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सोमवार, सितंबर 10, 2012

आयोजन रपट@‘सोचते रहे जब तक मंजिले परबत लगीं/चल पड़े इक साथ हम सब रास्ते खुलने लगे।

  • वंदना मिश्र का कविता पाठ
  • ‘‘चहती हूँ आना/फिर इस सुन्दर दुनिया में’’
  • रिपोर्ट@कौशल किशोर

‘मिलते रह/मथते रहें/निकलेगा कुछ नया/न सही अमृत/नया गीत तो फूटेगा’ कविता में ऐसा नयापन रचने वाली वरिष्ठ कवयित्री वंदना मिश्र ने अपनी कविता के विविध रंगों से लखनऊ के साहित्य समाज को परिचित कराया। उनके कविता पाठ के कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच ने सामाजिक परिवर्तन स्थल, गोमतीनगर, लखनऊ के कैन्टीन में 9 सितंबर दिन रविवार को किया था। वंदना मिश्र का अपनी कविताओं के बारे में कहना था कि कवि कर्म उनके सामाजिक कर्म का हिस्सा है। सामजिक संघर्ष से जो पाया है, उसे ही कविता में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने कहा ‘सोचते रहे जब तक मंजिले परबत लगीं/चल पड़े इक साथ हम सब रास्ते खुलने लगे।

इस मौके पर उन्होंने जहां महिलाओं पर बढ़ती हिंसा, उनकी जीवन दशा, धर्मांधता, तालीबानी संस्कृति के प्रसार जैसे विषय पर केन्द्रित ‘बलात्कार की खबर’, ‘इच्छाएं मत पालो’, देह एक पर्यटन स्थली’ शीर्षक से कई कविताएं सुनाईं, वहीं अदमान निकोबार की विलुप्त हो रही जनजातियों पर लिखी ‘जरवा गाथा’ श्रृंखला की कविताओं का भी पाठ किया। ‘पतरंगा नहीं दिखा इस बार’ कविता के द्वारा उन्होंने पर्यावरण के बढ़ते खतरे के प्रति सचेत किया कि कैसे पतरंगा जैसे जीव हमारी दुनिया से खत्म हो रहे हैं क्यों कि ‘इस बड़े शहर में/नहीं रहे घने ऊँचे पेड़/जो देते उसे आश्रय/अपनी शाखा भुजाओं में’। वंदना मिश्र ने ‘वो दिन’ तथा ‘बीच का रास्ता’ जैसी अपनी संघर्षधर्मी कविताओं का भी पाठ किया। उन्होंने ‘मृत्यु’ से लेकर ‘चाहती हूँ आना/फिर इस सुन्दर दुनिया में’ जैसी इच्छाओं से लबरेज जिन्दगी की कविताएं भी सुनाईं जिन्हें काफी पसन्द किया गया।

वंदना मिश्र की इन कविताओं पर टिप्पणी करते हुए आलोचक चन्द्रेश्वर ने कहा कि इनकी विशेषता यह है कि ये दुनिया के हर उस कोने में पहुँचती हैं जहां गैरबराबरी, अन्याय व शोषण है। इनका परिप्रेक्ष्य बहुत बड़ा व वैश्विक है। वंदना मिश्र सामाजिक चेतना की कवयित्री हैं। इनका काव्य लेखन स्त्री विमर्श के दायरे तक सीमित न होकर व्यापक भाव भूमि से जुड़ा है। समाज के विभिन्न पहलुओं पर कविता लिखने की इन्होंने पहल की है। 

वंदना मिश्र की कविताओं पर अपना वक्तव्य देते हुए कवि व जसम के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि ये सहज सरल भाषा में साफ साफ बात करने वाली कविताएं है। ये लोकतांत्रिक चेतना की कविताएं हैं। वंदना मिश्र की अंदमान की जनजातियों पर लिखी ‘जरवा गाथा’ हिन्दी की दुर्लभ कविताएं हैं। ऐसी कविताएं हिन्दी में नहीं मिलती। विश्व पूँजीवाद की लूट, सांप्रदायिकता आदि ने क्या संकट पैदा किये हैं, किस कदर आर्थिक विषमता बढ़ी है, वंदना मिश्र की कविताएं इन विषयों को समेटती है। ये एक बेहतर दुनिया बनाने के संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं।

कवि व पत्रकार अजय सिंह ने वंदना मिश्र की कविताओं पर कौशल किशोर की टिप्पणी से असहमति जाहिर करते हुए कहा कि कविता को समाजशास्त्रीय नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। कविता के लिए उसका शिल्प, भाषा व रूप विधान महत्वपूर्ण है जिससे कोई कविता बनती है और अपना असर छोड़ती है। वरिष्ठ उपन्यासकार रवीन्द्र वर्मा का कहना था कि प्रेम भी जीवन के लिए संघर्ष की तरह ही जरूरी है। हम वंदना मिश्र से प्रेम कविताओं की भी अपेक्षा करते हैं। ऐसी ही बात कवयित्री सुशील पुरी ने भी कही। अनीता श्रीवास्तव, ऊषा राय, किरण सिंह, कल्पना पाण्डेय आदि ने भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने की। उनका कहना था कि कविता के लिए समाजिक विषय जरूरी हैं, वहीं उसके लिए भाषा, क्राफ्ट तथा लय.ताल भी जरूरी है। वंदना मिश्र की कविता ‘गरजूं घन बन’ में कहरवा ताल है। नागार्जुन की कविताओं में यह ताल मिलता है। कविता पाठ के इस कार्यक्रम का संचालन किया कवि भगवान स्वरूप कटियार ने। 

कौशल किशोर द्वारा ही की गयी वन्दना मिश्र की एक किताब की समीक्षा यहाँ 

समीक्षक 
जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017 है.
मो-09807519227

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