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रविवार, जुलाई 08, 2012

आरा:बथानी टोला की 16 वीं बरसी


आरा: 8 जुलाई 2012

जन संस्कृति मंच ने बथानी टोला की 16 वीं बरसी पर 11 जुलाई को बिहार के आरा में साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, चित्रकारों, रंगकर्मियों, गायकों, पत्रकारों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों से अपील की है कि वे इस रैली में भारी तादाद में शामिल हों। जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गंुजन, कवि जितेंद्र कुमार, सुनील चौधरी, सुमन कुमार सिंह, चित्रकार राकेश दिवाकर, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, राजू रंजन और जसम के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सुधीर सुमन ने एक बयान जारी करके यह कहा कि 11 जुलाई 1996 को जब बथानी टोला जैसा नृशंस जनसंहार हुआ था, तब भी जसम ने पूरे देश में साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों, पत्रकार-बुद्धिजीवियों से इस सत्ता संरक्षित जनसंहार का विरोध करने का आह्वान किया था। सामाजिक यथास्थिति के पक्षधर सत्तापरस्त बुद्धिजीवी और रचनाकार येन केन प्रकारेण उत्पीड़ितों के पक्ष में  बोलने से बच रहे थे या हिंसा के शिकार लोगों को ही उपदेश दे रहे थे, तब जसम ने गरीबों, शोषितों और जुल्म के मारों के प्रति साहित्य की पक्षधरता की परंपरा का परचम उठाया था। पूरे देश में सामाजिक-राजनीतिक सत्ता के साथ साहित्यकारों के रिश्ते को लेकर जबर्दस्त बहस छिड़ गई थी। बथानीपीड़ितों ने साहित्यकारों से अपील की थी कि वे बिहार सरकार द्वारा घोषित पुरस्कार लेने पटना जाने के बजाए बथानी टोला आएं और जनसंहार पीड़ित जनता के साथ खड़ें हों। इस अपील का यह असर हुआ था कि कई लोग सम्मान लेने पटना नहीं पहुंचे और इस अपील के पक्ष-विपक्ष में बहस चलने लगी। 

बथानीटोला जनसंहार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की आकांक्षा रखने वालों को जातिवादी-सांप्रदायिक घृणा, सामंती बर्बरता और उसे संरक्षण देने वाली राजनीति के विरुद्ध जोरदार संघर्ष चलाना होगा। बथानी टोला जनसंहार से आहत होकर कई रचनाकारों ने कविताएं और कहानियां भी लिखीं। साहित्य-संस्कृति की दुनिया में बथानी टोला जनपक्षधरता की एक कसौटी बन चुका है, जो लोग तब जनता के साथ खड़ा होने के बजाए नृशंस निजी सेना को संरक्षण देने वाली सरकार के साथ खड़े हुए, उन्होंने साहित्य में चाहे जिस तरह के विमर्श चलाए हों, बथानी टोला हमेशा उन पर सवाल बनकर टंगा रहा है। 

कई युवा पत्रकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने खिलाफ टिप्पणियां लिखीं। हत्यारों के उस सरगना जिसने अखबारों में महिलाओं और बच्चे के कत्लेआम के पक्ष में तर्क दिए थे, उसकी अचानक हत्या के बाद जिस तरह के आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं और उस वक्त जो रवैया रहा, उसे लेकर भी बेहद आक्रोश से भरी टिप्पणियां लोगों ने लिखीं। 

जसम से संबद्ध साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने महान क्रांतिकारी कवि ब्रेख्त के हवाले से कहा कि किसी भी सभ्य समाज के लिए इंसाफ रोटी की तरह ही जरूरी है। हिंदी के महान कवि निराला की मशहूर कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ का जिक्र करते हुए एक सदस्य ने कहा कि बेशक आज अन्याय जिधर है उधर ही शक्ति दिख रही है, पर जनशक्ति की मौलिक कल्पना करने वाले निश्चित तौर पर अन्याय की व्यवस्था का खात्मा कर सकते है। जनता की स्वतंत्रता और उसके जीवन की बेहतरी के प्रति प्रतिबद्ध हम साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी न्याय के इस जरूरी संघर्ष के प्रति अपना समर्थन जाहिर करते हैं।

सुधीर सुमन द्वारा जारी

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