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मंगलवार, मार्च 27, 2012

नालंदा और विक्रमशीला की पहचान वाला बिहार:सौ साल बाद



शताब्दी वर्ष में बिहार
 संघर्ष की विरासत-बदलाव की चाहत’ विषय पर सेमिनार

बिहार के सौ साल होने पर 22 मार्च से सरकार की ओर से जो तीन दिनी जश्न चले, उसके जरिए बिहार में ऐसा माहौल बनाया गया, मानो यहां हर चीज बेहतर हो गई है और चारों ओर खुशनुमा माहौल है। 22 मार्च को जब गांधी मैदान में सरकार और प्रशासन जश्न की तैयारी में लगे हुए थे, उस वक्त उसी गांधी मैदान के एक कोने पर आईएमए हॉल में छात्र संगठन आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा द्वारा आयोजित सेमिनार- ‘शताब्दी वर्ष में बिहार: संघर्ष की विरासत-बदलाव की चाहत’ में बिहार की बुनियादी बदलाव को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हो रहा था। सुबह-सुबह एक वरिष्ठ पत्रकार मार्निग वाक करते हुए मिले थे, जिन्होंने बताया कि आजकल बिहार में किस तरह मीडिया वही सबकुछ दिखाने को बाध्य है जो सरकार चाहती है, बाकायदा फोन करके पत्रकारों को निर्देशित किया जाता है कि किस तरह की खबरें छापनी। जब हम सेमिनार में पहुंचे तो देखा कि वे पत्रकार भी मौजूद थे। सेमिनार में जाते वक्त दो तरह का बिहार साफ-साफ सड़कों पर दिख रहा था। एक बिहार था जो उंची बिल्डिंगों, लेटेस्ट मॉडल की गाड़ियों और विज्ञापनों की होर्डिंगों में दिख रहा था। जेपी की मूर्ति भी सरकार के विज्ञापनों से ढंक सी गई थी। दूसरी ओर ठेलेवाले, रिक्शेवाले आज भी सड़क किनारे खाना पका रहे थे। ठीक रेडियो स्टेशन के बगल में कुछ लोग फुटपाथ पर रहने को विवश थे। एक रिक्शेवाले का अंदाजा था कि पटना में 10000 लोग इसी तरह फुटपाथ पर सोते हैं। इधर पटना में बदलाव यह हुआ है कि दारू की दूकानें जगह-जगह दिख रही थीं, लेकिन हमेशा की तरह गरीबों और कम आय वालों के लिए सड़क किनारे खाना बनाकर बेचने वाले भी मौजूद थे। आखिर इस ‘बनते बिहार’ में वे रोजी-रोटी के लिए जाएंगे कहां! सेमिनार के बाद हमने भी अपनी भूख लिट्टी की ऐसी ही दूकान पर मिटाई।    

विषय प्रवर्त्तन करते हुए समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि बिहार में 58 प्रतिशत आबादी युवाओं की है और उनके लिए पिछले किसी भी दौर से ज्यादा महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार प्रचारित कर रही है कि रोजगार रुक गया है। तो सवाल यह है कि ये जो रेलगाड़ियां इस तरह से भरी-भरी जा रही हैं, तो क्या उसमें लोग देश घुमने जा रहे हैं? दूसरा सवाल है बिहार की शिक्षा का। नालंदा और विक्रमशीला जैसे विश्वविद्यालय जहां कभी थे, उसका शिक्षा की गुणवत्ता की बात तो दूर, सामान्य शिक्षा के लिए भी छात्र बिहार से बाहर जा रहे हैं। बिहारियों को बिहारी होने की शर्म कभी नहीं रही। बिहार अपने बारे में उतनी ही बेबाकी से बात करता रहा है, जितना दूसरों के बारे में। देश की राजधानी भले दिल्ली हो, पर देश में बदलाव की राजधानी पटना रही है। उन्होंने कहा कि बिहार की पहचान नागार्जुन जैसे कवि हैं, जिनकी जन्मशती गुजर गई, पर सरकार को उनकी याद नहीं आई। रामजी राय ने कहा कि बिहार में भाषा-निर्माण की जितनी ताकत है, उतनी कहीं और नहीं हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उठ खड़ा होना और जनविरोधी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की चेतना बिहार की मूल चेतना है। बिहार में क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि बिहार में हमेशा संघर्षों की बड़ी एकता की पहल होती रही है। आज सरकार बनते बिहार का प्रचार कर रही है, पर इस बनते बिहार में रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार, घुसखोरी, महिलाओं का उत्पीड़न और अपराध तेजी से बढ़ रहा है। यह सरकार बिहार का नवनिर्माण नहीं कर सकती।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. नवल किशोर चौधरी ने एक मर्मबेधी कविता की तरह अपने वक्तव्य की शुरुआत की। वे उन चंद लोगों में से हैं, जो पिछले वर्षों में लगातार बिहार सरकार की आर्थिक नीति और विकास के मॉडल के खिलाफ मुखर रहे हैं। बिहार शताब्दी जश्न पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि पटना को नीली रोशनी में डूबोकर जश्न मनाने वालों की निगाह उन सुदूर गांवों पर नहीं है, जहां आज भी दीया नहीं जलता, चूल्हा 24 घंटे में एक बार ही जलता है, वे उन अस्पतालों में नहीं जाते जहां की कुव्यवस्था के कारण मरीज दम तोड़ देते हैं, उन संसाधनविहीन स्कूलों के विकास की उन्हें फिक्र नहीं है, जहां आम लोगों के बच्चे पढ़ते हैं। इस राज्य की बहुत बड़ी आबादी के विकास और उसकी जिंदगी में प्रकाश लाने की जिम्मेवारी से यह सरकार कन्नी काट चुकी है। बिहार में बदलाव का जो सरकार का दावा है वह बिल्कुल गलत है। आज बिहार के करीब बारह जिले खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त हैं। कृषि, पशुपालन में नकारात्मक ग्रोथ हो रहा है। बिहार में सिर्फ पांच से दस प्रतिशत लोगों का विकास हो रहा है। पलायन बिल्कुल नहीं रुका है। 

बिहार के 100 साल होने का जब जश्न मनाया जा रहा है तो सोचा यह जाना चाहिए कि जो 90 प्रतिशत आबादी है, वह इस जश्न में कहां है।  किसान आंदोलनों ने बिहार में बुनियादी परिवर्तन का आधार तैयार किया था। आज विकास के लिए भूमि सुधार अनिवार्य है। शिक्षा की गुणवत्ता नष्ट हो रही है, शिक्षकों की गुणवत्ता खराब है। प्रो. नवल किशोर चौधरी ने बेहद क्षोभ के साथ कहा कि पूरी शिक्षा व्यवस्था अनैतिक, भ्रष्ट और चारित्रिक रूप से पतित लोगों के कब्जे में है, जिनमें से कुछ ने तो विश्वविद्यालयों को ऐशगाह बना दिया है। उन्होंने कहा कि आज कैबिनेट में कोई बहस नहीं होती। कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार और लूट बढ़ी है, पूरा सिस्टम यहां चौपट हो चुका है। उन्होंने कहा कि बिहार शोषण व सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की धरती रही है। गौतम बुद्ध भी एक क्रांतिकारी थे। राजनीति, शासन, अर्थ हर स्तर पर बिहार के पास एक जो गौरवशाली विरासत है, वह कुछ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक चेतना की विरासत है। 

शिक्षाविद् विनय कंठ ने कहा कि आज 2012 में जो उपलब्धियों को जो शोर सरकार मचा रही है, वह कृत्रिम और नकली है। बिहार की सरकार के पास कोई मौलिक दृष्टि नहीं है, बल्कि वह निजीकरण-उदारीकरण की आर्थिक नीतियों की ही नकल कर रही है। इससे भ्रष्टाचार और विषमता ही बढ़ेगी। जो भी विकास हो रहा है, उससे बहुसंख्यक समाज को कोई फायदा नहीं हो रहा है। जनता के लिए एक नई अर्थनीति की जरूरत है, जिसके लिए एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करना होगा। वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने कहा कि आज बिहार में पत्रकारिता के आदर्शों पर चोट हो रही है। जनता की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बिल्कुल बदतर है, पर चमकते बिहार का सरकार खूब प्रचार कर रही है। करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छप रहे हैं,यह सेमिनार इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यहां बिहार के वास्तविक बदलाव के लिए विचार विमर्श हो रहा है।

पत्रकार श्रीनिवास ने कहा कि जिस तरह फ्रांस की क्रांति के समय वहां के राजा ने सरकश का खेल शुरू किया था, आज बिहार शताब्दी पर होने वाले जश्न उसी तरह की कोशिश है। लेकिन नीली रोशनी के पीछे के अंधेरे को यह सरकार लाख कोशिशों के बावजूद छिपा नहीं पाएगी। उन्होंने कहा कि बिहार की पत्रकारिता का उदय जनसंघर्षों से हुआ है। बौद्धिक सच को छुपाने का काम कर रहे हैं। बिहार में नागरिक समाज की चुप्पी पर उन्होंने चिंता जाहिर की।

भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार में यहां कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। सरकार सिर्फ सत्ता-प्रबंधन, उपलब्धियों के फर्जी आंकड़ों और विज्ञापन तथा जनता के खजाने की लूट में लगी हुई है,जबकि राज्य में गरीबों की संख्या, बेरोजगारी और मजदूर-किसानों की बदहाली लगातार बढ़ती जा रही है। आज भी यहां रोजगार और मजदूरी का सवाल उठाने पर दमन हो रहा है.गरीबों के जनसंहार करने वाले और उनके राजनीतिक संरक्षक आज भी खुले घूम रहे हैं, आज भी उनके अपराध का धंधा चल रहा है, जबकि हमारे साथियों की आज भी हत्या की जा रही है। इसलिए बिहार में लोकतंत्र और जमीनी विकास का क्या होगा, यह सवाल इस वक्त ज्यादा महत्वपूर्ण है।

का. दीपंकर ने कहा कि अंग्रेजों से लेकर आज तक जनता की बदलाव और विकास की आकांक्षा का कुचलने का ही काम किया है. बिहार उनके लिए श्रम के शोषण-दोहन की प्रयोगशाला रहा है। इसी कारण शोषण के खिलाफ संघर्ष और बुनियादी तौर पर व्यवस्था को बदलने वाले क्रांतिकारी जनांदोलन भी बिहार में लगातार होते रहे हैं। श्रम और संघर्ष बिहार की मूल पहचान है। छोटी-छोटी चीजों के लिए भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयां बिहार में छिड़ जाती रही हैं। यहां बदलाव का संघर्ष अपने अंतर्वस्तु में व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की मांग करता है। वामपंथी आंदोलन में भी इसीलिए बिहार क्रांति की निरंतर कोशिशों के लिए जाना जाता रहा है। बिहार में आज आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक तौर पर आगे बढ़ने की परिस्थितियां हैं, पर इसके लिए वर्तमान यथास्थितिवादी सत्ता जिसने बदलाव का झूठा भ्रम खड़ा किया है, उसे बदलना बेहद जरूरी है और उसे बदलने का काम यहां के नौजवान, छात्र, मजदूर और किसान ही मिलकर कर सकते हैं। जनता की जो बदलाव की विरासत और संघर्ष की ताकत है, उसको आगे बढ़ाना आज बेहद जरूरी है।

सेमिनार में इनौस के राष्ट्रीय महासचिव कमलेश शर्मा, आइसा के राज्य सचिव अभ्युदय, इनौस के राज्य सचिव नवीन कुमार, साहित्यकार-पत्रकार सुधीर सुमन, अरुण नारायण, युवा कवि मनोज कुमार झा, सजल आनंद, राजेश कमल, कथाकार शेखर, प्रो. तरुण कुमार, एडवोकेट मनोहर लाल, रत्नेश, रंगकर्मी संतोष झा, सुरेश कुमार ‘हज्जू’, माले नेता कृष्णदेव यादव, संतोष सहर, एपवा नेत्री अनीता सिन्हा समेत सैकड़ों गणमाण्य नागरिक, छात्रा-युवा मौजूद थे।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959
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