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गुरुवार, जुलाई 26, 2012

मीरा को नए अर्थों में समझने की ज़रूरत है-डॉ नन्द भारद्वाज

चित्तौड़गढ़ 

मीरा के भक्ति पक्ष को तो फिर भी दूसरी तरीके से संरक्षित कर लिया गया है मगर स्त्री के वर्तमान सन्दर्भ में मीरा के काम का मूल्यांकन किया जाना बाकी है। इसी लिहाज़ से डॉ. पल्लव के सम्पादन में निकल रही  बनास जन के हाल के अंक में डॉ. माधव हाड़ा ने अपने आलेख के ज़रिये और और मारकंडेय ने कथा जैसी पत्रिका के अंक नए में बेहद ज़रूरी और नए ढंग के काम हुए हैं। फिर भी यही कहूंगा कि राजस्थानी और राजस्थान को समझे बिना  मीरा को बयान कर पाना बहुत मुश्किल है। मुझे लगता है मीरा को नए अर्थों में समझने की ज़रूरत है. अफसोस इस बात का है कि समय के साथ साहित्य के हलके में भी उत्सवीकरण का दौर चल पड़ा है और हमें भी इसी बीच अपनी संभावनाएं देखते हुए काम करना है। दिल्ली में बैठ काम की प्रक्रिया में मैंने अपनी धरती के लिए काम करने का मन बनाया है। जो मुझे बहुत सुकून देता है। 

पुरानी पुलिया के पास स्थित सी-केड सोल्यूशन और अपनी माटी वेबपत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में चौबीस जुलाई रात नौ बजे आयोजित हुयी एक संगोष्ठी में जाने माने साहित्यकार डॉ. नन्द भारद्वाज ने ये व्यक्तव्य दिया है। वे अपने केन्द्रीय उदबोधन में कहते हैं कि  हमें एक जुट होकर रहना है। ये बात सच है कि एक रचनाकार जब भी लिखा रहा होता है तब भी अकेला नहीं होता और छपने के बाद तो वैसे ही अकेला नहीं रह सकता। इस विकट दौर में इन तमाम समस्याओं से हमें लिखकर,विचार देकर,विमर्श करके लड़ना हैं। बस लेखक अपने जीवन को लिखे, उसके असल अनुभव को अपनी ज़मीन की भाषा से जोड़कर लिखे तो वो सही मायने में पाठक  को अप्रोच कर पायेगा। बाद में श्रोताओं के कहे पर उन्होंने अपने हाल में छपे संग्रह आदिम बस्तियों के बीच से दो-तीन कवितायेँ सुनायी।

दूसरे दौर में अपनी माटी के सलाहकार डॉ.सत्यनारायण व्यास, नन्द भारद्वाज से अपने सालों के अनुभव बताते हुए अतीत में चले गए। उन्होंने डॉ. भारद्वाज की लुभावनी प्रकृति को सराहा। आकाशवाणी चित्तौड़ के संस्थापक रहे और दूरदर्शन में निदेशक पद से सेवानिवृत हुए नन्द भरद्वाज की लगभग सोलह किताबें छप चुकी है। डॉ. व्यास कहते हैं कि राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर चल रही इस यात्रा में अफसोस  हमारे ही प्रादेशिक लेखक हिन्दी के नाते चले गए हैं। हम अपने चार-पांच जिलों की बोलियों को बोलने में ही ठसक भरे जीते रहे। दूसरी बात ये है कि  साहित्य की ज़रूरत हमेशा रहेगी इसलिए हमेशा निराश होने की ज़रूरत नहीं है। साहित्य जीवन का साधन है। मगर ये भी याद रहे कि इस रचना यात्रा में विचारधारा की दादागिरी कहीं नहीं चलनी चाहिए।

संगोष्ठी में नन्द भारद्वाज के साथ उपस्थित रचनाकारों में से गीतकार रमेश शर्मा, नन्द किशोर निर्झर,अमृत  वाणी ने भी अपनी रचनाएं पढ़ी. आपसी बातचीत में कोलेज के हिन्दी प्रवक्ता राजेश चौधरी और डॉ. राजेन्द्र सिंघवी ने कविता के पाठकवर्ग और आज की कविता पर संक्षित टिप्पणियाँ भी की। चन्द्रकान्ता व्यास ने एक लोक गीत बधावा गाया। आखिर में समीक्षक और हिन्दी विचारक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कुछ छंद और कवितायेँ सुनायी। इस अवसर पर हिन्दी प्राध्यापक डॉ. कनक जैन और सी-केड सोल्यूशन के निदेशक शेखर कुमावत ने  डॉ. नन्द भारद्वाज का शॉल और माल्यार्पण द्वारा अभिनन्दन किया गया। कार्यक्रम के सूत्रधार माणिक थे।


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