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रमेश उपाध्याय की नयी किताब ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ पर विचार-गोष्ठी


‘‘नये लेखकों के लिए तो ‘राइटर्स कंपेनियन’ या लेखक-सचहर की तरह की किताब है यह--पठनीय, संग्रहणीय और बहुत दूर तक आचरणीय भी।’’--विश्वनाथ त्रिपाठी

बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा तथा बहुआयामी व्यक्तित्व वाले लेखक और ‘कथन’ के संस्थापक संपादक रमेश उपाध्याय के 71वें जन्मदिन पर उनकी नयी किताब ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ का लोकार्पण 1 मार्च, 2013 को नयी दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में संपन्न हुआ। इस अवसर पर ‘कथन’ पत्रिका और शब्दसंधान प्रकाशन के संयुक्त प्रयास से एक विचार-गोष्ठी का आयोजन भी किया गया, जिसमें सुप्रसिद्ध साहित्यकारों ने किताब पर तथा उसके बहाने रमेश उपाध्याय के कृतित्व एवं व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किये।


समारोह के अध्यक्ष थे विश्वनाथ त्रिपाठी और मुख्य अतिथि मैनेजर पांडेय। वक्ता थे कवि लीलाधर मंडलोई, कथाकार अल्पना मिश्र, व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय, युवा आलोचक राकेश कुमार और विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी। ‘कथन’ की संपादक संज्ञा उपाध्याय ने स्वागत वक्तव्य दिया और कार्यक्रम का संचालन युवा आलोचक और ‘बनास जन’ के संपादक पल्लव ने किया। 
 
पल्लव

पल्लव ने रमेश उपाध्याय को जन्मदिन की बधाई देते हुए कहा कि ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ आत्मकथा नहीं है, किंतु ऐसी आत्मकथात्मक कृति है, जिसे पढ़कर हम रमेश उपाध्याय के विपुल, वैविध्यपूर्ण और विचारोत्तेजक लेखन, ‘कथन’ जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका तथा ‘आज के सवाल’ जैसी अद्भुत पुस्तक शृंखला के संपादन की विशिष्टता के साथ-साथ उनके अध्ययन, अध्यापन, साहित्यिक आंदोलन, लेखक-संगठन आदि विभिन्न क्षेत्रों में संलग्न रहने के दौरान किये गये गंभीर मनन और चिंतन की व्यापकता को समझ सकते हैं।

पुस्तक पर हुई विचार-गोष्ठी से पहले रमेश उपाध्याय के दो मित्रों ने आत्मीयतापूर्ण संस्मरण सुनाते हुए उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं की चर्चा की।

प्रेम जनमेजय
व्यंग्यकार तथा ‘व्यंग्य यात्रा’ के संपादक प्रेम जनमेजय रमेश उपाध्याय के पड़ोसी हैं और 1973 से लेकर 2004 में रमेश उपाध्याय के रिटायर होने तक दिल्ली विश्वविद्यालय में उनके साथी प्राध्यापक रहे हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि रमेश उपाध्याय अच्छे मित्र, अच्छे इंसान, अच्छे लेखक, अच्छे संपादक इत्यादि होने के साथ-साथ बहुत अच्छे शिक्षक भी हैं, जिन्होंने न केवल अपने छात्रों को, बल्कि साथ के शिक्षकों को भी कई प्रकार से शिक्षित किया है। 

देवेन्द्र मेवाड़ी

प्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने उस समय के संस्मरण सुनाये, जब 1965 में रमेश उपाध्याय दिल्ली में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादकीय विभाग में थे और जब 1969 में उन्होंने अजमेर से ‘ऊर्जा’ नामक विज्ञान पत्रिका निकालने की योजना बनायी। उन्होंने उस समय का रमेश उपाध्याय का लिखा एक पत्र भी पढ़कर सुनाया।


इसके बाद पुस्तक पर विचार-गोष्ठी हुई। उसमें दिये गये वक्तव्य क्रमशः किंचित् संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं।  

लीलाधर मंडलोई
लीलाधर मंडलोई
रमेश जी मेरे अग्रज हैं और बहुत बड़े साहित्यकार हैं। आज उनकी इकहत्तरवीं सालगिरह है। इसलिए सबसे पहले रमेश जी को बहुत-बहुत मुबारकबाद। इन्होंने जो एक भरा-पूरा साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन जिया है, उस पर हर किसी को रश्क होना चाहिए। इन्होंने जो जीवन जिया है, अपने दम पर जिया है; जो काम किया है, अपनी शर्तों पर किया है। यही वजह है कि इनका जीवन और इनका काम अपने-आप में एकदम अलग है। आज इनकी जिस किताब पर यहाँ चर्चा होने जा रही है, उससे इनका जीवन और इनका काम, दोनों एक अलग ही अंदाज में, एक अलग ही तेवर के साथ सामने आते हैं। इस किताब में एक अध्याय है ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’। मुझे लगता है कि यह इस किताब का नाम भी हो सकता था, क्योंकि यह किताब भी इनका मनचाहे ढंग से किया गया मनचाहा काम है।

इस किताब को पढ़कर मन में प्रश्न उठता है कि इसकी विधा या इसका रूपबंध क्या है? यह आत्मकथा नहीं है और क्यों नहीं है, इसका कारण किताब की भूमिका में बताया गया है। इसमें कुछ आत्मकथात्मक लेख हैं, कुछ संस्मरण हैं, कुछ साहित्यिक निबंध हैं और कुछ समय-समय पर दिये गये रमेश जी के व्याख्यान भी हैं। लेखक की ओर से इन सब चीजों को ‘आत्मकथात्मक एवं साहित्यिक विमर्श’ कहा गया है। लेकिन इस किताब का कोई मुकम्मल रूपबंध नहीं है। इसमें एक तरह की आजादखयाली है, जिसके चलते यह किताब दूसरी किताबों से अलग है। इसमें संकलित सब तरह की रचनाओं में लेखक ‘मैं’ के रूप में उपस्थित है और ऐसा लगता है कि उनमें लेखक ने स्वयं को तरह-तरह से ‘इनवेंट’ किया है और अपने पचास वर्षों के लेखकीय जीवन में रचनात्मक और वैचारिक स्तर पर जो अर्जित किया है, वह सरमाया इस किताब में रख दिया है।

लेकिन मेरे विचार से इस किताब के आत्मकथात्मक हिस्से ज्यादा मानीखेज हैं। उदाहरण के लिए, पुस्तक का पहला ही अध्याय, जिसका शीर्षक है ‘अजमेर में पहली बार’, बहुत ही मार्मिक है, बहुत ही अर्थ भरा है। अगर यह पूरी पुस्तक इसी रूप में लिखी गयी होती, तो यह एक ‘एपिकल’ पुस्तक होती। जब मैं पहले अध्याय पर ही निसार हो गया, तो पूरी पुस्तक अगर इसी तरह लिखी गयी होती, तो कितना अच्छा होता। मेरे विचार से तब यह एक अद्भुत पुस्तक होती। इसका अंतिम अध्याय है ‘अजमेर में दूसरी बार’। पहला अध्याय पढ़कर मेरी उत्कंठा जागी और मैं सीधे अंतिम अध्याय पर चला गया। लेकिन वह आत्मकथात्मक रूप में नहीं, पल्लव से की गयी बातचीत या साक्षात्कार के रूप में है। साक्षात्कार की अपनी एक सीमा होती है। उसमें निजता, आत्मीयता, लेखक का जीवन-संघर्ष, उसके लेखकीय व्यक्तित्व का निर्माण वगैरह उस तरह नहीं आ सकता था, जिस तरह पहले अध्याय वाले आत्मकथात्मक रूप में आया है। पहले अध्याय के रूपबंध में एक जादू है, एक तिलिस्म है, जिसमें आप खो जाते हैं। वह जादू व्याख्यान, साक्षात्कार, निबंध और आलोचना जैसे रूपबंधों में पैदा नहीं हो पाता। मगर क्या किया जाये, रमेश जी का अपना तेवर है, मनचाहे ढंग से मनचाहा काम करने की उनकी अपनी एक खास अदा है!

फिर भी, ध्यान से देखें, तो दूसरी तरह के रूपबंधों वाले अध्यायों में भी उनका ‘मैं’ बोलता है। वे आत्मकथात्मक न होकर भी आत्मकथात्मक हैं और उनमें उनके ‘मैं’ का होना कोई दोष नहीं, बल्कि बहुत बड़ा गुण है। हरिशंकर परसाई की बहुत-सी रचनाएँ ‘मैं’ वाले रूप में लिखी गयी हैं, लेकिन वे सारे ‘मैं’ अलग हैं और उन सबको इकट्ठा कर दिया जाये, तो उनका लेखन आजादी के बाद के समय का एक पूरा ‘एपिक’ बन जाता है। अगर इस किताब की गैर-आत्मकथात्मक रचनाओं में मौजूद सारे ‘मैं’ मिला दिये जायें, तो तकरीबन ऐसा ही कुछ हो जायेगा।

उदाहरण के लिए, इस किताब का एक अध्याय है ‘ईश्वर के बिना जीना’। उसमें आस्तिकता, नास्तिकता, धर्म और नैतिकता पर एक लंबी वैचारिक बहस है। फिर भी उसमें लेखक का अपना जीवन-संघर्ष और वैचारिक संघर्ष दिखायी देता रहता है। इसी तरह एक अध्याय है ‘मेरी नाट्यलेखन यात्रा’ और एक अध्याय है ‘प्रेमचंद को हम बार-बार पहली बार पढ़ते हैं’। इन तीनों अध्यायों में जो ‘मैं’ है, वह कमाल का ‘मैं’ है। वह बात शुरू करता है प्रथम पुरुष के रूप में, लेकिन चला जाता है अन्य पुरुष की तरफ और रचना आत्मकथात्मक होकर भी कुछ और बन जाती है या कुछ और होकर भी आत्मकथात्मक बनी रहती है। यहाँ रमेश जी दूसरे लेखकों से एकदम अलग दिखायी देते हैं और मुझ जैसा उनका पाठक उनका सहयात्री होकर उनके साथ-साथ चलने लगता है।

यह शायद आज के साहित्य की विशेषता है कि रचना के रूपबंध में अनेक विधाओं की बहुत तीव्र आवाजाही हो रही है। आत्मकथा, संस्मरण और डायरी जैसे आत्मकथात्मक रूपों में निबंध, आलोचना, बहस, व्याख्यान और यात्रा-आख्यान, स्मृति-व्याख्यान जैसे रूप घुल-मिल जाते हैं। मतलब यह कि साहित्यिक विधाओं की सीमाएँ बहुत अशांत हो गयी हैं। इतनी अशांत कि मानो किसी एक विधा में लिखना संभव ही नहीं रहा।

रमेश उपाध्याय(वरिष्ठ साहित्यकार)
(एक दशक तक पत्रकार रहने के बाद 
तीन दशकों तक 
दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन तथा 
साहित्य और संस्कृति की 
त्रैमासिक पत्रिका ‘कथन’ के साथ-साथ 
‘आज के सवाल’ नामक पुस्तक शृंखला 
का संपादन। 
संप्रति स्वतंत्र लेखन, 
विविध विषयों का अध्ययन-मनन 
और साहित्य की 
विभिन्न विधाओं में लेखन। 
चौदह कहानी संग्रह, 
पाँच उपन्यास, तीन नाटक, 
कई नुक्कड़ नाटक, 
चार आलोचनात्मक पुस्तकेंऔर 
अंग्रेजी तथा गुजराती से 
अनूदित कई पुस्तकें प्रकाशित)
रमेश जी की इस किताब को पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें एक ही रचना में अनेक विधाएँ मौजूद हैं। परसाई के लेखन में यह विशेषता थी और रमेश जी के लेखन में परसाई से इनकी निकटता इस रूप में भी दिखायी पड़ती है कि ये बीच-बीच में बड़ा बढ़िया व्यंग्य भी करते चलते हैं। गंभीर विचार और बहस करते हुए रमेश जी बीच- बीच में हास्यजनक उक्तियों या लतीफों का प्रयोग भी करते हैं। आलोचना करने या दूसरों की खबर लेने का उनका अपना तेवर है, चाहे वह ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’ में नामवर जी की आलोचना करने का हो, या ‘प्रेमचंद को लाठी बनाना’ में गिरीश मिश्र की खबर लेने का। यह चीज पुस्तक के पाठ को रोचक बनाती है। 

राकेश कुमार
राकेश कुमार
मैं इस किताब के शिल्प या रूपबंध की बात नहीं करूँगा, क्योंकि इस पर काफी चर्चा हो चुकी है। लेकिन मेरा मानना है कि यह किताब आत्मकथा नहीं, आत्मकथात्मक है, तो यह इसकी बहुत बड़ी विशेषता है। इसमें जो ‘आत्मकथात्मक एवं साहित्यिक विमर्श’ हैं, उन्हें ‘आत्मकथात्मक’ और ‘साहित्यिक’ दो भिन्न वर्गों में बाँटकर नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें संकलित सभी रचनाएँ आत्मकथात्मक हैं और साथ ही साहित्यिक भी। इसके साहित्यिक विमर्श भी आत्मकथात्मक विमर्शों के ही विस्तार हैं। उनमें उपाध्याय जी अपने अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैंµएक संघर्षशील युवा से लेकर एक स्थापित लेखक, आलोचक, संपादक आदि विभिन्न रूपों मेंµऔर इनके इन विभिन्न व्यक्तित्वों से साक्षात्कार करते समय किताब का शीर्षक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ बराबर याद आता रहता है, जिसमें अहंकार नहीं, बल्कि विनम्र स्वीकार है। आत्मकथाओं में जाने-अनजाने एक अहंकार का भाव प्रायः आ ही जाता है। इस किताब में वह नहीं है। इस किताब का समर्पण हैµ‘‘उन सबके नाम, जिन्होंने मुझे वह बनाया, जो मैं हूँ’’ और भूमिका में लेखक ने लिखा है :

‘‘मुझे जानने वाले कुछ लोग मुझे ‘सेल्फमेड मैन’ कहते हैं। मैं इससे इनकार करता हूँ। मैंने महान शिक्षाशास्त्री पाओलो फ्रेरे की एक किताब का अनुवाद किया है ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’। किताब की भूमिका लिखते समय मैंने उनका एक कथन उद्धृत किया था कि ‘‘दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता। शहर के जिन कोनों में ‘स्वनिर्मित’ लोग रहते हैं, वहाँ बहुत-से अनाम लोग छिपे रहते हैं।’’ मेरा निर्माण प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दुनिया के उन असंख्य लोगों ने किया है, जिन्होंने मुझे जिंदगी दी है, जिंदगी से प्यार करना सिखाया है, दुनिया को बेहतर और खूबसूरत बनाने के रास्ते पर चलना सिखाया है और इस रास्ते की प्रतिकूलताओं से लड़ने में मेरा साथ निभाया है। उन्होंने ही मुझे वह बनाया है, जो मैं हूँ। इसलिए मैं यह किताब उन सबको कबीर के शब्दों में यह कहते हुए समर्पित करता हूँ कि ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सब तेरा। तेरा तुझको सौंपते, क्या लागै है मेरा।’ ’’

इस किताब की भूमिका में ‘निजी’ और ‘सार्वजनिक’ में भेद करते हुए और केवल ‘निजी’ पर जोर देकर लिखी जाने वाली आत्मकथा लिखने से इनकार किया गया है। उपाध्याय जी दोनों में भेद नहीं करते। इस किताब को पढ़ते हुए हम पाते हैं कि उपाध्याय जी का ‘निजी’ इनके ‘सार्वजनिक’ को शर्मिंदा नहीं करता, बल्कि उसे गौरवान्वित करता है। यहाँ इनके जीवन के निजी और सार्वजनिक दोनों पक्ष मानो धूप में चमकते दिखायी देते हैं। एक ऐसी धूप में, जो इनके निजी को उद्भासित करती है और सार्वजनिक को आत्मीयता की ऊष्मा प्रदान करती है।

उदाहरण के लिए, पुस्तक का पहला अध्याय ‘अजमेर में पहली बार’ आत्मकथात्मक है, जबकि ‘ईश्वर के बिना जीना’ शीर्षक अध्याय ईश्वर के अस्तित्व, आस्तिकता और नास्तिकता के सवाल, धर्म और नैतिकता के संबंध इत्यादि को सामने लाने वाला गंभीर वैचारिक विमर्श है। लेकिन दोनों में एक संबंध-सूत्र है, जो उपाध्याय जी के ‘निजी’ को इनके ‘सार्वजनिक’ से जोड़ता है। पहले अध्याय में इन्होंने अपने बारे में लिखा है :

‘‘1960 के अप्रैल महीने की एक सुहावनी सुबह है। अजमेर के रेलवे स्टेशन पर अठारह साल का एक लड़का गाड़ी से उतरता है। शर्ट-पैंट और चप्पलें पहने हुए। साथ में सिर्फ एक झोला है, जिसमें उसके एक जोड़ी कपड़े हैं और कुछ कागज। लड़का स्टेशन से बाहर आता है। सामने ही घंटाघर है, जिसकी घड़ी में लगभग साढ़े आठ बजे हैं। वहीं कुछ हलवाइयों, चाय वालों, पनवाड़ियों आदि की दुकानें हैं। लड़का जबसे यात्रा पर निकला है, उसने कुछ नहीं खाया है। उसे जोर की भूख लगी है। वह सिर्फ दस रुपये लेकर चला था, जिनमें से रेल का टिकट और सिगरेट का पैकेट खरीदने के बाद अब उसकी जेब में इतने ही पैसे बचे हैं कि वह नाश्ता कर सके और सिगरेट खरीद सके। ‘जो होगा, देखा जायेगा’ के भाव से सिर झटककर लड़का आगे बढ़ता है। सड़क पार करके एक हलवाई की दुकान पर पहुँचता है। दुकान के सामने पड़ी बेंच पर बैठकर मजे से नाश्ता करता है। पनवाड़ी से सिगरेट खरीदता है और बिलकुल खाली जेब हो जाता है।’’

यह खाली जेब हो जाना उपाध्याय जी के आत्मविश्वास का सूचक तो है ही कि ये अपनी मेहनत और अपनी प्रतिभा से एक नितांत अजनबी शहर में भी अपनी जगह बना लेंगे, दूसरे मनुष्यों पर विश्वास का सूचक भी है। यही आत्मविश्वास और दूसरे मनुष्यों पर विश्वास ‘ईश्वर के बिना जीना’ में इस प्रकार सामने आता है :

‘‘लेकिन मैं उस समय एक नौजवान लड़का था, जिसके सामने जिंदा रहने, कमाने-खाने, अपने परिवार का सहारा बनने और अपना भविष्य बनाने के लिए काम करने के साथ-साथ अपने दम पर अपनी पढ़ाई जारी रखने की इतनी सारी समस्याएँ थीं कि मुझे इस दिशा में निश्ंिचत होकर आगे बढ़ने की सुविधा और फुर्सत ही नहीं थी। फिर, वह मेरी प्रेम करने और अपने भविष्य के स्वप्न देखने की उम्र थी। लेकिन मेरे मन में कहीं गहराई तक यह बात पैठ चुकी थी कि मुझे अच्छा मनुष्य तो बनना है, पर ईश्वर के बिना ही जीना है। भाग्य और भगवान के भरोसे बैठे रहने के बजाय अपना भविष्य अपने हाथों बनाना है। इससे एक तरफ मुझमें आत्मविश्वास पैदा हुआ, दूसरी तरफ रूढ़ियों और अंधविश्वासों से बचे रहने की दृढ़ता पैदा हुई और तीसरी तरफ एक प्रकार की वैज्ञानिक मानसिकता के साथ सृजनशील कल्पनाएँ करने और उन्हें कागज पर उतारने की इच्छा पैदा हुई। शायद इन्हीं सब चीजों ने मुझे एक प्रकार का सदाचारी, विद्रोही, दुस्साहसी, स्वप्नदर्शी और लेखक बनाया।’’

इस प्रकार देखें, तो ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ एक ऐसी किताब है, जिसमें एक लेखक और विचारक के व्यक्तित्व का विकास और उसके निर्माण की प्रक्रिया सामने आती है और फिर उसका परिपक्व रूप उद्घाटित होता है, जिसे इस किताब के कई अध्यायों में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, ‘साहित्य-सृजन और चेतना के स्रोत’ में, या ‘हमारे समय के स्वप्न’ में, या ‘भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्धता’ में।

अपने इस व्यक्तित्व के कारण ही रमेश उपाध्याय एक विश्वसनीय रचनाकार हैं। रचना में विश्वसनीयता पैदा होती है यथार्थवाद से, मानवीय मूल्यों से, आदर्शों से और जन-पक्षधरता से। और ये सब चीजें उपाध्याय जी के लेखन में स्पष्ट दिखायी पड़ती हैं। चाहे ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘अर्थतंत्र’ और ‘त्रासदी...माइ फुट!’ जैसी कहानियाँ हों या ‘दंडद्वीप’ और ‘हरे फूल की खुशबू’ जैसे उपन्यास, या ‘पेपरवेट’ और ‘भारत-भाग्य-विधाता’ जैसे नाटक, या ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ नामक पुस्तक में संकलित साहित्यिक निबंध। यथार्थवाद और आदर्शवाद का जैसा ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवादी’ मेल प्रेमचंद में है, वैसा ही उपाध्याय जी में है। यही कारण है कि उपाध्याय जी एक ओर आज के समय में ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’ की नयी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी ओर ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की जरूरत’ पर जोर देने वाला निबंध भी लिखते हैं।

हालाँकि आज का समय इन्हीं के शब्दों में ‘‘मानवता द्वारा देखे गये अब तक के सारे सुंदर स्वप्नों को मिटाकर दुनिया के यथार्थ को भयानकतम दुःस्वप्नों में बदल देने वाले’’ एक नये ढंग के साम्राज्यवाद का समय है, फिर भी इस किताब में शामिल एक रचना ‘हमारे समय के स्वप्न’ में इन्होंने लिखा हैµ‘‘मनुष्य ऐसा प्राणी है, जो सुंदर स्वप्न देखना बंद नहीं करता। वर्तमान चाहे जितना भीषण हो, मनुष्य बेहतर भविष्य की आशा नहीं छोड़ता, उसके लिए प्रयत्न जारी रखता है।’’ उपाध्याय जी के ये शब्द इनके अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को परिभाषित करते हुए लगते हैं।

मैं उपाध्याय जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। इनके पारिवारिक और साहित्यिक जीवन को मैंने निकट से देखा है। इनके चिंतन और कर्म में, कथनी और करनी में, जीवन और लेखन में कोई द्वैत नहीं है। इनको हमेशा एक खुली किताब की तरह पाया और पढ़ा जा सकता है। ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ किताब को पढ़ते हुए भी ऐसा ही लगता है कि उपाध्याय जी सामने बैठे हैं और जो कह रहे हैं, उसमें पूरी सादगी है, सच्चाई है, ईमानदारी है। ये जिन मूल्यों में विश्वास करते हैं, उन्हीं के अनुसार आचरण भी करते हैं। इस किताब में संकलित रचना ‘ईश्वर के बिना जीना’ में इन्होंने उन मूल्यों के बारे में लिखा हैµ‘‘ये जीवन-मूल्य प्रेम के हैं, सहयोग के हैं, मित्रता के हैं, वात्सल्य के हैं, अपने प्राकृतिक परिवेश की रक्षा करने के हैं और अपनी सांस्कृतिक निधियों को सँभालकर रखने के भी हैं।’’

यह किताब इन्हीं मूल्यों को सामने लाती है। मैं इस किताब के प्रकाशन पर और उपाध्याय जी के जन्मदिन पर इन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ। 
अल्पना मिश्र

अल्पना मिश्र
आज उपाध्याय जी का जन्मदिन है और इनकी नयी किताब का लोकार्पण भी हुआ है। मैं भी इस मुबारक मौके पर इन्हें बधाई और शुभकामनाएँ देती हूँ। लेकिन मैं इनसे बहुत छोटी हूँ, इसलिए प्रणाम भी करती हूँ। इन्हें प्रणाम करके मैं इनके प्रति आदर के साथ-साथ इनके परिवार के प्रति आभार भी व्यक्त कर रही हूँ, जहाँ से मुझे सदा स्नेह और आत्मीयतापूर्ण व्यवहार प्राप्त होता है।

उपाध्याय जी से मेरी पहली मुलाकात 2006 में हुई, जब ये सपरिवार देहरादून आये थे और मैं वहीं रहती थी। वहाँ इनके सम्मान में आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में मैं भी शामिल हुई थी। मैं बहुत समय से इनकी पाठक और प्रशंसक थी, लेकिन पहले कभी मिली नहीं थी, इसलिए सोच रही थी कि इतने बड़े लेखक से मिलने जा रही हूँ। मुझे उम्मीद नहीं थी कि ये मुझ जैसे नये लेखकों को भी पढ़ते होंगे। लेकिन उपाध्याय जी ने मुझे पहचाना, बहुत अच्छे ढंग से मिले और मेरी कहानियों पर बात की, तो मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ। इनके परिवार से मिलकर भी मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। अभी श्रीमती उपाध्याय मिलीं, तो उन्होंने बहुत प्यार से उस समय को याद किया। फिर मैंने देखा कि ‘कथन’ में लगातार नये लेखकों को जगह मिलती रही है और उपाध्याय जी उन्हें खूब प्रोत्साहित करते हैं। अब यही काम इनकी बेटी संज्ञा ‘कथन’ की संपादक बनकर कर रही है। उस पहली मुलाकात के बाद उपाध्याय जी से जब भी मिलना हुआ है, और जब से मैं दिल्ली आ गयी हूँ, तब से तो अक्सर मिलना हुआ है, मैंने इन्हें हमेशा सक्रिय और उत्साह से भरा हुआ पाया है। आज इस अवसर पर मैं इन्हें प्रणाम करती हूँ और कामना करती हूँ कि ये हमेशा हमें इसी रूप में मिलते रहें।

किताब पर बहुत सारी बातें हो गयी हैं। बहुत अच्छी बातें कही गयी हैं। कई ऐसी बातें, जो मैं भी कहना चाहती थी, पहले ही कह दी गयी हैं। इसलिए मैं केवल तीन रचनाओं पर बात करूँगी, जिन पर बात नहीं हुई है। ये रचनाएँ हैं ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’, ‘जो घर फूँके आपना...’ और ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’। इनमें से पहली रचना में उपाध्याय जी एक रचनाकार के रूप में सामने आते हैं और बड़े ही रोचक तथा प्रेरक ढंग से अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। दूसरी रचना में ये ‘कथन’ के संपादक के रूप में और अपनी पत्रिका के लिए किये गये अथक संघर्ष के साथ सामने आते हैं। तीसरी रचना में हम इन्हें एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में पाते हैं। मुझे उपाध्याय जी के इन तीनों रूपों ने बहुत प्रभावित किया।

‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’ में पहले एक विदेशी लेखिका की रचना-प्रक्रिया का और फिर एक विदेशी लेखक की उससे बिलकुल भिन्न रचना-प्रक्रिया का उदाहरण बड़े रोचक रूप में प्रस्तुत करते हुए उपाध्याय जी अपनी रचना-प्रक्रिया की भिन्नता स्पष्ट करते हैं और निष्कर्ष के रूप में कहते हैं कि ‘‘प्रत्येक लेखक की अपनी एक अलग ही रचना-प्रक्रिया होती है। अद्वितीय, अतुलनीय। रचना की नकल शायद की जा सके, रचना-प्रक्रिया की नकल नहीं की जा सकती।’’ इसके बाद उपाध्याय जी अपनी रचना-प्रक्रिया बताते हैं कि ‘जुलूस’, ‘कामधेनु’, ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘माटीमिली’, ‘अर्थतंत्र’ और ‘दूसरा दरवाजा’ कहानियाँ इन्होंने कैसे लिखीं। रचना-प्रक्रिया का यह वर्णन इतना रोचक और प्रेरणाप्रद है कि कोई लेखक पढ़े, तो अपनी रचना-प्रक्रिया पर अवश्य विचार करे। मुझे इसको पढ़ते हुए अपनी कहानियों की रचना-प्रक्रिया याद आयी और मैं उस पर विचार करने को प्रेरित हुई।

उपाध्याय जी साहित्य में व्यावसायिकता के विरोधी रहे हैं। व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरुद्ध अव्यावसायिक साहित्यिक पत्रिकाओं का आंदोलन चलाना, स्वयं ‘कथन’ जैसी अव्यावसायिक साहित्यिक पत्रिका निकालना, लघु पत्रिकाओं के लेखकों और संपादकों को संगठित करना वगैरह इनके व्यावसायिकता-विरोध के बाहरी पहलू हैं। भीतरी पहलू इनकी अपनी रचना-प्रक्रिया से सामने आता है। तब हमारे सामने स्पष्ट होता है कि व्यावसायिकता एक कैद है और रचना उससे निकलने की कोशिश। उपाध्याय जी लिखते हैं--‘‘व्यावसायिकता की कैद से बाहर निकलने की कोशिश में ही आप अपनी रचना-प्रक्रिया में स्वतंत्र हो सकते हैं। लेकिन इस स्वतंत्रता का कोई फार्मूला नहीं हो सकता। इसकी तलाश प्रत्येक लेखक को स्वयं ही करनी पड़ती है। यहाँ तक कि एक ही लेखक को अपनी प्रत्येक रचना में इसकी तलाश एक अलग ही ढंग से करनी पड़ती है।’’

‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ किताब में उपाध्याय जी ने कई जगह हिंदी की लघु पत्रिकाओं के बारे में, उनके आंदोलन और संगठन के बारे में लिखा है। उसमें अपनी पत्रिका ‘कथन’ के बारे में भी लिखा है। इस लिहाज से इस किताब में ‘स्वायत्तता के साथ सहयात्रा’, ‘भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्धता’ और ‘यह जनोन्मुख पत्रकारिता का सम्मान है’ शीर्षक रचनाएँ विशेष रूप से पठनीय हैं। लेकिन मुझे इस तरह की रचनाओं में सबसे अच्छी लगी ‘जो घर फूँके आपना...’। इसमें ‘कथन’ पत्रिका निकालने के लिए किया गया संघर्ष तो सामने आता ही है, इस काम में उपाध्याय जी को अपने परिवार से जो सहयोग मिला और वह सहयोग इन्होंने कैसे प्राप्त किया, यह भी सामने आता है। लिखते हैं :

‘‘लिखने-पढ़ने और लघु पत्रिका निकालने जैसे सर्जनात्मक कार्यों के लिए घर ही सर्वोत्तम कार्यक्षेत्र है, अतः साहित्यकार तथा साहित्यिक पत्रकार को सबसे पहले अपने घर-परिवार को ऐसा बनाने का प्रयास करना चाहिए कि वह न केवल अपना काम शांतिपूर्वक कर सके, बल्कि परिवार के सदस्यों में भी अपने काम के प्रति भरोसा और उत्साह पैदा करके उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त कर सके। लेकिन इसके लिए परिवार के सदस्यों में यह भावना और चेतना उत्पन्न करना आवश्यक है कि सर्जनात्मक लेखन और साहित्यिक पत्रकारिता सांसारिक दृष्टि से भले ही मूर्खता, पागलपन या घाटे का सौदा हो, अपने बौद्धिक तथा सर्जनात्मक व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है। परिवार में जब यह भावना और चेतना उत्पन्न हो जाती है, तो परिवार में--विशेष रूप से युवाओं में--बौद्धिक तथा सर्जनात्मक कार्यों के प्रति एक उत्साह उत्पन्न होता है। लघु पत्रिका के लिए ऐसे युवाओं की टीम सर्वोत्तम होती है।’’

मैं इस किताब में जिस रचना को पढ़कर सबसे ज्यादा प्रभावित हुई, वह है ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’। हालाँकि पूरी किताब में उपाध्याय जी के सामाजिक सरोकार, उनके जनतांत्रिक मूल्य, उनकी जन-पक्षधरता और प्रखर वैचारिकता के विभिन्न रूप सामने आते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करता है इनका पारिवारिक प्राणी वाला रूप। साहित्य और साहित्यकारों की चर्चा में प्रायः घर-परिवार को उपेक्षित कर दिया जाता है। कई लेखकों को लगता है कि लेखन में परिवार एक बहुत बड़ी बाधा है और वे परिवार की उपेक्षा करते हैं, परिवार से अलग रहते हैं या परिवार को तोड़ ही देते हैं।

लेकिन उपाध्याय जी मानते हैं कि अगर साहित्य में वाकई आपको मनचाहा काम करना है, तो अपने घर-परिवार पर ध्यान देना होगा और उसे एक स्वतंत्र, सर्जनात्मक, जनतांत्रिक परिवार बनाना होगा। यह बहुत बड़ा मूल्य है और उपाध्याय जी ने इस मूल्य को अपने जीवन में उतारकर अपने परिवार का निर्माण किया है। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि स्त्री लेखन में भी परिवार या पारिवारिकता के मूल्य पर ध्यान नहीं दिया जाता। कई क्रांतिकारी लेखक भी उस पर ध्यान नहीं देते। लेकिन मैं पूछती हूँ, अगर आप अपना एक बेहतर परिवार नहीं बना पा रहे, तो पूरी दुनिया को बेहतर बनाने का सपना कैसे देख रहे हैं?

उपाध्याय जी कहते हैंµ‘‘मेरे विचार से ऐसे ही परिवार में लेखक अपने लिए वह जगह बना सकता है, जहाँ उसे मनचाहे ढंग से मनचाहा काम करने की आजादी हो। लेकिन ऐसी आजादी अपने-आप नहीं मिलती, आपको संघर्ष करके हासिल करनी पड़ती है। ऐसी जगह कोई और बनाकर नहीं दे सकता, आपको प्रयासपूर्वक स्वयं ही बनानी पड़ती है। ऐसा परिवार भी कहीं बना-बनाया नहीं मिलता, आपको स्वयं ही बनाना पड़ता है। और यह लेखन से कम सर्जनात्मक काम नहीं है। यह काम उतना ही कठिन और कष्टदायक है, लेकिन उतना ही सुखद और सार्थक भी।’’

अंत में इस पूरी पुस्तक के बारे में एक बात मैं यह कहना चाहूँगी कि इसमें उपाध्याय जी ने अपने संघर्षों के बारे में खूब लिखा है, लेकिन कहीं भी हाय-हाय करते हुए उसका रोना नहीं रोया है। उन्होंने अपने संघर्ष को बहुत दृढ़ता के साथ, बहुत आत्मविश्वास के साथ बहुत सकारात्मक रूप में देखा है। यह सकारात्मकता बहुत ही सुंदर और प्रेरक है। मैं इसके लिए उपाध्याय जी को विशेष रूप से बधाई देती हूँ।
 
मैनेजर पाण्डेय
मैनेजर पांडेय
मैं रमेश जी से साल भर बड़ा हूँ, इसलिए इनके जन्मदिन पर बड़े भाई की हैसियत से बधाई देता हूँ। यह जानते हुए भी कि मेरे बाद विश्वनाथ जी बोलेंगे, जो मुझसे भी बहुत बड़े हैं। रमेश जी की इस किताब पर कुछ कहने से पहले मैं यह कहना चाहता हूँ कि यद्यपि इसका शीर्षक है ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’, पर इस किताब में रमेश जी का बहुत कुछ है। किताब का यह शीर्षक क्यों रखा गया है, यह इसकी भूमिका में बता दिया गया है। लेकिन मुझे यह इसलिए अच्छा लगा कि आजकल साहित्य में ‘मैं’ की भरमार हो गयी है। वह भी ऐसे ‘मैं’ की, जिसके पास ‘पर’ या ‘अन्य’ फटकता तक नहीं। इसलिए बहुत सारे कहानीकार आत्मसंघर्ष की कहानियाँ लिख रहे हैं। मेरा कहना है कि आत्मसंघर्ष तो सबका होता ही है, साहित्यकार को थोड़ा वह संघर्ष भी देखना चाहिए, जो समाज में मौजूद है। रमेश जी की यह किताब शुरू से आखिर तक आत्मकथात्मक है, लेकिन उन्होंने इसे ‘आत्मकथा’ नहीं बनाया है और इसका कारण भूमिका में बताया है। उनका यह कहना सही है कि हाल के दिनों में हिंदी में आत्मकथा काफी बिकाऊ विधा बन गयी है। ‘बिकाऊ’ की जगह ‘व्यावसायिक’ कहूँगा, तो आत्मकथाओं के लेखक नाराज हो जायेंगे, लेकिन दोनों शब्दों का मतलब एक ही है।

आत्मकथा लिखना या अपने बारे में लिखना अपने-आप में कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इधर जो आत्मकथाएँ लिखी जा रही हैं, उनमें से ज्यादातर के लेखक यह भूल गये लगते हैं कि मनुष्य का ‘स्व’ तब तक बनता ही नहीं, जब तक ‘पर’ उसके साथ उपस्थित न हो। आप सब ने वह कहानी पढ़ी होगी, जिसमें मनुष्य का बच्चा भेड़ियों के बीच रहकर भेड़िया ही बन जाता है। मनुष्य के सामने दूसरा मनुष्य नहीं होगा, तो वह मनुष्य नहीं, अमानुष ही बनेगा। इसीलिए साहित्य ‘पर’ की चिंता से संचालित होता है।

हमारे सबसे बड़े कथाकार हैं प्रेमचंद। उनके मित्रों ने बताया है कि उनकी अमुक-अमुक कहानी आत्मकथात्मक है या उनके अपने जीवन से जुड़ी हुई है। लेकिन क्या मजाल कि उन प्रसंगों से अपरिचित पाठक उन कहानियों से उनका जीवन जान ले। उनकी सभी कहानियों और सारे उपन्यासों में ‘स्व’ के साथ ‘पर’ है और ‘पर’ के माध्यम से पूरा समाज है। इसलिए रमेश जी ने अपनी किताब पर जो शीर्षक दिया है, उसका अलग महत्त्व है। इस किताब में इनके अपने तरह-तरह के अनुभवों का भी ब्यौरा है, इसलिए जिसकी इच्छा हो, इस में इनकी आत्मकथा खोजे, लेकिन मुख्य बात यह है कि इनका ‘मैं’ कहीं पर भी ‘पर’ के बिना, दूसरों के बिना, व्यापक समाज के बिना सामने नहीं आता। वह आपबीती के साथ-साथ जगबीती भी कहता चलता है।

यहाँ मैं चलते-चलते यह भी कहूँगा कि रमेश जी काफी लड़ाकू मिजाज के लेखक हैं। मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि ‘‘तुम्हीं से मुहब्बत तुम्हीं से लड़ाई’’। यह उनकी पद्धति है। जिससे प्रेम करते हैं, उसी से बहस भी करते हैं, उसी से लड़ते भी हैं। और यह हिंदी साहित्य की परंपरा है। दोबारा मुझे प्रेमचंद ही याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर कोई मूर्खतापूर्ण प्रश्न करे, तो उसका जवाब किसी को जरूर देना चाहिए। रमेश जी की इस किताब में एक लेख है ‘प्रेमचंद को लाठी बनाना’। यह लेख ‘जनसत्ता’ में छपा था और गिरीश मिश्र नामक एक सज्जन के द्वारा हिंदी के लेखकों पर लगाये गये इस आरोप के जवाब में छपा था कि सब ‘बाजारवाद’ के पीछे पड़े हैं, जबकि अंग्रेजी में ‘मार्केटिज्म’ जैसा कोई शब्द नहीं होता। उन्होंने लिखा कि ‘‘हिंदी के पत्रकार और साहित्यकार ‘बाजारवाद’ के रूप में एक काल्पनिक शैतान पैदा कर उसे लगातार पत्थर मार अपनी क्रांतिकारिता दिखा रहे हैं। प्रेमचंद ऐसा कतई न करते।’’ रमेश जी ने बाजारवाद की पूरी अवधारणा को तर्कों और उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया और लिखा कि ‘‘प्रेमचंद ने अपना निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ आज लिखा होता, तो वे भी ‘बाजारवाद’ का प्रयोग धड़ल्ले से करते और यह शब्द गढ़ने के लिए खुश होकर हिंदी वालों की पीठ ठोकते।’’

रमेश जी का आग्रह यह है कि हम अंग्रेजी से ही अनुवाद काहे करें? कोई नयी चीज आयी है, कोई नयी अवधारणा आयी है, तो उसके लिए हिंदी का ही कोई शब्द क्यों न गढ़ें? मैं समझता हूँ कि किसी भी भाषा की प्रतिष्ठा ऐसे लेखन से बनती है। एक जमाना था, जब ‘आज’ के संपादक पराड़कर जी थे। उनके संपादकीय इतने महत्त्वपूर्ण होते थे कि अंग्रेज अधिकारी उनके अनुवाद अंग्रेजी में करवाकर पढ़ते थे। रमेश जी उसी परंपरा के लेखक और संपादक हैं। इन्होंने बाजारवाद संबंधी बहस में जो दखल दिया, उससे हिंदी की प्रतिष्ठा और ताकत का पता चलता है।

दूसरी बात यह कि रमेश जी स्वयं मार्क्सवादी होते हुए भी मार्क्सवादियों की आलोचना करने और उनसे बहस चलाने में नहीं हिचकते। अभी कुछ समय पहले टेरी ईगल्टन की एक किताब आयी थी ‘दि ईविल’। दस साल पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि ‘ईविल’ पर कोई मार्क्सवादी लिखेगा। उसमें ईगल्टन ने कम्युनिस्ट नैतिकता का सवाल उठाया है। हिंदी में यह सवाल रमेश जी 1974 में ही उठा चुके थे। तब तो मैं व्यक्तिगत रूप से इनको जानता भी नहीं था। जब इनकी पुस्तिका ‘कम्युनिस्ट नैतिकता’ आयी, मैं बनारस में था। कुछ ही दिनों बाद मैं बरेली में अध्यापक हो गया। वहाँ सी.पी.आइ. के एक पुराने नेता थे, जिनसे मिलना-जुलना होता था और मैं उनसे बहुत सीखता था। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि तिवारी जी, यह कम्युनिस्ट नैतिकता क्या होती है? तिवारी जी हँसकर बोले कि आपके सामने यह सवाल कहाँ पैदा हो गया? मैंने कहा कि हिंदी के लेखक हैं रमेश उपाध्याय जी, उन्होंने इसी नाम की पुस्तिका लिखी है। तिवारी जी ने तब तक वह पुस्तिका पढ़ी नहीं थी, लेकिन मेरे प्रश्न का एक सामान्य उत्तर देते हुए कहा कि कम्युनिस्ट नैतिकता वही है, जिसे जनता स्वीकार करे। उदाहरण के लिए, अगर आप आदिवासियों के क्षेत्र में काम करने जा रहे हैं और आप केवल गंगाजल पीते हैं, तो तीन दिन में आदिवासी आपको भगा देंगे। वहाँ रहे भी, तो आपकी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। आपको उनके साथ बैठकर दारू पीना पड़ेगा, क्योंकि यह उनके जीवन का हिस्सा है। और अगर आप किसी ऐसी जगह चले जायें, जहाँ लोग शराब पीने को पाप समझते हों और आप वहाँ बैठकर शराब पीने लगें, तो जो देखेगा, चार गालियाँ देकर आपके पास से भाग जायेगा। आश्चर्य की बात कि ठीक इन्हीं शब्दों में तो नहीं, पर ऐसे ही विचार रमेश जी ने अपनी उस पुस्तिका में व्यक्त किये थे।

‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ में रमेश जी का एक लेख है ‘ईश्वर के बिना जीना’। उसमें रमेश जी ने ‘कम्युनिस्ट नैतिकता’ का एक अंश दिया है, जिसका शीर्षक है ‘नैतिकता और धर्म’। धर्म के मामले में कम्युनिस्ट लोग अक्सर मार्क्स का एक कथन उद्धृत किया करते हैं कि धर्म जनता के लिए अफीम है। रमेश जी ने ऐसे कम्युनिस्टों की आलोचना करते हुए लिखा हैµ‘‘मार्क्स ने धर्म को सिर्फ अफीम नहीं, कुछ और भी कहा है। उन्होंने धर्म को अत्यंत कठिन जीवन जीने वाले लोगों के लिए सुकून की एक साँस भी कहा है, हृदयहीन संसार का हृदय भी कहा है, अनात्मिक परिस्थितियों की आत्मा भी कहा है। और यह सब कहने के बाद ही कहा है कि धर्म जनता के लिए अफीम है।’’

रमेश जी की एक और विशेषता है कि लाभ-हानि का हिसाब लगाकर आलोचकों को खुश रखने के लिए उनकी खुशामद ये नहीं करते, बल्कि उनकी गलत बातों की खुलकर आलोचना करते हैं। इस किताब में इस प्रकार के दो लेख हैं। ‘साहित्य और साधारण पाठक’ और ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’। इनमें से पहले लेख में उन्होंने हिंदी के उन आलोचकों की आलोचना की है, जो पाठकों में साहित्य की समझ पैदा करने के बजाय लेखकों को लिखना सिखाने की कोशिश करते हैं। रमेश जी उन आलोचकों को अच्छा आलोचक नहीं मानते, जो किसी लेखक के लेखन को उसके संदर्भों के साथ समग्रता में समझने के बजाय उसकी किसी एक रचना को ‘राजनीतिक रूप से सही’ न पाकर उसकी आलोचना करते हैं और लेखक को ‘सही ढंग से लिखना’ सिखाने की कोशिश करते हैं। लेख के अंत में रमेश जी कहते हैं :

‘‘मैं अच्छा आलोचक उसे मानता हूँ, जो रचना की किसी ऐसी खूबसूरती पर उँगली रख सके, जिसे साधारण पाठक गूँगे के गुड़ की तरह महसूस तो करते हों, पर लिख-बोलकर बता न सकते हों। जो आलोचक यह काम कर सकता है, वह रचना में लाखों कमियाँ बता सकने वाले आलोचक से बड़ा आलोचक है। ऐसा आलोचक लेखकों को लिखना तथा पाठकों को पढ़ना भी सिखा सकता है।’’

इसी तरह ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’ शीर्षक लेख में रमेश जी ने नामवर जी की कहानी समीक्षा की आलोचना की है और खास तौर से उनकी कथानक संबंधी बातों पर तीखे प्रश्न उठाये हैं। कुछ और लेख भी हैं इस किताब में, जिनमें रमेश जी ने कहानी के रूप, उसकी अंतर्वस्तु, उसकी रचना-प्रक्रिया पर विचार किया है। इन लेखों से उनकी अपनी रचना-प्रक्रिया भी सामने आती है और उनकी कहानियों को समझने में मदद मिलती है। लेकिन कहानी समीक्षा के संदर्भ में रमेश जी ने भूमंडलीय यथार्थवाद का प्रश्न उठाकर उसकी जो एक नयी अवधारणा निर्मित की है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने जब पहली बार मुझसे इसकी चर्चा की थी, मुझे थोड़ी परेशानी हुई थी। थोड़ा असमंजस हुआ था। लेकिन इस किताब में शामिल कुछ लेखों में भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा स्पष्ट होकर सामने आयी है और वह हमारी समझ को विकसित करती है। रमेश जी पक्के यथार्थवादी हैं। पहले भी थे, इस किताब में भी हैं। लेकिन यथार्थवाद की उनकी समझ समय के साथ-साथ बदलती और विकसित होती रही है। उसका विकसित रूप भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा में दिखायी पड़ता है।

यथार्थवाद के संदर्भ में रमेश जी ने अनुभव और अनुभववाद में जो बारीक फर्क किया है, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। अनुभव और अनुभववाद में अंतर होता है। अनुभव के बिना रचना पैदा नहीं होती, लेकिन अनुभववाद रचना की सीमा बन जाता है। इस पर रमेश जी ने विस्तार से विचार किया है। रमेश जी मानते हैं कि रचना हमेशा यथार्थ के अन्वेषण और रूप के आविष्कार के सहारे चलती है। हर रचनाकार को यह अन्वेषण और आविष्कार करना पड़ता है।

रमेश जी की अपनी कहानियों में यह चीज स्पष्ट दिखायी पड़ती है। इसका एक कारण यह भी है कि ये कहानी लिखने के साथ-साथ कहानी लिखने की प्रक्रिया पर भी विचार करते हैं। इस सिलसिले में इस किताब में संकलित इनके तीन लेख विशेष रूप से पढ़ने लायक हैंµ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’, ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’ और ‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर?’। इनमें रमेश जी ने हिंदी आलोचना पर, खास तौर से कहानी की वर्तमान आलोचना पर, जो विचार किया है, उससे हिंदी आलोचना की संस्कृति और विकृति दोनों सामने आती हैं। इसलिए अंत में मैं यह कहूँगा कि हिंदी साहित्य की प्रकृति, संस्कृति और लगे हाथ उसकी विकृति--सब को एक साथ देखना हो, तो मेरा निवेदन है कि आप रमेश जी का यह ग्रन्थ जरूर पढ़ें। 


विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी
सबसे पहले मैं एक रहस्य की बात कहना चाहता हूँ। बहुत नाटकीय ढंग से नहीं कहना चाहता, लेकिन यह अवसर ऐसा है--रमेश उपाध्याय का जन्मदिन और इस अवसर पर इनकी पुस्तक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ का प्रकाशन--कि उस बात को कहना जरूरी है। वह बात यह है कि मैं चुपके-चुपके रमेश उपाध्याय से प्रेरणा लेता रहा हूँ। इनको लगातार इतना कर्मठ और सक्रिय देखना सचमुच प्रेरक है। कई बार मैंने कहा है कि मैं रमेश उपाध्याय को संपादक के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में रखता हूँ। यह बात पहली बार मैंने आज से दस-पंद्रह साल पहले कही थी और आज फिर दोहराता हूँ। लेकिन प्रेरणा मैं इनके एक और रूप से लेता हूँ। इनके पारिवारिक रूप से, जिसका जिक्र अभी अल्पना मिश्र ने किया। एक यशस्वी लेखक और प्राध्यापक के लिए अपने परिवार को सँभाले रखना मुश्किल होता है। उसमें एक प्रकार का आर्थिक और भौतिक संकट तो होता ही है, कभी-कभी बड़ा मानसिक संकट भी होता है। मैं इस मामले में अपना विचलन देखता था, अपनी कमजोरियाँ देखता था, लेकिन देखता था कि यह आदमी कभी विचलित नहीं हुआ। इसमें अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में कभी कोई कमजोरी दिखायी नहीं दी। इस बात ने मुझे हमेशा प्रभावित और प्रेरित किया।

मैं एक लेखक के रूप में भी इनसे प्रेरणा लेता रहा हूँ। सबसे पहले रमेश उपाध्याय की जिस चीज ने मुझे प्रभावित किया, वह थी इनकी भाषा, इनका गद्य। और इनकी भाषा की प्रशंसा मैंने लिखित रूप में की। यह 1974 के आसपास की बात है, जब इन्होंने आनंद प्रकाश और राजकुमार शर्मा के साथ मिलकर ‘युग-परिबोध’ नामक पत्रिका निकाली थी। इनके ये दोनों मित्र मॉडल टाउन में रहते थे। मैं भी वहीं रहता था। और भी कई पुराने साहित्यकारों और नये लेखकों ने वहाँ मकान ले रखे थे। रमेश उपाध्याय मॉडल टाउन से कुछ दूर राणा प्रताप बाग में रहते थे, लेकिन हमारा एक-दूसरे के घर आना-जाना और मिलना-जुलना होता रहता था। इनके साथियों में उन दिनों सुधीश पचौरी और कर्णसिंह चौहान भी हुआ करते थे। तब मैंने शायद ‘जनयुग’ में किसी प्रसंग में लिखा था कि ये लोग रमेश उपाध्याय से गद्य लिखना सीखें।

अभी तक भी गद्य में मेरा मिजाज बहुत मिलता है रमेश जी के साथ। इनके गद्य की विशेषता है अभिधा में लिखना और अपनी बात सूत्रों और सूक्तियों के रूप में कहना। अभिधा में लिखा गया एक सीधा-सादा वाक्य जितना कह सकता है, उतना प्रतीक, फैंटेसी वगैरह की तिकड़म-विकड़म से नहीं कहा जा सकता। अनंत अर्थ का समुद्र होता है एक सीधा-सादा वाक्य। एक बड़ा नाम लेकर कहना चाहूँ, तो कह सकता हूँ कि यह बात नोम चॉम्स्की ने भी भाषा के बारे में कही है। हमारे भारतीय साहित्य और भाषा-चिंतन में भी अभिधा की बड़ी महिमा है। आज भी अभिधा में एक स्पष्ट वाक्य लिखना लेखन का गुण माना जाता है। रमेश जी की भाषा में यह गुण है।

दूसरी विशेषता इनकी भाषा की यह है कि इनके लेखन में बातें अक्सर सूत्रों और सूक्तियों के रूप में कही जाती हैं। सूत्र निकालना और सूक्तियाँ कहना मामूली बात नहीं है। सरल रेखा खींचना बड़ा टेढ़ा काम है। बड़े लेखक सूक्तियाँ निकालते हैं। यह काम मध्यकालीन संत करते थे। हिंदी में यह काम प्रेमचंद ने किया है। प्रेमचंद का एक वाक्य है--‘‘प्रेम ने बड़ी तपस्या करके घर का वरदान पाया है।’’ या एक और वाक्य है--‘‘बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है।’’ बिलकुल सीधे-सादे वाक्य हैं, लेकिन इनके पीछे पूरा इतिहास है, व्यापक सामाजिक अनुभव है, लेखक का अपना अनुभव और चिंतन-मनन है, जिससे ये सीधे-सादे वाक्य सूक्ति बनते हैं। रमेश जी की इसी किताब में आपको बहुत-सी सूक्तियाँ मिल जायेंगी। जैसे--‘‘मनुष्य ऐसा प्राणी है, जो सुंदर स्वप्न देखना बंद नहीं करता।’’ या ‘‘साधारण पाठक एक जनतांत्रिक अवधारणा है।’’ या ‘‘नवीनता और मौलिकता में कोई अंतर्विरोध नहीं है, बल्कि सच्ची नवीनता तो मौलिकता में से ही आती है।’’

रमेश उपाध्याय की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि ये बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर असहमत होने पर बहस ही नहीं, आप से झगड़ा भी कर लेंगे। मेरे साथ भी एकाध बार हुआ है। बड़ा भीषण झगड़ा हुआ है। लेकिन जैसा कि पांडेय जी ने कहा कि ‘‘तुम्हीं से मुहब्बत तुम्हीं से लड़ाई’’, रमेश उपाध्याय झगड़ चाहे जितना लें, मुहब्बत करते रहते हैं, मित्रता बनाये रखते हैं। बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर हुई तीखी बहसों और झगड़ों के बावजूद मैं इनकी साहित्यधर्मिता से हमेशा प्रभावित रहा हूँ। अच्छे लेखक होने के साथ-साथ ये बहुत पढ़े-लिखे आदमी हैं। बहुत पढ़ाकू हैं। इन्होंने गंभीरता से, योजना बनाकर, बहुत-से देशी-विदेशी लेखकों को पढ़ा है और ये बहुत अच्छे अनुवादक हैं। अंर्स्ट फिशर की किताब का अनुवाद ‘कला की जरूरत’ आप पढ़ें। बहुत अच्छा, बल्कि अद्भुत अनुवाद है। आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकतावाद और यथार्थवाद का जैसा अध्ययन इन्होंने किया है, इन चीजों पर जैसा इन्होंने लिखा है, इनके साथ के कितने लेखकों ने ऐसा काम किया है? ये आधुनिक हैं, लेकिन अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे आधुनिक नहीं; बल्कि नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे आधुनिक हैं।

पांडेय जी ने गिरीश मिश्र का जिक्र किया। गिरीश मिश्र खुद को बड़ा अंग्रेजीदाँ और पाश्चात्य साहित्य का अध्येता समझते हैं। हिंदी वालों के बारे में अंट-शंट बोलते रहते हैं। हम लोग उनकी खबर लेना चाहते हुए भी चुप रहते थे। रमेश उपाध्याय चुप नहीं रहे। इन्होंने उनको जवाब दिया। वह लेख इस किताब में मौजूद हैµ‘प्रेमचंद को लाठी बनाना’। इन्होंने जमकर उनको जवाब दिया और बताया कि गिरीश मिश्र को हिंदी का ही नहीं, अंग्रेजी भाषा का भी और यहाँ तक कि अपने विषय अर्थशास्त्र का भी कितना कम ज्ञान है। इसी तरह इन्होंने कई उत्तर-आधुनिकतावादियों की खबर ली है, यथार्थवाद और मार्क्सवाद के विरोधियों की भी खबर ली है। ये बहसें भी इनकी इस किताब में हैं।

इस किताब के शीर्षक के बारे में भी मैं एक बात कहना चाहता हूँ। यह शीर्षक इन्होंने कबीर से लिया है। कबीर का-सा अक्खड़पन इनमें भी है, लेकिन ‘‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’’ कहने में जो विनम्रता है, जो समर्पण और साधना है, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। समर्पण और साधना के लिए साधक का कोई इष्ट होना चाहिए। रमेश उपाध्याय के लेखन में भी एक समर्पण और साधना है और इनका भी एक इष्ट है। वह है जन। लेकिन रमेश उपाध्याय रहस्यवादी नहीं हैं, यथार्थवादी हैं और मार्क्सवादी हैं। इनका चिंतन डायलेक्टिकल है और डायलेक्टिक्स में ‘वाद’ का एक ‘प्रतिवाद’ भी होता है। सो रमेश उपाध्याय के लेखन में ‘जन’ का प्रतिवादी है ‘अभिजन’। एक जन है और एक अभिजन। सौंदर्यबोध में अगर विवादी स्वर नहीं बोल रहा है, तो समझिए कि सौंदर्यबोध कच्चा है। सौंदर्य अच्छा लगता है, इसका मतलब ही यह है कि आपको कुरूपता बुरी लगती है। अगर आप अच्छे के पक्ष में हैं, तो अच्छे पर बल देंगे और बुरे को बुरा कहेंगे, उसका विरोध करेंगे। इसलिए रमेश उपाध्याय के यहाँ एक जन है, दूसरा अभिजन है; एक तरफ जनवादी साहित्य है, तो दूसरी तरफ अभिजनवादी साहित्य है।

इसमें एक बात यह भी है कि जन, जनता, जनवाद इनके यहाँ सिर्फ नाम लेने के लिए नहीं हैं। ये इन चीजों में विश्वास करते हैं। बल्कि स्वयं जन हैं और बने रहने का प्रयास करते हैं। इसीलिए इनकी कथनी और करनी में हम लोगों की अपेक्षा अंतर कम है। यह बहुत बड़ी बात है और मुझे बहुत प्रभावित करती है। हमने मजदूरों को दूर से देखा है, स्वयं मजदूर नहीं रहे हैं। इन्होंने मजदूरी की है, स्वयं मजदूर का जीवन जिया है। इस किताब का जो पहला अध्याय है, आत्मकथात्मक है। उसमें इन्होंने प्रेस में काम करने के अपने अनुभव का अद्भुत वर्णन किया है। कंप्यूटर पर किये जाने वाले कामों से पुराने प्रेसों में किये जाने वाले कामों की तुलना करते हुए इन्होंने लिखा है :

‘‘पुराने प्रेसों में इस तरह के सारे काम सीसे के टाइपों, लकड़ी के केसों, पीतल की स्टिकों, लोहे की गैलियों, केस और गैलियाँ रखने की ऊँची-ऊँची रैकों, पू्रफ उठाने के हैंड-प्रेसों आदि के साथ बड़ी मेहनत-मशक्कत से होते थे। हर भाषा के हर फौंट के हर साइज के टाइप के लिए अलग-अलग केस। अंग्रेजी के दो, हिंदी के तीन या चार। उन केसों के छोटे-छोटे खानों में भरे हुए सीसे के टाइप। अंग्रेजी में अपर-लोअर अलग, हिंदी में अक्षर, मात्राएँ, संयुक्ताक्षर, विरामचिह्न आदि अलग। किस खाने में क्या है, याद रखिए। सामने रखी ‘कॉपी’ को देख-देखकर बायें हाथ में पकड़ी ‘स्टिक’ में दायें हाथ से एक-एक टाइप उठाकर रखते जाइए। लाइन को ‘जस्टीफाई’ करने के लिए शब्दों के बीच स्पेस घटाइए-बढ़ाइए। स्पेस यथासंभव बराबर रहे, इसका ध्यान रखिए। लाइन पूरी हो जाने पर ‘लेड’ डालकर अगली लाइन कंपोज कीजिए। लाइन लंबी है, तो ध्यान रखिए कि टूटकर बिखर न जाये। बिखर जाये, तो फिर से कंपोज कीजिए। बीच में किसी और टाइप में कंपोज करना हो, तो उठकर जाइए, रैक में से उस टाइप के भारी-भारी केस खींचकर बाहर निकालिए और काम करने के बाद उन्हें उठाकर यथास्थान लगाइए। कोई शब्द बोल्ड या इटैलिक करना हो, तो भी यही सब कीजिए। मैटर को अंडरलाइन करना हो, तो रेखांकित शब्दों के बराबर की ‘रूल’ खोजिए और न मिले, तो पीतल की सख्त ‘रूल’ को कतिया से काटकर लगाइए। ‘गेज’ से नाप-नापकर पेज बनाइए, उन्हें डोरी से बाँधिए, सीसे के भारी-भारी पेजों को टूटने-बिखरने से बचाते हुए ‘गैली’ में रखिए, उस भारी ‘गैली’ को उठाकर पू्रफ उठाने की मशीन तक ले जाइए, ‘इंक-प्लेट’ पर स्याही लगाकर ‘रोलर’ से उसे इकसार कीजिए, पेजों पर स्याही लगाइए, कागज को गीला करके उचित ‘दाब’ देकर पू्रफ उठाइए। पू्रफ पढ़कर दे दिये जायें, तो सीसे के टाइपों की उलटी लिखाई पढ़ते हुए चिमटी से गलत टाइप निकालकर उनकी जगह सही टाइप बिठाइए। ‘डबल कंपोजिंग’ या ‘सी कॉपी’ के कारण मैटर घट-बढ़ जाये, तो मैटर को ‘चलाइए’। लाइनें घट-बढ़ जायें, तो बाद के सारे पेज खोल-खोलकर फिर से सबका मेकअप कीजिए, उन्हें बाँधिए और फिर से प्रूफ उठाइए।’’

लंबा उद्धरण है, लेकिन यह मैंने अपने मन की एक रोचक बात बताने के लिए आपके सामने पढ़ा है। जब मैं किताब में इसे पढ़ रहा था, मुझे विष्णु खरे की कविता ‘लालटेन’ याद आ रही थी, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि लालटेन कैसे जलायी जाती थी। यहाँ रमेश उपाध्याय विस्तार से बता रहे हैं कि पुराने प्रेसों में काम कैसे किया जाता था। यह अनुभव बहुतों को हुआ होगा, ऐसा संघर्ष बहुतों ने किया होगा, लेकिन इस अनुभव और संघर्ष को चित्रित करना बड़ी बात होती है। खास तौर से तब, जब आप उस अनुभव और संघर्ष से आगे बहुत दूर निकल आये हों। यानी प्रेस में काम करने वाले मजदूर की जगह आप लेखक, पत्रकार, प्राध्यापक और संपादक बन गये हैं, फिर भी आपका मजदूर और मजदूर वाला तेवर आपके भीतर मौजूद है। यही कारण है कि रमेश उपाध्याय के ऊपर बुर्जुआ बुद्धिजीवियों का या आलोचकों का आतंक नहीं है। जो बात कहनी होती है, साफ-साफ कहते हैं, कबीराना अक्खड़पन के साथ कहते हैं, लेकिन उसके पीछे ठोस अध्ययन, मनन और चिंतन होता है। हवाई बातें रमेश उपाध्याय नहीं करते हैं। चाहे वह कम्युनिस्ट नैतिकता का सवाल हो, या धर्म और ईश्वर का सवाल हो, या यथार्थवाद और भूमंडलीकरण का सवाल हो, या इनकी अपनी भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा का सवाल हो--किसी भी सवाल पर जब ये लिखते हैं, पूरी तैयारी के साथ लिखते हैं।

इस किताब के बारे में मंडलोई जी ने कहा कि यह पूरी किताब आत्मकथात्मक होती तो अच्छा रहता। इसका पहला अध्याय ‘अजमेर में पहली बार’ पढ़कर किसी को भी ऐसा लग सकता है। मुझे भी लगा, क्योंकि वह इतना रोचक और मार्मिक हैµऔर उसमें इनके प्रेम का जो प्रसंग है, वह तो इतनी शिद्दत से लिखा गया है कि उस प्रेम को मैंने भी महसूस किया। वह प्रेम प्रसंग बड़े संयम से लिखा गया है, लेकिन बहुत प्रभावित करता है। उस अध्याय को पढ़कर मुझे भी लगा कि रमेश उपाध्याय आत्मकथा ही लिखते, तो अच्छा रहता। लेकिन जब मैंने पूरी पुस्तक पर विचार किया, तो पाया कि नहीं, यह इसी रूप में ठीक है। इसमें रमेश उपाध्याय का जो चिंतन है, दूसरों से की गयी जो बहसें हैं, विभिन्न विषयों पर लिखे गये जो लेख हैं, उनसे भी तो इनका जीवन, व्यक्तित्व और संघर्ष सामने आता है। वह आत्मकथात्मक ढाँचे में नहीं आ सकता था। ये गंभीर लेख हैं। रोशनी देने वाले लेख हैं। इनसे पता चलता है कि रमेश उपाध्याय अपने लेखन और चिंतन की किस प्रक्रिया से गुजरे हैं। ये एक ‘प्रैक्टिसिंग राइटर’ के लेख हैं, जो अपने लेखन के साथ-साथ अपने समकालीन साहित्य की समस्याओं पर भी सोचता- विचारता है और उनसे सर्जनात्मक स्तर पर ही नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी जूझता है। इसीलिए जो लेख आत्मकथात्मक नहीं हैं, वे भी प्रासंगिक और पठनीय हैं। उनका इस किताब में रहना जरूरी था। 

इस किताब की एक और विशेषता है। यह किताब रमेश उपाध्याय के बारे में बने हुए या मार्क्सवाद, यथार्थवाद, प्रगतिशीलता और जनवाद के विरोधियों के द्वारा गढ़े गये इस मिथक को तोड़ती है कि ये हमेशा क्रांति की बातें करते हैं या अपने लेखन में सिर्फ नारेबाजी करते हैं। इस संदर्भ में इसी किताब से एक उद्धरण और देकर मैं अपनी बात समाप्त करूँगा। इन्होंने लिखा है :

‘‘आज की दुनिया में मार्क्सवादी कथाकार होने का मतलब है वर्तमान पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की जगह समाजवादी विश्व-व्यवस्था के निर्माण के लिए संघर्षरत शक्तियों के साथ खड़े होना। कथा में यह काम वर्ग-संघर्ष या क्रांति के बारे में लिखकर ही नहीं, बल्कि सच्चाई और अच्छाई जैसी ‘मामूली’ चीजों के बारे में लिखकर भी किया जा सकता है। हिंदी कथा का सार्थक विकास इसी प्रकार होता आया है और आगे भी किया जा सकता है।’’

मैं अंत में केवल यह कहना चाहता हूँ कि मुझे बहुत अच्छी लगी यह किताब। इसको पढ़कर मुझे बड़ा फायदा हुआ। नये लेखकों के लिए तो ‘राइटर्स कंपेनियन’ या लेखक-सहचर की तरह की किताब है यह--पठनीय, संग्रहणीय और बहुत दूर तक आचरणीय भी। इन्हीं शब्दों के साथ मैं रमेश जी को इस किताब के लिए बधाई देता हूँ। मैं इनसे उम्र में बहुत बड़ा हूँ, इसलिए इनके जन्मदिन पर इनके सुदीर्घ जीवन की कामना करता हूँ। मुझे विश्वास है कि ये बहुत दिनों तक स्वस्थ और सक्रिय रहेंगे और मेरे लिए बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।

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