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बुधवार, जून 27, 2012

अरविन्द श्रीवास्तव ने समकालीन हिन्दी कविताओं के जरिए सामाजिक विसंगतियों को रेखांकित किया।


साहित्य अकादेमी का विशिष्ट आयोजन: पटना में बहुभाषी कवि सम्मेलन

देश विभिन्न भागों से आये बहुभाषाभाषी कवियों की गरिमामय उपस्थित से पटना स्थित ख्रुदा बख़्श ओरियंटल पब्लिक लाइ़ब्रेरी का प्रशाल जगमगा उठा। हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, नेपाली, असमिया, मैथिली और संताली भाषा के प्रतिष्ठित कावियों ने अपनी काव्य की रस धारा से पटना में अद्वितीय समां बांध दिया। कवियों में कई साहित्य अकादेमी सम्मान से सम्मानित कवि थे। 

पटना के खुदा बख़्श ओरियंटल लाइब्रेरी में 24 जून को सम्पन्न इस बहुभाषा कवि सम्मेलन का विधिवत शुभारंभ करते हुए साहित्य अकादेमी के विशेष कार्य पदाधिकारी जे. पुन्नुदुरै व मैथिली भाषा के संयोजक विधानाथ झा विदित ने अपने स्वागत वक्तव्य में  बहुभाषाभाषी कवि सम्मेलन की सार्थकता को रेखांकित किया। इस औपचारिकता के बाद कविता , शेरो-शायरी का दौर शुरू हुआ। कविता पाठ के प्रथम सत्र में देहरादून से आये कवि-गीतकार डा. बुद्धिनाथ मिश्र, वनिता (पंजाबी), आलम खुर्शीद (उर्दू) सुरेन्द्र थींग (नेपाली) देव प्रसाद तालुकदार (असमिया) यशोदा मुर्मू (संताली) व शांति सुमन (हिन्दी) ने अपनी कविताओं की बहुरंगी छटा बिखेरी, कुछ बानगी - राइफलें खेत जोत रही है/ बुलेट की गंध यत्र-तत्र सतर्कता के साथ फैल रही है/सिगरेट की गंध में भी बारुद की गंध है/ प्यासा मन पानी खोज रहा है.. (सुरेन्द्र थींग)। उर्दू के आलम खुर्शीद ने कहा - जिन्दा रहने के खातिर इन आँखों में कोई न कोई ख्वाब सजाना होता है/ सेहरा से बस्ती में आकर ये भेद खुला, दिल के अंदर भी विराना होता है। देव प्रसाद तालुकदार (असमिया) ने अपनी - साइकिल एवं दायाँ हाथ, बाँया हाथ शीर्षक कविताओ से ताली बटोरा। मैथिली की रानी झा ने प्रेम गीत सुनाया। हिन्दी कवयित्री शांति सुमन ने - तुम मिले तो बोझ है कम बहुत हल्की पीठ की गठरी... से वातावरण को खुशनुमा बनाया। वनिता (पंजाबी) ने ‘मैं शकुंतला नहीं’, पूंजीवाद और भाषा की कलम शीर्षक कविता का पाठ किया। बुद्धिनाथ मिश्र ने गीत में कहा - आदमी गुम जायेगा उसका पता रह जायेगा, और नदी के तीर पर जलता दिया रह जायेगा....। उ्रन्होंने मैथिली कवितायें भी सुनाई। विद्वान डा. इम्तियाज अहमद ने इस सत्र के समापन  पर धन्यवाद ज्ञापन किया। 
    
सम्मेलन के द्वितीय सत्र में डा. दीपक मनमोहन सिंह (साहित्य अकादेमी के पंजाबी परामर्श मंडल) की अध्यक्षता में कीर्ति नारायण मिश्र (मैथिली), जदुमनि बेसरा (संताली), शमीम तारिक (उर्दू), राजीव बरूआ (असमिया) ने अपनी कविताओं से उपस्थित श्रोताओं का मनोरंजन किया। एक बानगी शमीम तारिक  की - धमाके हार जायेंगे..। अब तो दहलीज़ तक आ पहुँचा है चढ़ता पानी... आँख लग जाये जहाँ उसको हवेली कहिए...।

    शायर व गज़लकार चंद्रभान ख़्याल की अध्यक्षता में स्वयंप्रभा (मैथिली), आदित्य कुमार मंडी (संतली) कुलवीर सिंह (पंजाबी), उत्पला बोरा (असमिया), जफर कमाली (उर्दू) और अरविन्द श्रीवास्तव (हिन्दी) ने  काव्य पाठ किया। देखें कुलवीर सिंह की पंक्ति ‘टूटकर रिश्ता हमारा और सुंदर हो गया, तुमको मंजिल मिल गयी मैं मुसाफिर हो गया...। अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा) ने अपर्नी  समकालीन हिन्दी कविताओं के जरिए सामाजिक विसंगतियों को रेखांकित किया। चंद्रभान ख्याल ने दिवंगत शायर कुमार पाशी की स्मृति में लिखे अपने नज़्म को पेश किया। 

     इस बहुभषी कवि सम्मेलन के अंतिम सत्र में वरिष्ठ कवि अरुण कमल (हिन्दी), जसवीर राणा (पंजाबी), उदयचन्द्र झा ‘विनोद’ (मैथिली), शिवलाल किस्कू (संताली) डा. कासीम खुर्शीद (उर्दू) और कौस्तुभ मणि सैकिया (असमिया) ने अपनी-अपनी कविताओं के माध्यम से आज के हालात को श्रोताओं के सामने रखा। कवि अरुण कमल ने अपनी - ‘घोषणा, वित्तमंत्री के साथ नाश्ते की मेज पर, लाहौर, तोडने की आवाज, अमर फल और अपनी केवल धार शीर्षक कविताओं द्वारा कविता की समसामयिक यर्थाथ को उकेरा । डा. कासीम खुर्शीद ने कहा ‘मुझे फूलों से बादल से हवा से चोट लगती है, अजब आलम है इस दिल को वफा से चोट लगती है...। समारोह के सफल समापन पर विद्यानाथ झा ‘विदित’ ने दूरागत कवियों एवं उपस्थित श्रोताओं को धन्यवाद दिया।  

    साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और चेतना समिति व खुदा बख्श लाइब्रेरी के सहयोग से पटना में आयोजित इस बहुभाषी कवि सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से आये बहुभाषी कवियों की भागीदारी ने  आयोजन को यादगार बना दिया। समारोह में अकादेमी द्वारा पुस्तक प्रदर्शनी भी साहित्य प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र रहा।

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