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रविवार, अगस्त 19, 2012

''आज भूमंडलीकरण के दौर में ‘कथन’ जैसी पत्रिकाओं की जरूरत कई गुना बढ़ गयी है।''-नंद भारद्वाज


‘कथन’-75 का लोकार्पण और विचार-गोष्ठी

साहित्य और संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका ‘कथन’ के 75वें अंक का लोकार्पण 20 जुलाई, 2012 को नयी दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में हुआ। इस अवसर पर ‘परिवर्तन का परिप्रेक्ष्य और संभावना’ विषय पर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन भी किया गया, जिसकी अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी ने की। 

सर्वप्रथम ‘जीवन-शैली में बदलाव की जरूरत’ विषय पर केंद्रित ‘कथन’-75 का लोकार्पण राजेश जोशी, ‘कथन’ के संस्थापक संपादक वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय, प्रबीर पुरकायस्थ, अजय तिवारी, मुकुल शर्मा और अनिता भारती ने किया।

विचार-गोष्ठी के आरंभ से पहले ‘कथन’ की संपादक संज्ञा उपाध्याय ने ‘कथन’ की अब तक की यात्रा के विषय में बताते हुए पत्रिका द्वारा उठाये गये महत्वपूर्ण मुद्दों और सवालों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ‘कथन’ ने अपनी शुरूआत से ही विकल्पहीनता के भ्रम को तोड़ते हुए सही विकल्पों की दिशा में सोचने-समझने का प्रयास किया। इसीलिए पत्रिकाओं की भीड़ में इसकी अपनी अलग और विशिष्ट पहचान बन सकी। 

राजस्थानी और हिंदी के प्रसिद्ध कवि, कहानीकार और आलोचक नंद भारद्वाज ने 1980 में ‘कथन’ के प्रकाशन के पहले दौर को याद करते हुए कहा कि आज भूमंडलीकरण के दौर में ‘कथन’ जैसी पत्रिकाओं की जरूरत कई गुना बढ़ गयी है। पत्रिका के स्वरूप और सामग्री पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अपने महत्वपूर्ण स्तंभों के माध्यम से ‘कथन’ ने नये-नये प्रश्नों को विभिन्न पहलुओं से सामने लाने का विशेष प्रयास किया है। 

इसके बाद ‘परिवर्तन का परिपे्रक्ष्य और संभावना’ विषय पर विचार-गोष्ठी आयोजन हुई। सबसे पहले दलित एवं स्त्री विषयों पर लिखने वाली युवा लेखिका अनिता भारती ने अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर बहुत-से भ्रमों के टूटने का दौर है। परिवर्तन की बहुत-सी बातें किये जाने के बावजूद अब भी हमारे समाज में स्त्रियों और दलितों की स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन अलग-अलग जगहों पर चल रहे संघर्ष बताते हैं कि असमानता और उत्पीड़न के खत्म होने की संभावना अभी शेष नहीं हुई है। 

पर्यावरण तथा मानवाधिकारों पर महत्वपूर्ण लेखन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार मुकुल शर्मा ने कहा कि परिवर्तन की प्रचलित बना दी गयी अवधारणा और वास्तविक अवधारणा में फर्क करके चलना जरूरी है। नवउदारवादी परियोजना ने विकास की जो तथाकथित परिवर्तनवादी परिभाषा दी है, वह वास्तव में परिवर्तन-विरोध के उपकरण के रूप में इस्तेमाल होती है। विकास के नाम पर आज समानता की गहरी उपेक्षा हो रही है। नतीजा यह है कि जितनी तेजी से अमीरी बढ़ रही है, उतनी ही भयावह तेजी से गरीबी बढ़ रही है। कॉरपोरेटों पर लगाम कसे बगैर गरीबों, आदिवासियों, दलितों और व्यापक जनता के विकास की बात नहीं की जा सकती। एक बेहतर, समतामूलक समाज का निर्माण नैतिकता के सवाल से टकराये बिना संभव नहीं होगा। 

प्रसिद्ध वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता प्रबीर पुरकायस्थ ने कहा कि आज समूची दुनिया सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है। इन सबसे बड़ा संकट यह है कि दुनिया भर में प्रतिरोध बिखर-सा गया है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इस बिखरे हुए प्रतिरोध को किस प्रकार एक साथ लाकर समाज को बदला जाये। आज के दौर में पूंजीवाद पूरी तरह संगठित है और प्रतिरोध उसके मुकाबले असंगठित है। लेकिन संकट के समय ही हम सोचने के लिए बाध्य होते हैं कि स्थिति कैसे बदले। अतः संकट को निराशा के रूप में देखने के बजाय परिवर्तन के वाहक के रूप में देखना होगा। 

प्रसिद्ध आलोचक अजय तिवारी ने कहा कि वर्तमान समय में भूमंडलीय स्तर पर एक ओर निरुपनिवेशीकरण के संघर्षों और दूसरी ओर नवउपनिवेशीकरण के प्रयत्नों के बीच द्वंद्व का समय है। विश्व की सबसे प्रभुत्वशाली शक्तियां एक ओर और सभी समाजों की जनता दूसरी ओर है। इनके अंतर्विरोध को जितने बेहतर ढंग से समझकर आगे बढ़ाया जायेगा, उतने ही बेहतर ढंग से परिवर्तन का परिप्रेक्ष्य विकसित होगा और परिवर्तन की संभावना भी सजीव होगी। 

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा कि बदले हुए परिदृश्य में अपने देश के संदर्भ में हम देख रहे हैं कि पूंजीवादी भूमंडलीकरण का विरोध करने वाली जनतांत्रिक शक्तियों के पास इसका कोई विकल्प नहीं दिख रहा। परिवर्तन का अर्थ वे सिर्फ सत्ता परिवर्तन को बताती रहीं। सत्ता परिवर्तन होता रहा, लेकिन स्थितियां नहीं बदलीं और समाज में निराशा पैदा हुई। दूसरा बड़ा संकट अराजनीतिकरण के रूप में सामने आया। अराजनीतिकरण पूंजीवादी राजनीति का बड़ा भारी षड्यंत्र है। लेकिन इस तमाम नकारात्मकता में सकारात्मकता ढूंढ़ने का प्रयास वाम शक्तियों को ही करना होगा। प्रतिरोध की शक्तियां आज भले ही विखंडित हों, लेकिन कोई सूत्र अवश्य उन्हें एक करेगा। प्रतिरोध का दमन करने वाली बर्बरता वर्चस्वशाली शक्तियों की विजय नहीं, पराजय की सूचक है। बर्बरता बढ़ने का अर्थ यही है कि वर्चस्वशाली शक्तियां क्षीण हो रही हैं। 

आयोजन का संचालन युवा आलोचक राकेश कुमार ने किया। आयोजन में नित्यानंद तिवारी, लीलाधर मंडलोई, विष्णु नागर, देवेंद्र मेवाड़ी, चारु गुप्ता, रमणिका गुप्ता, सुरेंद्र मनन, अरुण आदित्य, सुरेश उनियाल, विनय विष्वास, अनिरुद्ध देषपांडे मनीश सैनी, दीपेंद्र रावत जैसे साहित्यकारों, इतिहासकारों, रंगकर्मियों आदि के साथ ही बड़ी संख्या में युवा श्रोता उपस्थित थे। 

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प्रस्तुति
अंकित उपाध्याय

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