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रविवार, मार्च 04, 2012

जल, जंगल और जमीन के सवाल पर संघर्ष


कुमार कृष्णन

झारखंड, छत्तीसगढ और ओडिसा की भौगोलिक स्थिति संस्कृति और समस्याएं लगभग एक जैसे है। राष्ट्रीय एकता परिषद के कन्याकुमारी से षुरू जन संवाद यात्रा इन राज्यों से भी गुजरी और इसके उपरांत साझा मंच के साथ संवादगोष्ठी कर समस्याओं के तहत में जानने की कोषिष की इसी परिपेक्ष में भू अधिकार जन सत्याग्रह संवाद यात्रा के परिपेक्ष में पुरूलिया रोड़ स्थित एस.डी.सी. के सभागार में सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें झारखंड, ओडिसा और छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन के लिए आंदोलन कर रहें आंदोलनकारी नेताओं ने भाग निया। इस सेमिनार में देष के वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रकाश वैदिक, मधुकर मिश्रा और प्रसुन लातंत ने भी भाग लिया। 

सेमिनार के प्रथम सत्र में भू अधिकार जन संवाद यात्रा के नेतृत्व कर्ता सह राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद के सदस्य श्री राजगोपाल पी. व्ही. ने जनसंवाद यात्रा देष के 10 राज्यों की यात्रा पूरी करने के दौरान जंल जंगल और जमीन की समस्या के लिए संघर्ष कर रहे लोगों कि हालत के चर्चा करते हुए कहा कि झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिसा में भौगोलिक संपदा है और इस भौगोलीक संपदा पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं और इन हमलों से बचने के लिए लोग संघर्ष कर रहें, जैसे ओडिसा के कलिंगनगर, छत्तीसगढ़ में रायगढ़ तथा झारखंड के नेतरहाट और कोयलकारी सहित कई क्षेत्रें में लोग अपनी भौगोलीक संपदा के लिए आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि कंपनियों की नजर इन भौगोलिक संपदा पर है, ये इन भौगोलिक संपदा कोयला, बॉक्साइट, यूरेनियम, आयरन ओर सहित तमाम खनिज संपदा को कंपनी दोहन करने के लिए लोगों से जमीन छिन रही है, जंगल नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा कि इन तीनों राज्य में खनिज संपदा के साथ श्रमषक्ति काफी ज्यादा है और देष के विकास में इनकी भूमिका अहम है, उसके बाद भी झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिसा के लोगों को अपनी जीविका चलाने के लिए बाहर जाना पड़ता है, जो गंभीर चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि इन दिनों प्रदेष में सांस्कृतिक सषक्त समुदाय के लोग है, जो अपनी स्वाभिमान के लिए हमेषा संघर्ष करते रहें, जिसका उदाहरण हैं, बिरसा मुंडा, नीलांबर-पीतांबर और सिद्धो-कानून जैसे कई लोगों ने अपनी जंल, जंगल, जमीन और स्वभीमान के लिए संघर्ष किया है, उन्होंने कहा कि इन तीनों प्रदेष में गोलबलाइजेषन का प्रभाव काफी पड़ा है, उन्होंने कहा कि सामाज के लिए के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर भी अत्याचार हो रहे  है.

उन्होंने कहा कि यह हालत केवल झारखंड, छत्तीसगढ और ओडिसा की ही नहीं बल्कि पूरे देष की हालत यही है। उन्होंने केरला में भूमि सुधार के नाम पर भी धोखा किया गया, वहा काम करने वालों को जमीन न देकर काम करवाने वालों और बड़े जमींदरों को दे दिया गया, गरीब, वंचित, दलित आदिवासी आज भी भूमिहीन है। उन्होंने कहा कि देष में गरीबों की हालत काफी खराब है, जिसमें मुसलिम महिला ज्यादा प्रभावित हुई है। देष के करोड़ो लोग आज रेलवे टैªक, फैक्ट्री के दिवार के पीछे प्लास्टिक के झोपड़ी लगाकार जीवन जी रहे हैं, मगर इसकी चिंता किसी को नहीं है, उनके लिए कोई काम नहीं करना चाहती है, बल्कि इनकों भूमि देने के बजाये, उन्हें अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ रही है।जो गंभीर चिंता की बात है.

झारखंड, ओडिसा, छत्तीसगढ़ के लोगों अपनी बात रखते हुए  ओडिसा के भरत भाई ने कहा कि भाषा को आधार बनाकर राज्यों को बंटवारा हुआ था। जनजातियों का विभाजन किया गया था। इसी में वहां के लोग उलझे हैं। जनजातियों के साथ न्याय नहीं हुआ है। यहां अलगाववाद की भावना पनप रही है। बड़ी कंपनियों  में खनन के नाम पर यहां की संपदा का दोहन किया है। झारखंड के कोल्हान के क्षेत्र में आंदोलन कर रहे कुमारचंद मार्डी ने कहा कि झारखंड के अलग-अलग इलाकों का महत्व है। उन्होंने कहा कि सिंहभूम में कॉपर, यूरेनियम जैसे खनिज संपदा भरा हुआ है, जिसका दोहन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कंपनियां लोगों से जमीन छिन कर लोगों को विस्थापित करने पर पड़ी हुई है। उन्होने कहा कि जिस दौर में झारखंड के धरती पर टाटा ने प्रवेष किया था, उसी दौर में बिरसा मुंडा अपनी जंल, जंगल और जमीन के अधिकार के लिए उलगुलान की षुरूआत किया था और यह उलगुलान जमीन के सवाल को लेकर था। मगर टाटा सौ साल पूरे होने पर जष्न मना रहा है, मगर इन क्षेत्र के आदिवासियों कि हालत काफी खराब है, उनकी सुधी लेने वाला कोई नहीं है। कोल्हान में अवैध तरीके से लोगों की जमीन हस्तांतरित की जा रही है। सारंडा के इलाकों में विकास के मॉडल के नाम पर लोगों के जीने के साधन लूटे जा रहें है।

स्टेन स्वामी झारखंड आंदोलन के परिपेक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि  जन प्रतिरोध की ताकत को रेखांकित है। 2005 से 2010 झारखंड में सैकड़ों एम.ओ.यू कंपनियों के साथ किया गया है। उन्होंने कहा कि जनसंगठनों को गोलबंद कर जनता के ताकत को बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता को संगठित कर लड़ाई को जीती जा सकती है। उन्होंने कहा कि आज विकास की नीति एसपी और डीसी तय कर रहे है, जबकि यह काम ग्राम सभा को करना चाहिए, मगर ये अधिकारी व सरकार दोनों मिल कर ग्राम सभा के अधिकार को भी छिन रहे हैं। छतीसगढ़ के अमृत जोषी, ओडिसा के ललित मोहन पटनायक, नेतरहाट फिल्ड फायरिंग रेंज के पीटर मिंज, छतीसगढ़ की कालिनी बहन सहित कई आंदोलनकारी साथियों ने अपनी बात रखी.

सेमिनार में बोलते हुए देष के प्रसिद्ध पत्रकार वेद प्रकाष वैदिक ने कहा कि भूमि के सवाल पर समग्र नीति तय करनी चाहिए। देष स्तर पर भूमि रिकॉर्ड के अद्ययतन को स्थानीय भाषा बनानी चाहिए, ताकि देष के सबसे अंतिम व्यक्ति तक उनकी जानकारी पहुच सके। उन्होंने कहा कि सरकार मरे हो को मार रही है और नंगों को लूट रही है, जबकि इनकी हिफाजत करने की जिम्मेवारी सरकार की है। उन्होंने कहा कि आंदोलन व अधिकार की बात करने वाले लोगों को काफी परेषानी तथा यतनाएं झेलनी पड़ती है, मुझे और आंदोलन करते हुए गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा कि झारखंड, ओडिसा और छत्तीसगढ़ के लोगों को मिलकर ऐसी आंदोलन की तैयारी करनी चाहिए, ताकि सरकार को झकझोर दे। उन्होंने जातिगत आरक्षण जन के आधार पर गलत बताते हुए कहा कि देष में गरीबों को आरक्षण मिलना चाहिए ने कि जाति के आधार पर। पत्रकार मुधकर ने कहा कि जन संवाद यात्रा जन आंदोलन के लिए मषाल का काम करेगी । वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रसुन लतांत ने सुझाव देते हुए कहा कि झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिसा और दक्षिण राज्यों के सवाल पर दिल्ली मे अलग-अलग आंदोलन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जन सरकारों से जुड़े पत्रकारों को संगठन तैयार किया जाना चाहिए, ताकि सषक्त मिडिया की भूमिका समाज के वंचित समुदाय के लोग बात को उठा सकें। सेमिनार का संचालन एकता परिषद के रमेष षर्मा ने की।

(श/ष से जुडी कुछ गलतियाँ है,उन्हें छोड़ दीजिएगा.-सपादक )


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com
मो - 09304706646
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