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बुधवार, जून 27, 2012

सीमा आजाद की रिहाई को लेकर लखनऊ में धरना प्रदर्शन


मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद की रिहाई को लेकर लखनऊ में धरना प्रदर्शन


लखनऊ, 27 जून। लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन तथा मानवाधिकार व सामाजिक.राजनीति कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के विरोध में खासतौर से मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद की रिहाई की मांग को लेकर लखनऊ के लेखक, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता तथा जन संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश विधान सभा के सामने एकजुट हुए और उन्होंने ने धरना दिया। पी यू सी एल की पहल पर हुए इस धरने के माध्यम से मांग की गई कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले बंद हो, सीमा आजाद सहित तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाय तथा यू0 ए0 पी0 ए0 जैसे काले कानून को वापस लिया जाय। धरने के बाद मोमबत्तियां जलाकर विधान सभा से लेकर पटेल प्रतिमा तक मार्च भी निकाला गया। इसके द्वारा जेलों में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ लोगों ने अपनी एकजुटता प्रदर्शित की।

इस मौके पर हुई सभा को पी0 यू0 सी0 एल0 उत्तर प्रदेश की महासचिव वंदना दीक्षित जन संस्कृति मंच के संयोजक कौशल किशोर, एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, डॉ राही मासूम रज़ा एकेडमी के महामंत्री रामकिशोर, ऑल इण्डिया वर्कस कांउसिल के ओ0 पी0 सिन्हा, इंसाफ के उत्कर्ष सिन्हा,, रिक्शा मजदूर यूनियन के आशीष अवस्थी, दिशा के लालचंद, आइसा के सुधांशु बाजपेई, डग के रामकुमार आदि ने संबोधित किया। सभा का संचालन आवाज के आदियोग ने किया।

इस मौके पर हुई सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि 37 वर्ष पहले 26 जून के दिन आपातकाल की घोषणा की गई थी। भारत की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करते हुए हजारों लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। आज भी स्थितियाँ बहुत बदली नहीं है। काले कानून लागू कर जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की प्रक्रिया जारी हैं। जन दबाव की वजह से भले ही कोई बदनाम हो गया काला कानून वापस ले ले, लेकिन हम देखते हैं कि उसकी जगह वह उससे भी भयानक व जन विरोधी कानून जनता पर वह थोप देती है। 

वक्ताओं का कहना था कि मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं का उत्पीड़न दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। किसी को भी आतंकवादी या माओवादी कहकर या यू0ए0पी0ए0 जैसे कानूनों का सहारा लेकर जेल में डाल दिया जाता है। न्ययापालिका की भूमिका भी कार्यपालिका जैसी हो गई है। ऐसा हम बथानी टोला सहित तमाम मामलों में न्यायपालिका की भूमिका संदेह के घेरे में है। आज तो पुलिस प्रशासन की नजर में शहीद भगत सिंह का साहित्य भी आतंकवादी साहित्य है। ऐसे ही वामपंथी व क्रान्तिकारी साहित्य रखने को आधार बनाकर पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ0 विनायक सेन को छत्तीसगढ़  की अदालत ने उम्रकैद की सजा दी थी और अभी हाल में इलाहाबाद की निचली अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद को उम्रकैद की सजा सुनाई है। सीमा आजाद को देशद्रोही कहा जा रहा है वक्ताओं ने सीमा आजाद सहित अन्य कार्यकर्ताओं की रिहाई के संबंध में मांग की। 

कौशल किशोर 
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
मो - 08400208031

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