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सोमवार, अप्रैल 23, 2012

आज रंगमंच की प्रासंगिकता एक चुनौती है फिर भी हम आशान्वित हैं।


मधेपुरा में ‘इप्टा’ का तीन दिवसीय ग्रामीण नाट्य महोत्सव संपन्न

 ‘इप्टा’ स्मारिका का लोकार्पण करते
हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ व अन्य
 
लोक संस्कृति की समृद्धि एवं नई पहचान के साथ मधेपुरा की धरती पर इप्टा का तीन दिवसीय ग्रामीण नाट्य महोत्सव सम्पन्न हुआ। 20 से 22 अप्रैल तक चले इस समारोह में कोसी इलाके में प्रचलित नारदी, भगैत, जट-जटिन, डोमकछ, दीनाभद्री जैसी लोक गाथाओं सहित पश्चिम बंगाल व असम से आये इप्टा कलाकारों के नाटक व लोक नृत्यों का ऐतिहासिक मंचन को मधेपुरा की जनता लंबे वक्त तक याद रखेगी।

    समारोह के अन्तिम दिन ‘आधुनिकता की दौर में ग्रामीण रंगमंच’ विषयक विचार गोष्ठी का विषय प्रवेश करते हुए प्रो. श्यामल किशोर यादव (मधेपुरा इप्टा के संरक्षक) ने रंगमंच और फिल्मों की पृष्ठभूमि में अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हबीब तनवीर ने रंग और कला का अद्भुत सामंजस्य किया... आज रंगमंच की प्रासंगिकता एक चुनौती है फिर भी हम आशान्वित हैं। विचार गोष्ठी का उद्धाटन करते हुए डा. के. एन. ठाकुर ने बताया कहा कि जितनी ललित कलाएँ हैं उसमे  नाटक का विशेष महत्व है। नाटक हमारी संस्कृति को परिष्कृत करता है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति को संरक्षित करने के लिए नाटक की जरूरत है। पूर्वजों से कट जाने के बाद कोई संस्कार नहीं रह जाता। दीनाभद्री या लोरिक को जब हम याद करते हैं तो हम संस्कृति को स्मरण भी करते हैं। मधेपुरा इप्टा के पूर्व अध्यक्ष डा. आलोक कुमार, कवि सिद्धेश्वर काश्यप एवं डा. विवेक भारती ने विषयक को आगे बढ़ाते हुए  ग्रामीण नाटक की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किये। दैनिक ‘प्रभात खबर’ के ब्यूरो प्रमुख रुपेश कुमार श्रीवास्तव ने सवाल उठाये कि जिस तरह पाठ्यक्रम में चित्रकला और संगीतकला शामिल है उस तरह नाट्य कला क्यों नहीं ? उन्होंने नाट्य कला को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर बल दिया। 

लोक संगीत का आयोजन
विश्वविधालय के पूर्व परीक्षा नियंत्रक डा. भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ ने कहा कि आधुनिकता में हम कितने भी आगे क्यों न निकलें, नाटक की जरूरत रहेगी ही। उन्होंने डा. होमी जहाँगीर भाभा के सांस्कृतिक योगदान की चर्चा करते हुए उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की बात कही। डा. रामचन्द्र प्रसाद यादव ने नाटक को साहित्य की सबसे प्रभावकारी विधा बताया।

    विचार गोष्ठी के मुख्यवक्ता श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने पारसी ड्रामे की चर्चा की तथा कई ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ नाट्य विषयक अपने अनुभव को सुनाया। उन्होंने कहा कि आज अगर गांव के रंगमंच का हृास हो रहा है तो उसके लिए विज्ञान जिम्मेवार नहीं है ... इप्टा अपने विचारों को लोकोन्मुख बनावे !    संध्याकाल में रवीन्द्र नाथ टैगोर लिखित नाटक ‘अभिसार’ का मंचन कोलकता से आये कलाकारों द्वारा देवाशीष दत्ता के निर्देशन में किया गया। समारोह का एक मुख्य आकर्षण ‘स्मारिका का विमोचन एवं लोकापर्ण’ था जो वरिष्ठ साहित्यकार, क्षेत्रीय इतिहासकार एवं कवि श्री हरिशंकर श्रीवांस्तव ‘शलभ’ के द्वारा सम्पन्न हुआ उन्होंने अपने उद्बोधन में इप्टा के जनपक्षीय कार्यों की सराहना की। 

‘बीहू’ का दृश्य
    असम के ‘राभा कामनीटी’ का ‘बोगेजरी’ एवं ‘बीहू’ नृत्य गौतम एवं साथियों की प्रस्तुति  ने दर्शको को रोमांचित कर दिया। इन्हें मंच पर ‘बुके’ देकर प्रदेश इप्टा के उपाध्यक्ष प्रो. शचीन्द्र एवं प्रलेस के बिहार मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता अरविन्द श्रीवास्तव ने सम्मानित किया।  मंच पर लोकगायक माधव प्रसाद यादव का वाद्य वादन को दर्शकों ने बेहद सराहा। विभिन्न स्कूलों के बच्चों द्वारा प्रस्तुत नृत्य भी इस समारोह का आकर्षण रहा।  इस सफल आयोजन के लिये मधेपुरा इप्टा के अध्यक्ष डा. अमोल राय, सचिव तुरवसु एवं कार्यक्रम संयोजक सुभाष चन्द्र को दर्शकों ने बधाइयाँ दी।  


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



(मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस)
अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),
मोबाइल- 09431080862.
मधेपुरा,बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।
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