड़े नहीं होते, बल्कि बड़े वे होते हैं जो ईमानदारी और मेहनत का जीवन जीते हैं। यह तर्क कि पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होती, समाज के खाउ लोगों के तर्क हैं, उनके तर्क जो मेहनत नहीं करते। समाज में बराबरी लोकतंत्र का एक जरूरी मानदंड है। रिपोर्ट बताती है कि 70 प्रतिशत से अधिक लोग 20 रुपये दैनिक आमदनी पर जीवन गुजारने को विवश हैं। आज गरीबी रेखा का जो मानदंड तय कर रहे हैं, उतने आय में सांस तक नहीं ले सकते। रामजी राय ने कहा कि समाज में गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों पर होने वाली अत्याचार और असुरक्षा की घटनाएं जिस तरह बढ़ी हैं, उससे जाहिर है मौजूदा व्यवस्था लोकतंत्र को कमजोर बना रही है। 

उन्होंने उपभोक्तावादी-विज्ञापनी संस्कृति के जरिए बर्बरता, ईर्ष्या, अपमान, लालच और लोलुपता की प्र्रवृत्तियों को बढ़ावा दिए जाने का विरोध करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सत्ता के संरक्षण में पतनशील सामंती-पूंजीवादी संस्कृति को जिस तरह बढ़ावा दिया जा रहा है, उसका संगठित सांस्कृतिक प्रतिरोध जरूरी है। 

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए वयोवृद्ध प्रो. नित्यानंद झा ने कहा कि आज के जो संकट हैं, उसका समाधान मेहनतकश वर्ग ही कर सकता है। असुविधा और कष्ट का सामना करते हुए जन संस्कृतिकर्मियों को न्याय और सत्य के लिए लड़ना होगा। कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने कहा कि सत्ता सुनियोजित तरीके से अपसंस्कृति का प्रचार कर रही है, उसके खिलाफ जनता के प्रतिरोध की संस्कृति को ताकतवर बनाना होगा। प्रो. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने कहा कि आज की दुनिया में जो शोषण-उत्पीड़न-दमन है, उसके खिलाफ जन संस्कृति मंच संघर्ष का एक मोर्चा है। आलोचक रामनिहाल गुंजन ने कहा कि जसम को जनविरोधी सरकार और जनविरोधी परिस्थितियों को खिलाफ जनता की संघर्षशील चेतना को उन्नत बनाने का कार्य करना होगा। अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के महासचिव और भाकपा-माले के मिथिलांचल प्रभारी धीरेंद्र झा ने कहा कि बाजारवाद का सबसे ज्यादा हमला गरीबों, महिलाओं और दलितों पर हो रहा है। खाओ पीओ, मौज करो की संस्कृति और विचारधारा को परोसने की कोशिश की जा रही है। जबकि इसके विपरीत श्रम, संघर्ष और सरोकार की बुनियाद पर ही जनसंस्कृति का विकास हो सकता है। मजदूर-किसान आंदोलन को ताकतवर बनाने के लिए भी जसम को मजबूत बनाना जरूरी है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की, कि दरभंगा क्रांतिकारी सांस्कृतिक आंदोलन का केंद्र बनेगा। उद्घाटन सत्र का संचालन संतोष झा ने किया। 

सांगठनिक सत्र में संतोष सहर ने कहा कि बिहार में किसान आंदोलन के उभार के दौर में जो टीमें बनी थीं, उसमें पेशेवर कलाकार कम ही थे। विभिन्न वजहों और जरूरतों से उनमें कई टीमें खत्म हो गईं। नई टीमों के संगठित होने की संभावनाएं बनी हैं। हाल के वर्षों में उत्तर बिहार में जसम का सांगठनिक विस्तार हुआ है। चूंकि जसम  साहित्य, रंगकर्म, चित्रकला, गायन आदि तमाम विधाओं में कार्यरत संस्कृतिकर्मियों का संगठन है, इसलिए जरूरी यह है कि इन सारे क्षेत्रों में नई सृजनशीलता के विकास लायक माहौल बनाया जाए। लोकप्रचलित धुनों में प्रगतिशील कंटेट को कैसे लाया जा सकता है, कल्याण भारती ने इसके बारे में अपने विचार रखे। संस्कृतिकर्मियों का जनांदोलनों के साथ गहरा जुड़ाव किस तरह बने, सुनील चौधरी ने इस संदर्भ में अपने सुझाव दिए। जितेंद्र कुमार ने जसम से जुड़े लेखकों की वैचारिक भूमिकाओं का आकलन पेश किया। सचिन ने रंगमंच के सरकारीकरण के विरुद्ध जनसंस्कृति को और अधिक सुगठित करने की जरूरत पर जोर दिया। राजू रंजन (आरा), जयप्रकाश (समस्तीपुर), अशोक (मधुबनी), कुमार अवधेश (मधुबनी), डॉ. विंधेश्वरी (रोहतास), कृष्ण कुमार निर्मोही (भोजपुर), दीपक सिन्हा (बेगूसराय) आदि ने भी अपनी बातों को रखा। 

सांगठनिक सत्र के आखिर में 47 सदस्यीय नई बिहार राज्य कमेटी का चुनाव हुआ। राज्य कार्यकारिणी में 17 सदस्य हैं। संतोष झा, कल्याण भारती, जितेंद्र कुमार, डॉ. विंधेश्वरी और दीपक सिन्हा राज्य उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। सम्मेलन के राष्ट्रीय पर्यवेक्षक सुधीर सुमन ने कहा कि जनसंस्कृति और प्रगतिशील-जनवादी मूल्यों को मजबूत बनाने के लिहाज से इस राज्य सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने काफी सुचिंतित और गंभीर तरीके से अपनी बातों को रखा, जो बिहार में सांस्कृतिक आंदोलन की नई संभावनाओं और उम्मीदों को जगाता है। पिछले दो-तीन वर्षों से बिहार में सत्ता की संस्कृति को चुनौती देते हुए जिस वैकल्पिक जनसंस्कृति के ताकतवर होने की संभावनाएं दिखी हैं, यह सम्मेलन उसी की एक कड़ी है। नवनिर्वाचित अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन ने जसम की ज्यादा से ज्यादा इकाइयों के निर्माण की जरूरत पर जोर दिया। इस मौके पर 19 सदस्यीय जसम की पहली दरभंगा जिला इकाई भी बनाई गई, जिसका सचिव प्रो. रामबाबू आर्य को तथा अध्यक्ष अवधेश कुमार को बनाया गया। 

शाम के सांस्कृतिक सत्र में नवतुरिया (मधुबनी) ने लोकपंरपरा पर आधारित लुल्हवा सुल्हवा नाटक किया, जिसमें कई सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर व्यंग्य किया गया। दर्शकों ने इस प्रस्तुति को काफी सराहा। रंगनायक (बेगूसराय) ने प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूं’ पर आधारित नाट्य प्रस्तुति की। युवानीति (आरा) ने कड़वा सच की प्रस्तुति की। कृष्ण कुमार निर्मोही, देवेंद्र सिंह, रामसकल पासवान, समता राय, प्रमोद यादव, संतोष झा, राजू रंजन ने जनगीत पेश किए। दर्शकों में आसपास के मुहल्लावासियों की अच्छी तादाद थी। 

रिपोर्ट 
-शमशाद प्रेम  

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